जम्मू-कश्मीर के स्कूलों में एक किताब में आतंकवादियों और अलगाववादी नेताओं को 'महान व्यक्तित्व' बताया गया है। भाजपा ने इसे 'एकेडमिक जिहाद' करार दिया और LG प्रशासन से जवाब माँगा। NDTV के अनुसार एक नागरिक संगठन ने इस मामले को उजागर किया है।

ज़रा सोचिए — जिस कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद से केंद्र सरकार 'नए दौर' का दावा करती नहीं थकती, जहाँ LG सीधे दिल्ली को रिपोर्ट करता है, जहाँ NCERT पाठ्यक्रम लागू करने की बातें होती हैं — उसी कश्मीर के स्कूलों में बच्चों के हाथ में एक ऐसी किताब पहुँच गई जो आतंकवादियों और अलगाववादियों को 'महान व्यक्तित्व' बताती है। NDTV के अनुसार एक नागरिक संगठन ने इस किताब की सामग्री का खुलासा किया, और India Today की रिपोर्ट बताती है कि इससे भारी आक्रोश फैल गया है।

भाजपा ने इसे 'एकेडमिक जिहाद' का नाम दिया है। News18 के अनुसार J&K भाजपा ने LG प्रशासन पर सीधा निशाना साधते हुए पूछा कि आख़िर वह कौन-सी प्रक्रिया है जिसमें इतने संवेदनशील विषय पर ऐसी सामग्री बिना किसी रोक-टोक के छप गई और बच्चों तक पहुँच गई। सवाल जायज़ है — और इसका जवाब सिर्फ़ एक किताब से कहीं ज़्यादा गहरा है।

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में इस पूरे मामले को लेकर दो एकदम अलग फुसफुसाहटें सुनाई दे रही हैं। पहली यह कि J&K का शिक्षा विभाग — जो 2019 के बाद भी बड़े पैमाने पर वही पुरानी नौकरशाही चला रहा है — उसमें अलगाववादी विचारधारा के प्रति सहानुभूति रखने वाले अधिकारी अभी भी अहम पदों पर बैठे हैं। एक किताब की मंज़ूरी कोई एक व्यक्ति नहीं देता; इसमें कई स्तरों पर कई लोगों की मोहर लगती है। अगर हर स्तर पर यह 'अनदेखी' हुई, तो यह अनदेखी कम, सहमति ज़्यादा लगती है।

दूसरी फुसफुसाहट ज़्यादा पेचीदा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए यह विवाद चुनावी लिहाज़ से 'सुनहरा मौक़ा' है। J&K में विधानसभा चुनावों के बाद से अब्दुल्ला सरकार और केंद्र के बीच का तनाव कोई छुपी बात नहीं। ऐसे में 'एकेडमिक जिहाद' जैसा नारा सिर्फ़ एक किताब के बारे में नहीं है — यह पूरी अब्दुल्ला-प्रशासन और कश्मीर के शिक्षा तंत्र को कठघरे में खड़ा करने का हथियार बन सकता है। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि भाजपा की केंद्रीय रणनीति J&K में 'कश्मीरी अस्मिता बनाम राष्ट्रीय एकता' के इस फ्रेम को अगले चुनावी साइकिल तक गर्म रखने की है।

(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

नौकरशाही की विफलता या गहरी जड़ें?

इस पूरे मामले का सबसे असहज करने वाला पहलू यह है कि LG प्रशासन सीधे गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। India Today की रिपोर्ट के अनुसार इस किताब में अलगाववादी नेताओं को 'ग्रेट पर्सनैलिटीज़' के तौर पर पेश किया गया — वही नेता जिनके ख़िलाफ़ NIA ने केस दर्ज किए हैं, जिनकी संपत्तियाँ ज़ब्त हुई हैं। अब सवाल यह है: अगर केंद्र शासन के छह साल बाद भी शिक्षा विभाग में ऐसी सामग्री को रोकने का कोई फ़िल्टर नहीं बन पाया, तो 'नए कश्मीर' का दावा कितना खोखला है?

NDTV के अनुसार जिस नागरिक संगठन ने यह मामला उठाया, उसने शिक्षा विभाग से यह भी पूछा है कि इस किताब के प्रकाशन और वितरण की अनुमति किसने दी। अब तक शिक्षा विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

370 के बाद का 'नया कश्मीर' — कितना बदला?

धारा 370 हटने के बाद केंद्र सरकार ने कश्मीर में शिक्षा सुधार को प्राथमिकता में रखा था। NCERT की किताबें, नए पाठ्यक्रम, शिक्षकों का प्रशिक्षण — सब कुछ एक नई नैरेटिव गढ़ने के लिए किया गया। लेकिन यह एक किताब बताती है कि सरकारी इच्छाशक्ति और ज़मीनी हक़ीक़त के बीच की खाई कितनी चौड़ी है। जब तक नौकरशाही का DNA नहीं बदलता — चाहे दिल्ली से कितने भी आदेश आएँ — सिस्टम वही पुराना सामान नई पैकेजिंग में परोसता रहेगा।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि यह विवाद सिर्फ़ एक किताब का मामला नहीं रहेगा। आने वाले दिनों में भाजपा इसे J&K के पूरे शिक्षा तंत्र की ऑडिट की माँग तक ले जा सकती है — और यह माँग सीधे-सीधे अब्दुल्ला सरकार की साख पर चोट करेगी। अगर LG प्रशासन जल्दी और सख़्त कार्रवाई नहीं करता — ज़िम्मेदार अधिकारियों की पहचान, किताब की तत्काल वापसी, और पूरी मंज़ूरी प्रक्रिया की जाँच — तो यह मामला संसद तक पहुँच सकता है। विपक्ष के लिए भी यह दोधारी तलवार है: अगर वह इसे 'भाजपा का ध्रुवीकरण' कहकर ख़ारिज करता है, तो सीधा सवाल आएगा — क्या वह आतंकियों को 'महान' बताने वाली सामग्री का बचाव कर रहा है?

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एक बात और ग़ौर करने लायक़ है। यह पहली बार नहीं है जब कश्मीर की पाठ्यपुस्तकों में विवादित सामग्री मिली है। लेकिन हर बार यही पैटर्न दोहराता है — खुलासा, हंगामा, आश्वासन, फिर चुप्पी। जब तक शिक्षा विभाग में नियुक्तियों और किताबों की मंज़ूरी की पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी नहीं बनाया जाता, यह 'एकेडमिक जिहाद' सिर्फ़ एक नारा बनकर रह जाएगा — और अगली किताब फिर छप जाएगी।

असली इम्तिहान न भाजपा का है, न अब्दुल्ला सरकार का — असली इम्तिहान उस सिस्टम का है जो दिल्ली से आदेश लेता है और श्रीनगर में उसे उलट देता है। जब तक यह नहीं बदलता, 'नया कश्मीर' सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ज़िंदा रहेगा — क्लासरूम में नहीं।

मुख्य बातें

  • J&K के स्कूलों में एक किताब ने आतंकवादियों और अलगाववादियों को 'महान व्यक्तित्व' बताया — NDTV और India Today दोनों की रिपोर्ट इसकी पुष्टि करती हैं।
  • भाजपा ने इसे 'एकेडमिक जिहाद' कहकर LG प्रशासन और शिक्षा विभाग पर सीधा निशाना साधा है (News18)।
  • धारा 370 हटने के छह साल बाद भी शिक्षा तंत्र में ऐसी सामग्री का पहुँचना केंद्र शासन की ज़मीनी पकड़ पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
  • शिक्षा विभाग की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है (NDTV)।
  • यह विवाद आने वाले दिनों में J&K के पूरे शिक्षा तंत्र की ऑडिट की माँग और संसदीय बहस तक जा सकता है।

आँकड़ों में

  • धारा 370 हटने के 6+ साल बाद भी J&K शिक्षा विभाग में विवादित सामग्री का मंज़ूरी तंत्र सवालों के घेरे में (NDTV, News18)।

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: जम्मू-कश्मीर भाजपा और एक नागरिक संगठन ने इस मामले को उठाया; शिक्षा विभाग और LG प्रशासन निशाने पर हैं (NDTV, News18)।
  • क्या: J&K के स्कूलों में इस्तेमाल हो रही एक किताब में आतंकवादियों और अलगाववादी नेताओं को 'महान व्यक्तित्व' (Great Personalities) के रूप में पेश किया गया है (India Today)।
  • कब: जून 2026 में यह मामला सार्वजनिक हुआ और तीव्र राजनीतिक विवाद बना (News18)।
  • कहाँ: जम्मू-कश्मीर के स्कूलों में यह किताब वितरित की गई (NDTV)।
  • क्यों: भाजपा का आरोप है कि शिक्षा तंत्र में अलगाववादी मानसिकता वाले तत्व अभी भी सक्रिय हैं जिन्होंने ऐसी सामग्री को मंज़ूरी दी (News18)।
  • कैसे: एक नागरिक संगठन ने किताब की सामग्री का खुलासा किया, जिसके बाद भाजपा ने इसे 'एकेडमिक जिहाद' बताते हुए LG प्रशासन से कार्रवाई की माँग की (NDTV, India Today)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

J&K की स्कूली किताब में आतंकियों को 'महान व्यक्तित्व' क्यों बताया गया?

NDTV और India Today के अनुसार J&K के स्कूलों में वितरित एक किताब में आतंकवादियों और अलगाववादी नेताओं को 'ग्रेट पर्सनैलिटीज़' के रूप में पेश किया गया। भाजपा ने आरोप लगाया कि शिक्षा विभाग में अलगाववादी मानसिकता वाले तत्व अभी भी सक्रिय हैं। शिक्षा विभाग ने अब तक कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया है।

'एकेडमिक जिहाद' का मतलब क्या है और यह नारा किसने दिया?

News18 के अनुसार J&K भाजपा ने यह शब्द इस्तेमाल किया, जिसका अर्थ है कि शिक्षा के माध्यम से अलगाववादी और आतंकी विचारधारा को बच्चों में बोया जा रहा है। भाजपा ने इसे LG प्रशासन की नाकामी करार दिया।

क्या LG प्रशासन ने इस किताब पर कोई कार्रवाई की है?

NDTV के अनुसार अब तक शिक्षा विभाग या LG प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या कार्रवाई की ख़बर सामने नहीं आई है।

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