संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का 'टोल फ्री' आंदोलन सतह पर टोल बूथों के ख़िलाफ़ दिखता है, लेकिन इसके केंद्र में MSP क़ानूनी गारंटी और स्वामीनाथन रिपोर्ट की अधूरी माँगें हैं। यह प्रोटेस्ट 2027 के UP-हरियाणा-पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले BJP के ग्रामीण नैरेटिव को सीधी चुनौती देता है।
जब कोई किसान अपनी ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर टोल बूथ से बिना भुगतान गुज़रता है, तो वह सिर्फ़ 85 रुपये बचाने की बात नहीं करता — वह उस पूरे तंत्र से सवाल पूछता है जिसने उसकी फ़सल का दाम तो तय नहीं किया, लेकिन सड़क पर चलने की क़ीमत ज़रूर वसूलता है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) का ताज़ा 'टोल फ्री' आंदोलन ठीक इसी विरोधाभास की नसों पर उँगली रखता है।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार SKM ने देशभर के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल प्लाज़ा को निशाना बनाया है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी UP और राजस्थान में किसानों ने बैरियर उठवाकर वाहनों को बिना शुल्क गुज़ारा। सतह पर यह टोल के ख़िलाफ़ दिखता है, लेकिन SKM की माँगों की सूची देखें तो तस्वीर बड़ी हो जाती है — MSP पर क़ानूनी गारंटी, स्वामीनाथन आयोग की C2+50% फ़ॉर्मूले पर अमल, और कृषि क़र्ज़ माफ़ी। टोल बूथ महज़ एक प्रतीकात्मक मंच है; असली लड़ाई खेतों से दिल्ली तक की है।
इस आंदोलन का टाइमिंग कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं। 2024 लोकसभा चुनाव में हरियाणा और पश्चिमी UP के ग्रामीण क्षेत्रों में BJP को जिस तरह की मज़बूती मिली, उसने पार्टी को यह भरोसा दिया कि किसान आंदोलन का चक्र टूट चुका है। लेकिन SKM का बार-बार सड़क पर लौटना एक अलग कहानी कहता है — वह कहानी जिसमें ग्रामीण असंतोष दबा है, ख़त्म नहीं हुआ।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि SKM का यह क़दम 2027 विधानसभा चुनावों की ज़मीन तैयार करने का पहला सिग्नल है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि पंजाब में AAP सरकार और हरियाणा में BJP सरकार — दोनों के लिए यह आंदोलन अलग-अलग सिरदर्द है। पंजाब में AAP को यह दिखाना होगा कि उसने किसानों के लिए कुछ किया, वरना SKM का गुस्सा उसकी ओर भी मुड़ सकता है। हरियाणा में BJP के लिए यह सीधा ख़तरा है — 2024 में जाट बेल्ट में जो दरारें दिखीं, वे इस आंदोलन से और चौड़ी हो सकती हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
UP में भी समीकरण कम जटिल नहीं। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार ने कई ग्रामीण योजनाओं — PM किसान सम्मान निधि की बढ़ी किस्तें, फ़सल बीमा के विस्तार — पर ज़ोर दिया है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि गन्ना किसानों का बक़ाया अब भी अरबों में है और मंडियों में धान-गेहूँ की ख़रीद MSP पर होती है या नहीं, यह हर ज़िले में अलग कहानी है। SKM जैसे संगठनों के लिए यह ठीक वही कच्चा माल है जिससे राजनीतिक दबाव बनाया जाता है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि SKM का 'टोल फ्री' आंदोलन असल में एक बड़े राजनीतिक पुनर्गठन का शुरुआती संकेत है। 2020-21 के किसान आंदोलन ने तीन कृषि क़ानून वापस करवाए, लेकिन MSP गारंटी का वादा अधूरा रहा। वह अधूरा वादा अब एक ऐसा राजनीतिक हथियार बन चुका है जिसे कोई भी विपक्षी दल — कांग्रेस, AAP, RLD, या क्षेत्रीय दल — चुनावी मौसम में उठा सकता है। BJP का दांव यह रहा कि PM किसान और डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र से ग्रामीण वोटर को सीधे जोड़ा जाए, लेकिन जब टोल बूथ पर खड़ा किसान कहता है कि "मेरी फ़सल MSP पर नहीं बिकती लेकिन सड़क पर चलने का टैक्स वसूला जाता है" — तो वह नैरेटिव किसी भी सरकारी स्कीम के ट्रांसफ़र से ज़्यादा ताक़तवर हो जाता है।
एक और पहलू जो मीडिया में कम चर्चा में है — टोल का मुद्दा शहरी मध्यवर्ग को भी छूता है। जब किसान टोल बूथ खोलते हैं, तो ट्रक ड्राइवर से लेकर कार में बैठा मिडल क्लास परिवार तक उनसे सहानुभूति रखता है, क्योंकि बढ़ता टोल शुल्क सबकी जेब काटता है। यही वह जगह है जहाँ SKM की रणनीति चतुर दिखती है — उन्होंने एक ऐसा प्रतीक चुना जो सिर्फ़ किसान नहीं, बल्कि व्यापक जनता की झुंझलाहट को आवाज़ देता है। 2020-21 में भी किसान आंदोलन तब ताक़तवर हुआ जब उसने शहरी सहानुभूति हासिल की — वही फ़ॉर्मूला यहाँ दोहराया जा रहा है।
BJP की ओर से अब तक इस आंदोलन पर आधिकारिक प्रतिक्रिया सीमित रही है। ज़ी न्यूज़ के अनुसार सरकारी पक्ष की ओर से किसानों को बातचीत का न्योता दिए जाने की बात कही गई है, लेकिन SKM ने MSP क़ानून पर ठोस आश्वासन के बिना बातचीत से इनकार किया है। यह गतिरोध 2020 की स्क्रिप्ट की याद दिलाता है — और उस बार सरकार को अंततः झुकना पड़ा था।
आने वाले हफ़्तों में देखने की बात यह होगी: क्या SKM इस आंदोलन को दिल्ली की सीमाओं तक ले जाता है? क्या विपक्षी दल — ख़ासकर कांग्रेस और AAP — इसमें खुलकर कूदते हैं या दूर से समर्थन देकर अपनी सत्ता बचाते हैं? और सबसे अहम — क्या 2027 तक यह किसान गोलबंदी उस स्तर पर पहुँचती है जहाँ यह चुनावी नतीजे बदल सके? जो सरकार MSP के वादे को 'कमेटी बना दी' में टालती रही, उसे शायद अब यह समझना होगा कि टोल बूथ का बैरियर उठाना आसान है — टूटा भरोसा जोड़ना नहीं।
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मुख्य बातें
- SKM का 'टोल फ्री' आंदोलन सिर्फ़ टोल शुल्क के ख़िलाफ़ नहीं — MSP क़ानूनी गारंटी और स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करने की व्यापक माँग इसके केंद्र में है।
- 2027 विधानसभा चुनावों (UP, हरियाणा, पंजाब) से पहले यह आंदोलन BJP के ग्रामीण नैरेटिव — PM किसान, DBT — को सीधी चुनौती देता है।
- टोल बूथ एक चतुर प्रतीकात्मक चुनाव है — यह मुद्दा किसानों के साथ-साथ शहरी मध्यवर्ग की सहानुभूति भी खींचता है, जो 2020-21 के फ़ॉर्मूले की पुनरावृत्ति है।
- BJP की ओर से बातचीत का न्योता दिया गया है लेकिन SKM ने MSP क़ानून पर ठोस आश्वासन के बिना इसे ठुकराया — गतिरोध 2020 की स्क्रिप्ट जैसा दिखता है।
आँकड़ों में
- स्वामीनाथन आयोग का C2+50% फ़ॉर्मूला — उत्पादन लागत पर 50% मुनाफ़ा — किसान आंदोलन की केंद्रीय माँग बना हुआ है।
- 2020-21 किसान आंदोलन ने 3 कृषि क़ानून वापस करवाए लेकिन MSP गारंटी का वादा अधूरा रहा — SKM के नए आंदोलन का मूल यही है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और उसके सहयोगी किसान संगठन — ज़ी न्यूज़ के अनुसार SKM ने इस आंदोलन की अगुवाई की है।
- क्या: देशभर में टोल प्लाज़ा पर 'टोल फ्री' आंदोलन — किसानों ने वाहनों को बिना टोल भुगतान गुज़ारा और MSP गारंटी क़ानून की माँग दोहराई।
- कब: 2026 में SKM ने यह ताज़ा प्रोटेस्ट शुरू किया — ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार।
- कहाँ: पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान समेत हिंदी बेल्ट के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों पर।
- क्यों: MSP पर क़ानूनी गारंटी, स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों का क्रियान्वयन, और बढ़ते टोल शुल्क से किसानों की बढ़ती परिवहन लागत — ये प्रमुख माँगें हैं।
- कैसे: SKM ने समन्वित रूप से किसानों को टोल प्लाज़ा पर जुटाया, बैरियर उठवाए और वाहनों को बिना शुल्क निकाला — शांतिपूर्ण सविनय अवज्ञा के तौर पर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
SKM का 'टोल फ्री' आंदोलन क्या है?
संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) ने देशभर के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों पर टोल प्लाज़ा के बैरियर उठवाकर वाहनों को बिना शुल्क गुज़ारने का शांतिपूर्ण आंदोलन चलाया है। इसकी मुख्य माँगें MSP पर क़ानूनी गारंटी और स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें लागू करना हैं।
इस आंदोलन का 2027 चुनावों पर क्या असर हो सकता है?
UP, हरियाणा और पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव होने हैं। SKM का आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों में असंतोष को राजनीतिक आकार दे सकता है, जिससे BJP के ग्रामीण वोट बैंक पर दबाव बनेगा और विपक्षी दलों को MSP मुद्दे पर चुनावी हथियार मिलेगा।
SKM की MSP गारंटी की माँग क्या है?
SKM चाहता है कि सरकार MSP को क़ानूनी अधिकार बनाए — यानी कोई भी व्यापारी MSP से नीचे फ़सल न ख़रीद सके। यह स्वामीनाथन आयोग के C2+50% फ़ॉर्मूले पर आधारित है, जिसमें उत्पादन की पूरी लागत पर 50% मुनाफ़ा सुनिश्चित किया जाता है।
BJP ने इस आंदोलन पर क्या प्रतिक्रिया दी है?
ज़ी न्यूज़ के अनुसार सरकारी पक्ष ने किसानों को बातचीत का न्योता दिया है, लेकिन SKM ने MSP क़ानून पर ठोस आश्वासन के बिना बातचीत से इनकार किया है।


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