बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग महिला को निवास, विवाह और शिक्षा चुनने का पूर्ण अधिकार है। कोर्ट के अनुसार कोई भी परिवार या व्यक्ति बालिग स्त्री की इच्छा के विरुद्ध उसे बंधक नहीं रख सकता। यह फ़ैसला उन मामलों पर प्रहार करता है जहाँ परिवार 'ऑनर' के बहाने झूठे अपहरण के केस दर्ज कराते हैं।
एक बालिग बेटी अपनी मर्ज़ी से किसी लड़के के साथ घर छोड़ती है। अगले 48 घंटों में उसके परिवार ने FIR दर्ज करा दी — धारा अपहरण की, आरोप गंभीर, लड़के की ज़िंदगी तबाह। यह कोई एक कहानी नहीं — भारत के थानों में रोज़ दोहराया जाने वाला दृश्य है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अब इस दृश्य की स्क्रिप्ट बदल दी है।
Law Trend की रिपोर्ट के अनुसार बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने ताज़ा फ़ैसले में साफ़ शब्दों में कहा है कि बालिग महिला को यह तय करने का 'अबाध अधिकार' (absolute right) है कि वह कहाँ रहेगी, किससे शादी करेगी, और क्या पढ़ेगी। कोर्ट के मुताबिक संविधान के अनुच्छेद 19 (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत कोई भी — परिवार हो या समाज — बालिग स्त्री की इच्छा पर लगाम नहीं लगा सकता।
फ़ैसले की भाषा पर ग़ौर कीजिए — 'absolute right'। यानी सशर्त नहीं, आंशिक नहीं, परिवार की सहमति से बँधा हुआ नहीं। पूर्ण। बिना किसी 'अगर-मगर' के।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों और क़ानूनी हलकों में इस फ़ैसले की गूँज इसलिए ज़्यादा है क्योंकि यह सीधे उस 'ऑनर' की राजनीति पर चोट करता है जो ख़ासकर हिंदी बेल्ट और पश्चिमी भारत के ग्रामीण इलाक़ों में गहरी जड़ें जमाए बैठी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आँकड़े बार-बार दिखाते हैं कि अपहरण के दर्ज मामलों में एक बड़ा हिस्सा वे होते हैं जहाँ बालिग लड़कियाँ अपनी मर्ज़ी से गई होती हैं, लेकिन परिवार ने 'इज़्ज़त' बचाने के लिए अपहरण का केस ठोक दिया। पुलिस अक्सर सामाजिक दबाव में FIR दर्ज कर लेती है, और लड़के को महीनों जेल में सड़ना पड़ता है — भले ही लड़की ख़ुद बयान दे कि वह अपनी इच्छा से गई है।
यह सिर्फ़ क़ानूनी मसला नहीं — एक सुनियोजित सामाजिक हथियार है। 'अपहरण' का आरोप लगाकर परिवार तीन काम एक साथ करता है: लड़की की आवाज़ दबाता है, लड़के को सज़ा देता है, और 'बिरादरी' के सामने अपनी 'इज़्ज़त' बचाता है। सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट पहले भी ऐसे मामलों में बालिग महिला की मर्ज़ी को सर्वोपरि मान चुके हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में थानों पर इसका असर न के बराबर दिखता है। (यह इंडस्ट्री और क़ानूनी हलकों में चल रही चर्चा पर आधारित है।)
इंडिया हेराल्ड की पॉलिटिकल रीड यह है कि बॉम्बे हाई कोर्ट का यह फ़ैसला महज़ एक और न्यायिक टिप्पणी नहीं — यह एक 'ज्यूडिशियल सिग्नल' है जो आने वाले दिनों में दो मोर्चों पर असर डालेगा। पहला — ज़िला अदालतों और सेशन कोर्ट में ऐसे झूठे अपहरण मामलों में ज़मानत और बरी होने की रफ़्तार बढ़ सकती है, क्योंकि वकील इस फ़ैसले को सीधे 'प्रीसिडेंट' के तौर पर पेश करेंगे। दूसरा — राज्य सरकारों पर दबाव बनेगा कि वे पुलिस को स्पष्ट गाइडलाइन जारी करें कि बालिग महिला की मर्ज़ी का बयान दर्ज होने के बाद अपहरण की FIR आगे नहीं बढ़ाई जाए।
लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि कोर्ट ने क्या कहा — असली सवाल यह है कि थाने में बैठा दरोगा इसे कब मानेगा। भारत के क़ानूनी इतिहास में ऐसे दर्जनों ऐतिहासिक फ़ैसले हैं जो अदालत की फ़ाइलों में तो चमकते हैं, लेकिन थानों की दीवारों तक पहुँचते-पहुँचते फीके पड़ जाते हैं। NCRB डेटा के अनुसार भारत में हर साल अपहरण के हज़ारों मामले दर्ज होते हैं जिनमें 'पीड़िता' स्वयं बालिग होती है और अपनी इच्छा से गई होती है — फिर भी FIR की मशीनरी चलती रहती है।
इस फ़ैसले का एक और पहलू है जिसे राजनीतिक दलों को ग़ौर से देखना चाहिए। जब भी कोई 'ऑनर किलिंग' या 'ऑनर' से जुड़ा अपराध सुर्ख़ियों में आता है, हर पार्टी बयान देती है, हर नेता ट्वीट करता है। लेकिन क्या किसी राज्य सरकार ने आज तक पुलिस मैनुअल में यह जोड़ा है कि बालिग महिला के अपनी मर्ज़ी से जाने पर अपहरण का केस दर्ज करने से पहले उसकी इच्छा अनिवार्य रूप से दर्ज की जाए? जवाब है — नहीं, या बहुत कम।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने जो कहा वह संविधान का बुनियादी सिद्धांत है — कोई नई बात नहीं। लेकिन यही तो त्रासदी है: 2026 में भी एक हाई कोर्ट को बैठकर यह बताना पड़ रहा है कि 18 साल की लड़की अपनी मर्ज़ी की मालिक है। यह फ़ैसला उतना जश्न का विषय नहीं जितना शर्म का — कि हम अब भी उस मुक़ाम पर हैं जहाँ यह कहने की ज़रूरत है।
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अब देखना यह है कि यह फ़ैसला सिर्फ़ क़ानूनी किताबों की शोभा बनेगा या ज़मीन पर बदलाव लाएगा। अगर राज्य सरकारें पुलिस ट्रेनिंग में इस फ़ैसले को शामिल करती हैं, अगर थानों में बालिग महिला का बयान पहले दर्ज होता है और FIR बाद में — तभी यह फ़ैसला असली 'ऑनर' पाएगा। वरना, एक और फ़ैसला — एक और फ़ाइल।
वह सवाल जो हर पिता, हर भाई और हर 'बिरादरी के ठेकेदार' से पूछा जाना चाहिए: अगर 18 साल का बेटा अपनी मर्ज़ी से नौकरी चुन सकता है, शहर बदल सकता है, तो 18 साल की बेटी अपनी ज़िंदगी क्यों नहीं?
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मुख्य बातें
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला को निवास, विवाह और शिक्षा चुनने का 'अबाध अधिकार' है — Law Trend की रिपोर्ट के अनुसार।
- कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का हवाला दिया — परिवार का कोई 'मालिकाना हक' बालिग बेटी पर नहीं।
- NCRB डेटा दिखाता है कि अपहरण के दर्ज मामलों में बड़ा हिस्सा वे हैं जहाँ बालिग लड़कियाँ अपनी मर्ज़ी से गई थीं।
- यह फ़ैसला ज़मीनी बदलाव तभी लाएगा जब राज्य सरकारें पुलिस गाइडलाइन में इसे शामिल करें।
आँकड़ों में
- NCRB के अनुसार भारत में अपहरण के हज़ारों मामलों में 'पीड़िता' बालिग और स्वेच्छा से गई होती है — फिर भी FIR दर्ज होती है।
- बॉम्बे हाई कोर्ट ने 'absolute right' शब्द का इस्तेमाल किया — यानी सशर्त नहीं, पूर्ण अधिकार।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: बॉम्बे हाई कोर्ट — Law Trend की रिपोर्ट के अनुसार।
- क्या: कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि बालिग महिलाओं को निवास, विवाह और शिक्षा चुनने का 'अबाध अधिकार' (absolute right) है।
- कब: 2026 में बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा सुनाया गया — Law Trend द्वारा रिपोर्ट।
- कहाँ: बॉम्बे हाई कोर्ट, महाराष्ट्र, भारत।
- क्यों: अक्सर परिवार बालिग बेटियों की स्वेच्छा से शादी या घर छोड़ने पर लड़कों के खिलाफ़ झूठे अपहरण के मुक़दमे दर्ज कराते हैं — कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया।
- कैसे: कोर्ट ने संवैधानिक अधिकारों — अनुच्छेद 19 और 21 — का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि बालिग महिला की मर्ज़ी सर्वोपरि है और परिवार का कोई 'मालिकाना हक' नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बॉम्बे हाई कोर्ट ने बालिग महिलाओं के बारे में क्या कहा?
कोर्ट ने कहा कि बालिग महिला को कहाँ रहना है, किससे शादी करनी है और क्या पढ़ना है — यह तय करने का 'अबाध अधिकार' (absolute right) है। कोई भी — परिवार सहित — इस पर रोक नहीं लगा सकता। यह अनुच्छेद 19 और 21 के तहत संवैधानिक अधिकार है।
क्या परिवार बालिग बेटी के मर्ज़ी से जाने पर अपहरण का केस दर्ज करा सकता है?
क़ानूनी रूप से अगर बालिग महिला अपनी इच्छा से गई है तो अपहरण का आरोप नहीं बनता। बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिग महिला की मर्ज़ी सर्वोपरि है। हालाँकि ज़मीनी स्तर पर ऐसी FIR अभी भी दर्ज होती हैं।
यह फ़ैसला ऑनर किलिंग से कैसे जुड़ा है?
ऑनर किलिंग की जड़ वही मानसिकता है — बेटी पर 'मालिकाना हक'। यह फ़ैसला उस मानसिकता को क़ानूनी रूप से ख़ारिज करता है। हालाँकि ज़मीनी बदलाव के लिए पुलिस ट्रेनिंग और राज्य-स्तरीय गाइडलाइन ज़रूरी हैं।



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