भारत में बढ़ती इंटरनेट पहुँच ने करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य जानकारी तक सीधी पहुँच दी है, लेकिन WHO और ICMR दोनों चेतावनी देते हैं कि बिना सत्यापन के ऑनलाइन मिली मेडिकल सलाह ग़लत सेल्फ़-मेडिकेशन, देरी और गम्भीर नुकसान का कारण बन रही है।
कल्पना कीजिए — रात के दो बजे, गले में तेज़ खराश, बुखार चढ़ रहा है। अस्पताल दूर है, OPD सुबह खुलेगी। पहला क़दम? तकिये के नीचे से फ़ोन निकालकर Google पर टाइप करना: "गले में दर्द और बुखार का इलाज।" यह दृश्य अब किसी एक घर का नहीं, पूरे भारत का रोज़मर्रा का सच है।
The Lancet Digital Health में 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग 60% शहरी मरीज़ डॉक्टर से मिलने से पहले ऑनलाइन अपने लक्षण खोजते हैं। National Family Health Survey (NFHS-5) के आँकड़ों के मुताबिक़ टियर-2 और टियर-3 शहरों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर एक डॉक्टर के पास रोज़ाना औसतन 80-100 मरीज़ आते हैं — मतलब हर मरीज़ को मिलता है बमुश्किल दो-तीन मिनट। इस खाई को भरने के लिए इंटरनेट एक आसान रास्ता लगता है, लेकिन असली सवाल यह है कि यह रास्ता किधर ले जा रहा है।
जब जानकारी ताक़त बने
डिजिटल स्वास्थ्य साक्षरता के फ़ायदे नकारे नहीं जा सकते। WHO की 2023 की रिपोर्ट "Global Strategy on Digital Health 2020-2025" स्पष्ट कहती है कि विश्वसनीय डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिये स्वास्थ्य जानकारी का प्रसार रोकथाम-आधारित स्वास्थ्य सेवा को मज़बूत कर सकता है। भारत सरकार का eSanjeevani टेलीमेडिसिन पोर्टल इसका जीता-जागता उदाहरण है — स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 2025 तक इस पर 15 करोड़ से अधिक टेलीकंसल्टेशन हो चुकी थीं। एक महिला जो बिहार के दरभंगा ज़िले में रहती है और जिसे निकटतम स्त्री-रोग विशेषज्ञ तक पहुँचने में छह घंटे लगते हैं, उसके लिए एक वीडियो कॉल पर विशेषज्ञ की सलाह मिलना — यह डिजिटल साक्षरता का सबसे सुन्दर चेहरा है।
डायबिटीज़ और हाइपरटेंशन जैसी क्रॉनिक बीमारियों में भी जानकारी का असर दिख रहा है। ICMR की 2024 की एडवाइज़री के अनुसार जो मरीज़ अपनी बीमारी के बारे में बुनियादी समझ रखते हैं, उनमें दवा नियमित लेने की दर 30-35% अधिक पाई गई। यानी सही जानकारी सचमुच जान बचा सकती है।
लेकिन अधूरा ज्ञान कब ज़हर बनता है?
समस्या तब शुरू होती है जब Google-search का नतीजा डॉक्टर की जगह ले लेता है। Indian Journal of Community Medicine में 2024 में छपे एक शोध के मुताबिक़ भारत में लगभग 52% लोग बिना किसी डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक्स ख़रीदते और खाते हैं — और इनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की है जिन्होंने ऑनलाइन पढ़कर "दवा का नाम" खोजा। WHO ने 2024 में एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (AMR) को "साइलेंट पैंडेमिक" क़रार दिया — और भारत इस ख़तरे के केन्द्र में है।
WhatsApp यूनिवर्सिटी का मामला और भी गम्भीर है। एक ऑडिट में पाया गया कि भारत में WhatsApp पर फ़ॉरवर्ड होने वाले स्वास्थ्य सम्बन्धी मैसेज में से 70% से अधिक में कोई प्रमाणित स्रोत नहीं होता — ये बात Press Information Bureau (PIB) की फ़ैक्ट-चेक यूनिट ने बार-बार रेखांकित की है। "नीम की पत्ती से कैंसर ठीक होता है" या "लहसुन खाने से हार्ट अटैक नहीं आता" जैसे दावे लाखों बार शेयर होते हैं, और लोग असली इलाज में देरी कर बैठते हैं।
इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण यह कहता है कि असली समस्या इंटरनेट नहीं, बल्कि स्वास्थ्य जानकारी को परखने की क्षमता का अभाव है। एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी जब YouTube पर किसी अनजान चैनल की सलाह को AIIMS के दिशानिर्देश से बराबर मान लेता है, तो ख़तरा शुरू होता है। भारत के मेडिकल शिक्षा पाठ्यक्रम में "हेल्थ लिटरेसी" कहीं नहीं पढ़ाई जाती — न स्कूल में, न कॉलेज में।
आगे क्या? — बड़ा सवाल और ज़रूरी क़दम
सरकार का Ayushman Bharat Digital Mission (ABDM) एक सही दिशा है — यूनिक हेल्थ ID और डिजिटल हेल्थ रिकॉर्ड से मरीज़ और डॉक्टर के बीच सूचना का अन्तर कम होगा। लेकिन जब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियानों में "ऑनलाइन जानकारी को कैसे जाँचें" यह सिखाने को प्राथमिकता नहीं दी जाती, तब तक eSanjeevani जैसे प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ़ शहरी, शिक्षित तबके की सुविधा बने रहेंगे।
ICMR के पूर्व निदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने एक साक्षात्कार में कहा था कि भारत को हर ज़िले में "डिजिटल हेल्थ लिटरेसी सेंटर" की ज़रूरत है जहाँ लोगों को सिखाया जाए कि भरोसेमंद स्वास्थ्य जानकारी कहाँ मिलती है और फ़र्ज़ी दावों को कैसे पहचानें।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ यह होगा कि नई National Digital Health Policy में "हेल्थ मिसइन्फ़ॉर्मेशन" से निपटने के लिए कोई ठोस ढाँचा आता है या नहीं। अगर नहीं आता, तो वही 60% मरीज़ जो आज Google पर इलाज खोज रहे हैं, कल भी ग़लत दवाइयाँ खाते रहेंगे — और AMR का संकट भारत के लिए अगली महामारी बन सकता है।
असली विद्या वैद्य की वह नहीं जो स्क्रीन पर चमकती है — वह है जो आपको यह समझ दे कि स्क्रीन पर चमकने वाली हर चीज़ सच नहीं होती। और यही फ़र्क़ है जानकारी और समझदारी में।
यह रिपोर्ट पत्रकारिता है, चिकित्सा सलाह नहीं; किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारत में लगभग 60% शहरी मरीज़ डॉक्टर से पहले ऑनलाइन लक्षण खोजते हैं — The Lancet Digital Health, 2024।
- 52% भारतीय बिना डॉक्टरी सलाह के एंटीबायोटिक्स लेते हैं, जो AMR ख़तरे को बढ़ा रहा है — Indian Journal of Community Medicine।
- WhatsApp पर फ़ॉरवर्ड होने वाले 70%+ स्वास्थ्य मैसेज बिना प्रमाणित स्रोत के होते हैं — PIB फ़ैक्ट-चेक यूनिट।
- eSanjeevani पर 15 करोड़+ टेलीकंसल्टेशन — डिजिटल स्वास्थ्य की सम्भावना का प्रमाण।
- असली ज़रूरत "डिजिटल हेल्थ लिटरेसी" सिखाने की है — जानकारी परखने की क्षमता बिना, इंटरनेट इलाज नहीं ख़तरा है।
आँकड़ों में
- 60% शहरी भारतीय मरीज़ डॉक्टर से पहले Google खोजते हैं — The Lancet Digital Health 2024
- 52% भारतीय बिना प्रेस्क्रिप्शन एंटीबायोटिक्स लेते हैं — Indian Journal of Community Medicine 2024
- eSanjeevani पर 15 करोड़+ टेलीकंसल्टेशन — स्वास्थ्य मंत्रालय 2025
- PHC पर प्रति डॉक्टर 80-100 मरीज़ प्रतिदिन — NFHS-5





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