एम्बर एंटरप्राइज़ेज़ और भगवती ग्रुप जैसी भारतीय EMS कंपनियाँ स्मार्टफोन सेक्टर में बड़ी चाल चल रही हैं, लेकिन उनका मॉडल असल में विदेशी कंपोनेंट्स को जोड़ने — यानी 'स्क्रू-ड्राइवर असेंबली' — पर टिका है। लिवमिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, डीप मैन्युफैक्चरिंग और डिज़ाइन-लेवल वैल्यू एडिशन में भारत अभी भी काफ़ी पीछे है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: एम्बर एंटरप्राइज़ेज़ और भगवती ग्रुप — भारत की प्रमुख इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज़ (EMS) कंपनियाँ
- क्या: दोनों कंपनियों ने स्मार्टफोन असेंबली सेगमेंट में बड़ा विस्तार किया, लेकिन यह मॉडल 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' नहीं बल्कि 'असेंबली मोड' है — लिवमिंट रिपोर्ट
- कब: 2025-26 में, जब भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट और PLI स्कीम अपने चरम पर है
- कहाँ: भारत — ख़ासतौर पर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और तमिलनाडु की EMS फ़ैक्ट्रियाँ
- क्यों: क्योंकि भारत में चिपसेट, डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल जैसे कोर कंपोनेंट्स का निर्माण इकोसिस्टम विकसित नहीं हो पाया, कंपनियाँ विदेशी पार्ट्स इम्पोर्ट कर असेंबल करती हैं
- कैसे: कंपनियाँ चीन, ताइवान, दक्षिण कोरिया से कंपोनेंट्स आयात कर भारत में फ़ाइनल असेंबली करती हैं — PLI सब्सिडी का लाभ उठाते हुए — लेकिन वैल्यू चेन का बड़ा हिस्सा देश से बाहर ही रहता है
एक फ़ोन उठाइए — पीछे लिखा है 'Made in India'। अब ज़रा उसे खोलिए: चिपसेट ताइवान का, डिस्प्ले दक्षिण कोरिया का, कैमरा मॉड्यूल चीन का। तो भारत ने क्या बनाया? जवाब — बॉक्स, मदरबोर्ड पर पार्ट्स सोल्डर करने की मज़दूरी, और वह लेबल। यही वह कड़वी सच्चाई है जो एम्बर एंटरप्राइज़ेज़ और भगवती ग्रुप की ताज़ा कारोबारी चालों से एक बार फिर बेनकाब हो रही है।
लिवमिंट की एक विस्तृत रिपोर्ट ने बताया है कि भारत की दो सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज़ (EMS) कंपनियाँ — एम्बर और भगवती — स्मार्टफोन सेगमेंट में भारी निवेश कर रही हैं, लेकिन उनका पूरा बिज़नेस मॉडल अभी भी 'असेंबली मोड' में अटका है। मतलब साफ़ है: 'मेक इन इंडिया' नारे के पीछे 'स्क्रू-ड्राइवर टेक्नोलॉजी' ज़िंदा है।
₹1 लाख करोड़ का एक्सपोर्ट, लेकिन वैल्यू एडिशन कितना?
भारत अब सालाना ₹1 लाख करोड़ से ज़्यादा के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट करता है — यह संख्या गर्व करने लायक दिखती है। लेकिन जब आप इसे तोड़कर देखें, तो असली तस्वीर बदल जाती है। लिवमिंट के मुताबिक, इन एक्सपोर्ट्स में भारत की 'नेट वैल्यू एडिशन' — यानी वह हिस्सा जो सच में भारतीय श्रम, भारतीय कंपोनेंट्स और भारतीय बौद्धिक संपदा से आता है — महज़ 15-20% के आसपास ठहरता है। बाकी 80% क़ीमत विदेशी कंपोनेंट्स की है जो बस यहाँ जोड़े जाते हैं।
यह वैसा ही है जैसे कोई दर्ज़ी विदेश से कटा-सिला कपड़ा मँगाए, बस बटन लगाए, और कहे — 'मैंने सिला।'
एम्बर और भगवती — अलग नाम, एक ही कहानी
एम्बर एंटरप्राइज़ेज़, जो पहले एयर कंडीशनर कंपोनेंट्स के लिए जानी जाती थी, अब स्मार्टफोन और IT हार्डवेयर में आक्रामक विस्तार कर रही है। भगवती ग्रुप पहले से Apple और अन्य ब्रांड्स के लिए असेंबली करता है। दोनों कंपनियाँ PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) स्कीम के तहत भारी सब्सिडी उठा रही हैं।
लेकिन सवाल यह है कि क्या ये कंपनियाँ सच में 'मैन्युफैक्चरिंग' कर रही हैं, या सिर्फ़ 'असेंबली' — और इन दोनों शब्दों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। लिवमिंट की रिपोर्ट साफ़ कहती है: भारत के EMS प्लेयर्स 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' — यानी चिपसेट डिज़ाइन, डिस्प्ले पैनल प्रोडक्शन, सेमीकंडक्टर फ़ैब्रिकेशन — से अभी बहुत दूर हैं। वे उस पारिस्थितिकी तंत्र में दाख़िल होने के बजाय असेंबली वॉल्यूम बढ़ाने पर दाँव लगा रही हैं, क्योंकि वहीं तुरंत मुनाफ़ा है।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री हलकों में चर्चा है कि PLI स्कीम का स्ट्रक्चर ही ऐसा है कि कंपनियों को 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। सब्सिडी प्रोडक्शन वॉल्यूम पर मिलती है, वैल्यू एडिशन के प्रतिशत पर नहीं। एक सीनियर EMS एक्ज़ीक्यूटिव ने ट्रेड सर्कल में कहा — 'अगर सरकार 10 लाख यूनिट बनाने पर पैसा दे रही है, तो कोई क्यों करोड़ों ख़र्च करके चिप फ़ैब लगाए?' यह वह इंसेंटिव ट्रैप है जो पॉलिसी मेकर्स के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
ट्रेड विश्लेषकों में एक और बात घूम रही है: ताइवान, चीन और वियतनाम जैसे देशों ने कंपोनेंट इकोसिस्टम बनाने में 15-20 साल लगाए, ज़बरदस्त सरकारी पूँजी झोंकी। भारत उसी रास्ते पर 'शॉर्टकट' तलाश रहा है — और शॉर्टकट से फ़ैक्ट्री बनती है, इकोसिस्टम नहीं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और विश्लेषकों के अनुमान पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
PLI स्कीम — सब्सिडी किसकी जेब में?
PLI स्कीम ने निर्विवाद रूप से भारत की स्मार्टफोन असेंबली क्षमता बढ़ाई है। Apple के iPhones अब भारत में असेंबल होते हैं — यह पाँच साल पहले कल्पना से परे था। लेकिन यहीं एक गहरा आर्थिक सवाल छिपा है: PLI सब्सिडी का बड़ा हिस्सा आख़िर किसकी जेब में जा रहा है?
जब एम्बर या भगवती एक फ़ोन असेंबल करती हैं, तो कुल लागत का लगभग 80% विदेशी कंपोनेंट सप्लायर्स — क्वालकॉम, सैमसंग डिस्प्ले, TSMC — को जाता है। भारत में रहता है: असेंबली मज़दूरी, कुछ पैकेजिंग, और PLI सब्सिडी का एक हिस्सा। दूसरे शब्दों में, भारतीय टैक्सपेयर का पैसा एक ऐसी सप्लाई चेन को सब्सिडाइज़ कर रहा है जिसकी असली कमाई विदेश जाती है।
असली मैन्युफैक्चरिंग और असेंबली में फ़र्क़ — नंबरों में
इसे इस तरह समझिए: दक्षिण कोरिया में सैमसंग जब एक फ़ोन बनाता है, तो डिस्प्ले, मेमोरी चिप, प्रोसेसर — सब कुछ देश के अंदर या उसकी अपनी कंपनियों में बनता है। वैल्यू एडिशन 60-70% तक होता है। ताइवान में TSMC सिर्फ़ चिप बनाती है, लेकिन उस एक चिप में इतनी बौद्धिक संपदा होती है कि पूरे फ़ोन की 30-40% क़ीमत अकेले वहीं बनती है।
भारत? लिवमिंट के अनुसार, भारत की नेट वैल्यू एडिशन 15-20% पर अटकी है। यह संख्या पिछले 5 सालों में ख़ास नहीं बढ़ी — PLI के बावजूद। यही वह नंबर है जो 'मेक इन इंडिया' और 'असेंबल इन इंडिया' के बीच की खाई को दिखाता है।
जो कोण बाकी मीडिया से छूट गया — इंडिया हेराल्ड का सटीक रीड
असली समस्या न एम्बर में है, न भगवती में — ये कंपनियाँ वही कर रही हैं जो इंसेंटिव स्ट्रक्चर उन्हें करने को कह रहा है। समस्या उस पॉलिसी आर्किटेक्चर में है जो 'वॉल्यूम' को रिवार्ड करती है, 'डेप्थ' को नहीं। जब तक PLI सब्सिडी का पैमाना यूनिट्स की संख्या है, तब तक कोई भी समझदार बिज़नेसमैन चिप फ़ैब में ₹50,000 करोड़ क्यों लगाएगा जब ₹500 करोड़ में असेंबली लाइन लगाकर उतनी ही सब्सिडी मिल जाती है?
आने वाले दिनों में देखने लायक यह होगा कि क्या सरकार PLI 2.0 या 3.0 में 'लोकल वैल्यू एडिशन प्रतिशत' को सब्सिडी का पैमाना बनाती है। अगर बनाती है, तो एम्बर और भगवती जैसी कंपनियों को अपना पूरा बिज़नेस मॉडल बदलना होगा — और तब असली 'मेक इन इंडिया' की शुरुआत होगी। अगर नहीं बनाती, तो दस साल बाद भी हम बटन टाँकने वाले दर्ज़ी ही रहेंगे — बस फ़ैक्ट्री थोड़ी बड़ी होगी।
भविष्य की राह — क्या बदल सकता है?
भारत के सेमीकंडक्टर मिशन पर अभी अरबों डॉलर का दाँव लगा है। टाटा-PSMC और अन्य चिप प्लांट्स 2026-27 तक प्रोडक्शन शुरू करने की बात कह रहे हैं। लेकिन एक चिप फ़ैब से पूरा कंपोनेंट इकोसिस्टम नहीं बनता — डिस्प्ले, बैटरी सेल, कैमरा सेंसर, पैसिव कंपोनेंट्स — इनमें से हरेक के लिए अलग सप्लाई चेन चाहिए।
चीन ने यह इकोसिस्टम शेन्ज़ेन में तीन दशकों में खड़ा किया — दसियों हज़ार छोटे-बड़े सप्लायर्स का जाल, जहाँ आप सुबह एक नया कंपोनेंट डिज़ाइन करें तो शाम तक प्रोटोटाइप मिल जाए। भारत में ऐसा कोई क्लस्टर आज नहीं है। और जब तक नहीं बनता, तब तक एम्बर-भगवती जैसी कंपनियाँ वही करेंगी जो सबसे ज़्यादा मुनाफ़ा देता है — विदेशी पार्ट्स मँगाओ, जोड़ो, और लेबल चिपकाओ।
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सवाल यह नहीं है कि एम्बर या भगवती ग़लत कर रही हैं — वे बिल्कुल तर्कसंगत हैं। सवाल यह है कि भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स नीति कब 'मेड इन इंडिया' की परिभाषा बदलेगी — जब तक असेंबली को ही मैन्युफैक्चरिंग कहा जाता रहेगा, तब तक हर PLI का पैसा आधा विदेश जाता रहेगा, और हर 'मेड इन इंडिया' फ़ोन के भीतर असली भारत 20% से ज़्यादा नहीं होगा।
आँकड़ों में
- भारत के स्मार्टफोन एक्सपोर्ट में नेट वैल्यू एडिशन सिर्फ़ 15-20% — लिवमिंट
- स्मार्टफोन की कुल लागत का लगभग 80% विदेशी कंपोनेंट सप्लायर्स को जाता है
- दक्षिण कोरिया (सैमसंग) का स्मार्टफोन वैल्यू एडिशन 60-70% बनाम भारत का 15-20%
मुख्य बातें
- एम्बर और भगवती की स्मार्टफोन रणनीति 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' नहीं, 'असेंबली मोड' है — लिवमिंट
- भारत का स्मार्टफोन एक्सपोर्ट ₹1 लाख करोड़+ है, लेकिन नेट वैल्यू एडिशन सिर्फ़ 15-20% — 80% क़ीमत विदेशी कंपोनेंट्स की
- PLI सब्सिडी वॉल्यूम (यूनिट संख्या) पर मिलती है, वैल्यू एडिशन प्रतिशत पर नहीं — यही इंसेंटिव ट्रैप है
- जब तक PLI का पैमाना 'डेप्थ' नहीं बनता, कंपनियों के लिए असेंबली ज़्यादा मुनाफ़ेदार रहेगी
- भारत का सेमीकंडक्टर मिशन 2026-27 में शुरू होगा, लेकिन पूरा कंपोनेंट इकोसिस्टम बनने में दशकों लग सकते हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
एम्बर एंटरप्राइज़ेज़ और भगवती ग्रुप क्या करती हैं?
ये भारत की प्रमुख EMS (इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज़) कंपनियाँ हैं जो Apple, Samsung और अन्य ब्रांड्स के लिए स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रोडक्ट्स की असेंबली करती हैं। एम्बर पहले AC कंपोनेंट्स में थी, अब स्मार्टफोन और IT हार्डवेयर में विस्तार कर रही है।
'स्क्रू-ड्राइवर टेक्नोलॉजी' या 'स्क्रू-ड्राइवर असेंबली' का क्या मतलब है?
इसका मतलब है कि भारत में स्मार्टफोन 'बनाए' नहीं जाते, बल्कि विदेशों से आयातित तैयार कंपोनेंट्स (चिपसेट, डिस्प्ले, कैमरा) को सिर्फ़ जोड़ा (असेंबल) जाता है। इसमें भारत की अपनी बौद्धिक संपदा या डीप मैन्युफैक्चरिंग क्षमता का इस्तेमाल नहीं होता।
PLI स्कीम से भारत का स्मार्टफोन सेक्टर कितना फ़ायदे में है?
PLI ने असेंबली वॉल्यूम और एक्सपोर्ट ज़रूर बढ़ाया है (₹1 लाख करोड़+ सालाना एक्सपोर्ट), लेकिन लिवमिंट के अनुसार भारत की नेट वैल्यू एडिशन 15-20% पर ठहरी है — यानी सब्सिडी का बड़ा आर्थिक लाभ विदेशी कंपोनेंट मेकर्स को जाता है।
भारत 'डीप मैन्युफैक्चरिंग' में कब पहुँचेगा?
सेमीकंडक्टर मिशन के तहत टाटा-PSMC जैसे चिप प्लांट 2026-27 तक शुरू हो सकते हैं, लेकिन पूरा कंपोनेंट इकोसिस्टम (डिस्प्ले, बैटरी सेल, सेंसर) बनने में दशकों लग सकते हैं — चीन ने शेन्ज़ेन में यह 30 सालों में किया।




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