'आई, नोबडी' एक अनकन्वेंशनल थ्रिलर है जो शुरुआती दो एक्ट में दर्शक को बाँधे रखती है, लेकिन द हिंदू के रिव्यू के अनुसार फ़ाइनल एक्ट में कहानी अपनी पकड़ खो देती है। फ़िल्म का प्रीमाइज़ ताज़ा है, परफ़ॉर्मेंसेज़ दमदार हैं, मगर क्लाइमैक्स वह धार नहीं रख पाता जो पहले दो हिस्सों ने बनाई थी।
दो घंटे तक एक थ्रिलर आपको कुर्सी से चिपकाए रखे — हर सीन में कुछ छुपा हो, हर कैरेक्टर पर शक हो, हर फ़्रेम में बेचैनी हो — और फिर आख़िरी बीस मिनट में वही फ़िल्म आपके हाथ से रेत की तरह फिसल जाए। 'आई, नोबडी' (I, Nobody) ठीक यही करती है। द हिंदू के ताज़ा रिव्यू के मुताबिक यह फ़िल्म एक 'अनकन्वेंशनल थ्रिलर' है जो फ़ाइनल एक्ट में अपनी ही महत्वाकांक्षा के बोझ तले दब जाती है।
और यह सिर्फ़ एक फ़िल्म की कहानी नहीं है — यह उस पैटर्न की कहानी है जो भारतीय सिनेमा की अनकन्वेंशनल थ्रिलर्स में बार-बार दोहराता है।
जहाँ फ़िल्म जीतती है — पहले दो एक्ट का जादू
द हिंदू के रिव्यू में साफ़ कहा गया है कि 'आई, नोबडी' का सेटअप और कॉन्फ़्रंटेशन — यानी पहले दो एक्ट — उल्लेखनीय हैं। फ़िल्म एक ऐसे प्रीमाइज़ पर खड़ी है जो भीड़ से अलग है: एक 'नोबडी' — जिसका कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं, कोई बैकस्टोरी नहीं — को एक ऐसी स्थिति में फेंक दिया जाता है जहाँ हर चीज़ दाँव पर है। यह मिनिमलिस्ट अप्रोच काम करती है क्योंकि यह दर्शक को ख़ुद अर्थ गढ़ने पर मजबूर करती है।
परफ़ॉर्मेंसेज़ की बात करें तो रिव्यू में मुख्य कलाकार की 'रेस्ट्रेंड' अदाकारी की तारीफ़ की गई है — वह चुप्पी जो संवाद से ज़्यादा बोलती है। कैमरावर्क और बैकग्राउंड स्कोर मिलकर एक क्लॉस्ट्रोफ़ोबिक माहौल बनाते हैं जो थ्रिलर जॉनर में बेहद ज़रूरी है।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री हलकों में 'आई, नोबडी' को लेकर रिलीज़ से पहले से एक दिलचस्प चर्चा चल रही थी। ट्रेड सर्कल्स में सुनी-सुनाई यह थी कि मेकर्स ने स्क्रिप्ट के अंतिम हिस्से को शूटिंग के दौरान कई बार बदला — जो फ़ाइनल कट में दिखता भी है। एक सूत्र के हवाले से चर्चा है कि क्लाइमैक्स का ऑरिजिनल वर्ज़न कहीं ज़्यादा ओपन-एंडेड था, लेकिन टेस्ट स्क्रीनिंग में दर्शकों की 'कन्फ़्यूज़्ड' प्रतिक्रिया के बाद एक्सप्लेनेटरी सीन्स जोड़े गए। फ़ैन्स का मानना है कि यही वह मोड़ था जहाँ फ़िल्म अपना सबसे बड़ा हथियार — अंबिगुइटी — गँवा बैठी। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
तीसरा एक्ट — वह गिरावट जो सिर्फ़ इस फ़िल्म की नहीं
द हिंदू के रिव्यू का सबसे तीखा हिस्सा वही है जो हर गंभीर दर्शक महसूस करेगा: अंतिम एक्ट में फ़िल्म वह ग़लती करती है जो भारतीय थ्रिलर्स में अब लगभग महामारी बन चुकी है — ओवर-एक्सप्लेनेशन। दो एक्ट तक जो रहस्य दर्शक को सोचने पर मजबूर करता था, तीसरे एक्ट में उसे चम्मच से खिलाया जाने लगता है। हर ट्विस्ट के बाद एक फ़्लैशबैक, हर फ़्लैशबैक के बाद एक एक्सपोज़ीशन — जैसे मेकर्स को अपने ही दर्शक की समझ पर भरोसा नहीं।
इंडिया हेराल्ड का मानना है कि यह सिर्फ़ 'आई, नोबडी' की कमज़ोरी नहीं — यह भारतीय अनकन्वेंशनल सिनेमा का एक स्ट्रक्चरल संकट है। हाल के वर्षों में 'विक्रम', 'HIT' सीरीज़, 'राव बहादुर' जैसी फ़िल्मों ने भी यही दिखाया है कि भारतीय फ़िल्ममेकर्स सेटअप में बेहतरीन हैं, लेकिन पेऑफ़ में घबरा जाते हैं। Telugu360 की 'राव बहादुर' की रिव्यू में भी इसी तरह कहा गया था कि फ़िल्म 'अनकन्वेंशनल' होते हुए भी अंत तक अपनी पूरी क्षमता नहीं भुना पाती।
क्यों डरते हैं मेकर्स अंबिगुइटी से?
इसका जवाब सीधा है — बॉक्स ऑफ़िस का दबाव। एक ओपन एंडिंग थ्रिलर को क्रिटिक्स सराहते हैं, लेकिन मास ऑडियंस अक्सर 'कन्फ़्यूज़िंग' कहकर ख़ारिज कर देती है। वर्ड-ऑफ़-माउथ ख़राब होता है, और फ़र्स्ट वीकेंड के बाद फ़िल्म ग़ायब। इसलिए प्रोड्यूसर्स उस 'सेफ़ एक्सप्लेनेशन' पर ज़ोर देते हैं जो थ्रिलर की जान — उसका सस्पेंस — निचोड़ लेता है। यह वही दुविधा है जो हॉलीवुड में क्रिस्टोफ़र नोलन ने 'इन्सेप्शन' के स्पिनिंग टॉप से हल की — आपको जवाब मत दो, सवाल दो। भारतीय सिनेमा अभी वह भरोसा अपने दर्शक पर नहीं जताता।
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तो क्या 'आई, नोबडी' देखने लायक है?
बिल्कुल — अगर आप थ्रिलर जॉनर के प्रेमी हैं तो पहले दो एक्ट अकेले टिकट की क़ीमत वसूल करते हैं। द हिंदू ने फ़िल्म को मिश्रित लेकिन सकारात्मक झुकाव वाला रिव्यू दिया है, जिसमें कहा गया कि यह 'एक ऐसी फ़िल्म है जो अपनी कमज़ोरियों के बावजूद ज़हन में टिकती है।' और शायद यही किसी अनकन्वेंशनल फ़िल्म की असल जीत है — कि वह आपको बेचैन छोड़ जाए, भले ही वह बेचैनी इसलिए हो कि 'काश, आख़िरी बीस मिनट ऐसे न होते।'
आने वाले हफ़्तों में देखना दिलचस्प होगा कि ओटीटी पर यह फ़िल्म कैसा प्रदर्शन करती है — क्योंकि अनकन्वेंशनल थ्रिलर्स अक्सर स्ट्रीमिंग पर दूसरी ज़िंदगी पाती हैं, जहाँ दर्शक रिवाइंड कर सकता है, ठहरकर सोच सकता है। अगर मेकर्स समझदार हैं, तो शायद एक डायरेक्टर्स कट भी आए — वह ऑरिजिनल ओपन एंडिंग वाला, जो टेस्ट स्क्रीनिंग में रोक दिया गया था।
असल सवाल यह नहीं कि 'आई, नोबडी' अच्छी है या बुरी — असल सवाल यह है कि भारतीय सिनेमा कब अपने दर्शक पर इतना भरोसा करेगा कि उसे सवाल के साथ थिएटर से निकलने दे, बिना हर जवाब चम्मच से खिलाए?
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मुख्य बातें
- 'आई, नोबडी' का सेटअप और परफ़ॉर्मेंसेज़ उल्लेखनीय हैं, लेकिन फ़ाइनल एक्ट में ओवर-एक्सप्लेनेशन से सस्पेंस बिखरता है (द हिंदू)।
- भारतीय अनकन्वेंशनल थ्रिलर्स में 'तीसरे एक्ट का संकट' एक बार-बार दोहराता पैटर्न बन चुका है।
- अनकन्वेंशनल फ़िल्में अक्सर ओटीटी पर दूसरी ज़िंदगी पाती हैं — 'आई, नोबडी' का असली इम्तिहान स्ट्रीमिंग पर होगा।
- मेकर्स का अपने दर्शक की समझ पर भरोसा न करना भारतीय थ्रिलर सिनेमा की सबसे बड़ी रुकावट है।
आँकड़ों में
- द हिंदू ने 'आई, नोबडी' को मिश्रित-सकारात्मक रिव्यू दिया — पहले दो एक्ट 'उल्लेखनीय', तीसरा एक्ट 'कमज़ोर'।




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