भारतीय ब्यूटी बाज़ार 2026 में ₹2 लाख करोड़ के पार पहुँच गया है, जहाँ 'पर्सनलाइज़्ड स्किनकेयर' सबसे तेज़ बढ़ता सेगमेंट है। लेकिन IMARC ग्रुप और इंडियन जर्नल ऑफ़ डर्मेटोलॉजी के अनुसार, अधिकांश उपभोक्ता मार्केटिंग-ड्रिवन रूटीन अपनाते हैं, न कि त्वचा-विज्ञान-आधारित।

रात के ग्यारह बजे हैं। लखनऊ में बैठी एक 24 साल की लड़की अपने फ़ोन पर एक AI स्किन क्विज़ भर रही है — दस सवाल, तीन सेल्फ़ी, और नतीजा: एक 'पर्सनलाइज़्ड' सात-स्टेप रूटीन, कुल बिल ₹4,200। उसे लगता है यह सिर्फ़ उसके लिए बना है। लेकिन अगर दिल्ली, पटना या इंदौर में कोई और लड़की वही क्विज़ भरे — तो क्या नतीजा बहुत अलग होगा?

शायद नहीं। और यही वह सवाल है जो भारत की ₹2 लाख करोड़ से ऊपर पहुँच चुकी ब्यूटी इंडस्ट्री के सबसे चमकदार वादे — 'पर्सनलाइज़्ड स्किनकेयर' — की ज़मीनी हक़ीक़त उजागर करता है।

IMARC ग्रुप की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ब्यूटी और पर्सनल केयर बाज़ार 2026 में ₹2 लाख करोड़ का आँकड़ा पार कर चुका है, और इसमें सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला सेगमेंट है 'पर्सनलाइज़्ड' या 'कस्टमाइज़्ड' स्किनकेयर। Nykaa से लेकर Mamaearth, मिनिमलिस्ट से लेकर दर्जनों D2C ब्रांड्स — सब एक ही बात कह रहे हैं: 'यह सिर्फ़ आपके लिए बना है।' लेकिन जब आप ज़रा गहराई में जाते हैं, तो तस्वीर बदलती है।

इंडियन जर्नल ऑफ़ डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित एक शोध-समीक्षा बताती है कि भारतीय त्वचा की विविधता — जो फ़िट्ज़पैट्रिक स्केल पर टाइप III से टाइप VI तक फैली है — को सिर्फ़ 'ऑयली', 'ड्राई' और 'कॉम्बिनेशन' जैसी तीन-चार कैटेगरी में बाँटना वैज्ञानिक रूप से गम्भीर ओवरसिम्प्लिफ़िकेशन है। भारत जैसे देश में जहाँ जलवायु राजस्थान के रेगिस्तान से लेकर केरल की उमस तक बदलती है, जहाँ पानी की हार्डनेस ज़िले-ज़िले बदलती है, जहाँ खान-पान और प्रदूषण के स्तर में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है — वहाँ एक ऑनलाइन क्विज़ से निकला 'कस्टम' रूटीन किसी डर्मेटोलॉजिस्ट की क्लिनिकल जाँच की जगह नहीं ले सकता।

फिर भी लोग ले रहे हैं। और इसकी वजह समझना ज़रूरी है।

स्टैटिस्टा के आँकड़ों के मुताबिक़ भारत में ब्यूटी इन्फ़्लुएंसर मार्केटिंग पर सालाना खर्च 2024 से 2026 के बीच लगभग दोगुना हुआ है। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर हर दिन हज़ारों 'गेट रेडी विद मी' वीडियोज़ आते हैं जहाँ एक इन्फ़्लुएंसर अपनी 'पर्सनल' रूटीन दिखाती है — जो दरअसल एक ब्रांड डील है। ऐसे कंटेंट में डिस्क्लेमर अक्सर इतने छोटे फ़ॉन्ट में होता है कि पढ़ना मुश्किल, और एक 19 साल की लड़की को लगता है कि जो प्रोडक्ट उसकी 'दीदी' इस्तेमाल कर रही है, वही उसके लिए भी सही है।

ASCI (Advertising Standards Council of India) ने 2025 में इन्फ़्लुएंसर डिस्क्लोज़र गाइडलाइंस को और सख़्त किया, लेकिन अमल आज भी ढीला है। ASCI की अपनी मॉनिटरिंग रिपोर्ट बताती है कि जाँचे गए ब्यूटी कंटेंट में से लगभग 30 प्रतिशत में पेड प्रमोशन का सही डिस्क्लोज़र नहीं था।

यहीं एक और पहलू सामने आता है — 'क्लीन ब्यूटी' और 'टॉक्सिन-फ़्री' जैसे शब्दों का बेतहाशा इस्तेमाल। CDSCO (Central Drugs Standard Control Organisation) के तहत कॉस्मेटिक्स का रेगुलेशन दवाओं जितना कड़ा नहीं है। 'पैराबेन-फ़्री', 'सल्फ़ेट-फ़्री' जैसे लेबल वैज्ञानिक रूप से हमेशा बेहतर नहीं होते — इंडियन जर्नल ऑफ़ डर्मेटोलॉजी के विशेषज्ञों का कहना है कि कई मामलों में ये सिर्फ़ मार्केटिंग टैग हैं जो उपभोक्ता के डर का फ़ायदा उठाते हैं।

लेकिन इस तस्वीर का एक उजला पक्ष भी है, और उसे नज़रअंदाज़ करना ग़लत होगा। भारतीय ब्यूटी इंडस्ट्री में एक गम्भीर शिफ़्ट भी हो रहा है — 'इंग्रेडिएंट-कॉन्शस' उपभोक्ता का उभार। गूगल ट्रेंड्स डेटा दिखाता है कि 'नियासिनामाइड बेनिफ़िट्स', 'रेटिनॉल कैसे यूज़ करें', 'सैलिसिलिक एसिड फ़ॉर एक्ने' जैसी खोजें 2024-2026 में भारत में रिकॉर्ड ऊँचाई पर हैं। यानी एक पूरी पीढ़ी है जो लेबल पढ़ रही है, INCI लिस्ट समझ रही है, और सवाल पूछ रही है।

मिनिमलिस्ट जैसे ब्रांड्स ने इसी लहर को पकड़ा — उनकी पैकेजिंग पर इंग्रेडिएंट का प्रतिशत लिखा होता है, जो पारदर्शिता की दिशा में एक क़दम है। डॉक्टर-लेड ब्रांड्स जैसे SkinKraft और Be Bodywise ने डर्मेटोलॉजिस्ट कंसल्टेशन को अपने मॉडल में शामिल किया है — हालाँकि इनकी भी सीमाएँ हैं, क्योंकि ऑनलाइन कंसल्टेशन इन-पर्सन जाँच की बराबरी नहीं कर सकता।

असली सवाल यह नहीं है कि ब्यूटी इंडस्ट्री बुरी है या अच्छी। सवाल यह है: क्या उपभोक्ता को वह जानकारी मिल रही है जिससे वह सही फ़ैसला ले सके? और यहाँ इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड साफ़ है — जब तक CDSCO कॉस्मेटिक्स के 'क्लीन', 'नैचुरल', 'पर्सनलाइज़्ड' जैसे दावों के लिए स्पष्ट, बाध्यकारी मानक तय नहीं करता, और जब तक ASCI के इन्फ़्लुएंसर डिस्क्लोज़र नियम सिर्फ़ काग़ज़ पर रहते हैं, तब तक यह बाज़ार उपभोक्ता के भरोसे पर चलता रहेगा — और भरोसा सबसे नाज़ुक इंग्रेडिएंट है।

आने वाले महीनों में देखने लायक़ यह होगा कि BIS (Bureau of Indian Standards) द्वारा कॉस्मेटिक्स लेबलिंग के नए ड्राफ़्ट नियम — जिन पर 2025 के अंत से चर्चा चल रही है — क्या 2026 में अमल में आते हैं। अगर आते हैं, तो 'पर्सनलाइज़्ड' और 'क्लीन' जैसे शब्दों की क़ानूनी परिभाषा तय होगी, और ब्रांड्स को पहली बार अपने दावों को साबित करना होगा।

तब तक, सबसे समझदारी का काम वही है जो आपकी नानी कहती थीं — अपनी त्वचा को पहचानो, हर चमकती चीज़ सोना नहीं, और जो चीज़ बहुत अच्छी लग रही है, उसकी ज़रा जाँच करो। बस अब नानी की जगह एक अच्छे डर्मेटोलॉजिस्ट से मिल लो — वो क्विज़ नहीं, आपकी त्वचा देखकर बताएँगे।

मुख्य बातें

  • भारतीय ब्यूटी बाज़ार ₹2 लाख करोड़ पार — 'पर्सनलाइज़्ड स्किनकेयर' सबसे तेज़ बढ़ता सेगमेंट, IMARC ग्रुप के अनुसार
  • AI स्किन क्विज़ भारतीय त्वचा की असली विविधता — जलवायु, पानी, खान-पान — को पकड़ने में वैज्ञानिक रूप से अपर्याप्त: इंडियन जर्नल ऑफ़ डर्मेटोलॉजी
  • ASCI की मॉनिटरिंग में ~30% ब्यूटी इन्फ़्लुएंसर कंटेंट में पेड प्रमोशन का सही डिस्क्लोज़र नहीं मिला
  • 'क्लीन ब्यूटी' और 'टॉक्सिन-फ़्री' जैसे शब्दों की कोई बाध्यकारी क़ानूनी परिभाषा अभी भारत में नहीं है
  • BIS के ड्राफ़्ट कॉस्मेटिक लेबलिंग नियम 2026 में लागू हो सकते हैं — यह गेम-चेंजर होगा

आँकड़ों में

  • भारतीय ब्यूटी और पर्सनल केयर बाज़ार 2026 में ₹2 लाख करोड़ से ऊपर — IMARC ग्रुप
  • ASCI मॉनिटरिंग: जाँचे गए ब्यूटी कंटेंट में ~30% में पेड डिस्क्लोज़र ग़ायब
  • भारत में ब्यूटी इन्फ़्लुएंसर मार्केटिंग खर्च 2024-2026 में लगभग दोगुना — स्टैटिस्टा
  • गूगल ट्रेंड्स: 'नियासिनामाइड बेनिफ़िट्स', 'रेटिनॉल कैसे यूज़ करें' जैसी खोजें 2024-2026 में रिकॉर्ड स्तर पर

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