समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन 2024 लोकसभा में 43 सीटें जीतने के बावजूद टूट रहा है क्योंकि अखिलेश यादव 2027 UP विधानसभा अकेले लड़ना चाहते हैं और कांग्रेस अपनी ज़मीन बढ़ाने पर अड़ी है — यह दरार सीधे BJP को फ़ायदा पहुँचाती है।
तीन साल पहले की बात याद कीजिए — 2024 का वो गर्मियों का दिन जब लोकसभा नतीजे आए और उत्तर प्रदेश में BJP की 'अजेय' मशीनरी को ज़मीन पर बैठा दिया गया। SP-कांग्रेस गठबंधन ने 80 में से 43 सीटें छीन लीं। अखिलेश यादव और राहुल गाँधी मंच पर साथ खड़े थे, मुट्ठियाँ हवा में। वह तस्वीर अब इतिहास है — और इतिहास कभी-कभी बड़ी तेज़ी से पुराना हो जाता है।
News18 की ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, SP और कांग्रेस के बीच 2027 UP विधानसभा चुनाव को लेकर गठबंधन की बातचीत फ़िलहाल पूरी तरह ठप है। अखिलेश यादव ने अपने करीबी नेताओं को साफ़ संकेत दिए हैं कि पार्टी 403 सीटों पर अकेले लड़ने की तैयारी करे। दूसरी तरफ़ कांग्रेस ने UP में ज़िला स्तर पर संगठन विस्तार का अभियान शुरू कर दिया है — मानो 'साथी' की ज़रूरत ही न हो।
सवाल यह है कि 43 सीटें जीतने वाला फ़ॉर्मूला बिखर क्यों रहा है? जवाब सतह पर सीट बँटवारे का दिखता है, लेकिन असल खेल कहीं और है।
सीट बँटवारा नहीं, 'ज़मीन' की लड़ाई
2024 में लोकसभा का गणित आसान था — बड़ी सीटें, कम संख्या, एक साझा दुश्मन। लेकिन विधानसभा में 403 सीटों का बँटवारा कैसे हो? कांग्रेस 2024 में UP की जिन 17 लोकसभा सीटों पर लड़ी, उनमें से ज़्यादातर हारी — लेकिन पार्टी का तर्क यह है कि गठबंधन के कारण उसका वोट शेयर बढ़ा और यह 'निवेश' अब विधानसभा में 80-100 सीटों की माँग का हक़ देता है। अखिलेश का गणित इससे बिलकुल उलट है — वे मानते हैं कि SP ने अपनी ताक़त से कांग्रेस को ज़िंदा रखा, और अब उसे 'बड़ा भाई' की कुर्सी सौंपने का कोई कारण नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, कांग्रेस का UP में पिछले दो दशकों का प्रदर्शन — ख़ासकर 2017 और 2022 विधानसभा में — इतना कमज़ोर रहा है कि 80-100 सीटों की माँग SP के लिए 'ज़्यादती' लगती है। लेकिन राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के लिए UP वह राज्य है जहाँ कांग्रेस को वापसी करनी ही है — बिना ज़मीन के राष्ट्रीय राजनीति में दावेदारी खोखली रहेगी।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि अखिलेश के 'अकेले चलो' फ़ैसले के पीछे सिर्फ़ सीटों का गणित नहीं, बल्कि 2024 के बाद कांग्रेस नेतृत्व के व्यवहार से जमा हुई कड़वाहट है। सूत्रों का कहना है कि लोकसभा जीत के बाद कांग्रेस ने कई बार ऐसे सार्वजनिक बयान दिए जिनमें जीत का श्रेय 'INDIA ब्लॉक' को दिया गया, SP के नाम को हाशिये पर रखा गया। अखिलेश के करीबियों ने इसे 'अपमान' माना। एक वरिष्ठ SP नेता की चर्चित टिप्पणी गलियारों में घूम रही है — "हम घोड़ा लगाएँ और जॉकी का नाम कोई और ले जाए, यह मंज़ूर नहीं।"
दूसरी तरफ़ कांग्रेस के UP प्रभारी गलियारों में यह बात दोहरा रहे हैं कि "2027 में अकेले लड़कर भी कांग्रेस 15-20 सीटें जीत सकती है" — यह आत्मविश्वास असली है या दबाव बनाने की रणनीति, यह अभी साफ़ नहीं है। (यह सियासी गलियारों की चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
BJP की 'चुप्पी' सबसे बड़ी रणनीति
यहाँ वह कोण है जो बाक़ी मीडिया से छूट जाता है और जिसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — इस दरार का सबसे बड़ा लाभार्थी BJP है, और उसकी ख़ामोशी ही उसकी सबसे तेज़ चाल है। 2024 में BJP की UP हार का सबसे बड़ा कारण विपक्षी वोटों का एकीकरण था। अगर SP और कांग्रेस अलग-अलग लड़ें, तो गैर-BJP वोट बँटता है — और 'फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट' प्रणाली में बँटा हुआ विपक्ष BJP के लिए सबसे आरामदायक मैदान होता है।
2022 विधानसभा के आँकड़े याद कीजिए — SP को 111 सीटें मिलीं, कांग्रेस को मात्र 2। दोनों अलग लड़े थे। BJP ने 255 सीटें जीतीं, अक्सर 5,000-15,000 के मार्जिन से — ठीक उन सीटों पर जहाँ SP और कांग्रेस के वोट मिलाकर BJP से ज़्यादा थे। यही वह गणित है जिसने 2024 में गठबंधन को तर्कसंगत बनाया था, और यही गणित है जिसे दोनों पार्टियाँ अब भूलने पर आमादा हैं।
अखिलेश के बचे विकल्प — BSP, आज़ाद समाज पार्टी, या अकेला दम?
अगर कांग्रेस से रास्ते अलग होते हैं, तो अखिलेश के पास तीन रास्ते हैं — और तीनों में काँटे हैं। पहला, BSP से हाथ मिलाना — लेकिन मायावती ने पिछले कई चुनावों में किसी से गठबंधन न करने की ज़िद पकड़ रखी है और BSP का जनाधार 2024 में और सिकुड़ा है। दूसरा, चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी से तालमेल — यह दलित वोट बैंक में सेंध का विकल्प हो सकता है, लेकिन ASP की ज़मीनी ताक़त अभी सीमित है। तीसरा, पूरी तरह अकेले — जो अखिलेश का 'पसंदीदा' रास्ता लगता है, लेकिन 2017 और 2022 के नतीजे बताते हैं कि अकेले SP का वोट शेयर सत्ता के लिए काफ़ी नहीं रहा।
News18 के विश्लेषण के अनुसार, कुछ SP नेता चुपचाप एक 'थर्ड फ़्रंट' की संभावना तलाश रहे हैं — छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियों और निर्दलीयों का गठजोड़ जो सीट-दर-सीट BJP से मुक़ाबला कर सके बिना कांग्रेस को 'बड़ा साझेदार' बनाए।
आगे क्या होगा — वह सवाल जो कोई नहीं पूछ रहा
आने वाले महीनों में देखने लायक़ तीन चीज़ें हैं। पहली — क्या कांग्रेस UP में उपचुनाव या स्थानीय निकाय चुनावों में अकेले उतरती है? अगर हाँ, तो समझिए कि गठबंधन की अंतिम साँसें हैं। दूसरी — अखिलेश किसी अन्य पार्टी से सार्वजनिक बातचीत शुरू करते हैं या नहीं। तीसरी — और सबसे अहम — BJP क्या करती है। अगर योगी आदित्यनाथ सरकार इस बीच OBC या दलित वोटरों के लिए कोई बड़ा कल्याणकारी पैकेज लाती है, तो समझिए कि वे विपक्षी दरार को और चौड़ा करने के लिए समय का इस्तेमाल कर रहे हैं।
UP की राजनीति में एक पुरानी कहावत है — "अकेले चलो तो BJP हँसती है, साथ चलो तो कुर्सी तय नहीं।" अखिलेश यादव इस दुविधा के ठीक बीचोंबीच खड़े हैं। और राहुल गाँधी के लिए सवाल इससे भी बड़ा है — अगर UP में ज़मीन नहीं मिली, तो 2029 लोकसभा में प्रधानमंत्री पद के दावे की बुनियाद कहाँ से आएगी?
43 सीटों का फ़ॉर्मूला ज़िंदा रखना मुश्किल था, लेकिन उसे मारना और भी ख़तरनाक है। सवाल यह नहीं कि गठबंधन टूटेगा या नहीं — सवाल यह है कि जब टूटेगा, तो मलबे में दबेगा कौन?
आरोपों और बयानों की यहाँ रिपोर्टिंग नामित स्रोतों के हवाले से की गई है और जब तक न्यायालय ने फ़ैसला नहीं दिया, ये अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- 2024 लोकसभा में SP-कांग्रेस गठबंधन ने UP में 80 में से 43 सीटें जीतीं, लेकिन 2027 विधानसभा से पहले बातचीत ठप है — News18 रिपोर्ट
- अखिलेश यादव ने पार्टी को 403 सीटों पर अकेले लड़ने की तैयारी का संकेत दिया; कांग्रेस ज़िला स्तर पर स्वतंत्र विस्तार कर रही है
- 2022 में अलग-अलग लड़ने पर BJP ने 255 सीटें जीतीं — कई सीटों पर मार्जिन 5,000-15,000 था जहाँ SP-कांग्रेस के संयुक्त वोट BJP से ज़्यादा थे
- विपक्षी वोट का बँटवारा BJP के लिए सबसे आरामदायक परिदृश्य है — यही 'फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट' का गणित है
- अखिलेश के पास BSP, आज़ाद समाज पार्टी, या अकेले लड़ने के विकल्प हैं — तीनों में सीमाएँ हैं
आँकड़ों में
- 2024 लोकसभा में SP-कांग्रेस गठबंधन ने UP की 80 में से 43 सीटें जीतीं — News18
- 2022 UP विधानसभा: SP — 111 सीटें, कांग्रेस — 2 सीटें, BJP — 255 सीटें (अलग-अलग लड़ने पर)
- 2022 में BJP की कई जीतें 5,000-15,000 वोटों के मार्जिन से — जहाँ SP+कांग्रेस वोट मिलाकर BJP से आगे थे
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस नेतृत्व (राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी)
- क्या: 2024 लोकसभा में सफल रहे SP-कांग्रेस गठबंधन में गहरी दरार, 2027 UP विधानसभा से पहले अलग-अलग लड़ने के संकेत
- कब: 2026 के मध्य तक दरार खुलकर सामने आई, जबकि 2027 विधानसभा चुनाव करीब हैं
- कहाँ: उत्तर प्रदेश — भारत का सबसे बड़ा राज्य जहाँ 403 विधानसभा सीटें हैं
- क्यों: सीट बँटवारे पर असहमति, अखिलेश की 'अकेले चलो' रणनीति, कांग्रेस की UP में बढ़ती दावेदारी, और दोनों पार्टियों के वोट बैंक ओवरलैप को लेकर आपसी अविश्वास
- कैसे: अखिलेश ने पार्टी संगठन को अकेले चुनाव के लिए तैयार करने के संकेत दिए, कांग्रेस ने UP में स्वतंत्र रूप से ज़मीनी विस्तार शुरू किया — News18 की रिपोर्ट के अनुसार दोनों पक्षों के बीच औपचारिक बातचीत रुकी हुई है
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
SP और कांग्रेस का गठबंधन 2024 में सफल होने के बाद भी क्यों टूट रहा है?
मुख्य कारण 2027 विधानसभा के 403 सीटों के बँटवारे पर असहमति है। कांग्रेस 80-100 सीटें चाहती है जबकि SP इसे अनुचित मानती है। इसके अलावा, 2024 की जीत का श्रेय बँटवारे पर कड़वाहट और दोनों पार्टियों की अपनी-अपनी ज़मीन बढ़ाने की महत्वाकांक्षा ने दरार बढ़ाई है — News18 रिपोर्ट के अनुसार।
SP-कांग्रेस अलग-अलग लड़ें तो 2027 UP चुनाव में किसे फ़ायदा होगा?
सबसे ज़्यादा फ़ायदा BJP को होगा। 2022 के आँकड़े बताते हैं कि जब दोनों अलग लड़े तो BJP ने 255 सीटें जीतीं, कई सीटों पर छोटे मार्जिन से — जहाँ SP और कांग्रेस के वोट मिलाकर BJP से आगे थे। विपक्षी वोट बँटने से फ़र्स्ट पास्ट द पोस्ट में BJP का रास्ता आसान होता है।
अखिलेश यादव के पास गठबंधन के क्या विकल्प हैं?
तीन प्रमुख विकल्प हैं: BSP से गठबंधन (लेकिन मायावती गठबंधन से बचती रही हैं), आज़ाद समाज पार्टी से तालमेल (सीमित ज़मीनी ताक़त), या पूरी तरह अकेले लड़ना (2017 और 2022 में अकेले SP सत्ता नहीं जीत सकी)।
कांग्रेस UP में 2027 में अकेले कितनी सीटें जीत सकती है?
कांग्रेस सूत्रों के हवाले से 15-20 सीटों का दावा किया जा रहा है, लेकिन 2022 में पार्टी ने मात्र 2 सीटें जीती थीं। यह आत्मविश्वास वास्तविक है या दबाव की रणनीति, यह अभी स्पष्ट नहीं है।




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