पंजाब कांग्रेस में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले फिर गुटबाज़ी उभर आई है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक चन्नी खेमे की बढ़ती ताक़त और पोल पैनलों में क्षेत्रीय असंतुलन ने पार्टी के भीतर वही पुराना टकराव ज़िंदा कर दिया है, जो हर चुनाव से पहले कांग्रेस को अंदर से खोखला करता रहा है।
कांग्रेस और पंजाब का रिश्ता किसी ऐसे जोड़े जैसा है जो हर बार तलाक़ की अर्ज़ी दायर करता है, फिर 'बच्चों की ख़ातिर' साथ रह लेता है — और अगली शादी की सालगिरह पर फिर वही तमाशा। 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन पंजाब कांग्रेस में गुटबाज़ी का सीज़न पहले ही शुरू हो चुका है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि पार्टी के भीतर वही 'पुरानी स्क्रिप्ट' फिर चल पड़ी है — बस किरदारों के नाम बदल गए हैं।
इस बार का केंद्रीय संघर्ष चरणजीत सिंह चन्नी खेमे की बढ़ती ताक़त को लेकर है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, चन्नी कैंप की मौजूदा चाल 2015 में कैप्टन अमरिंदर सिंह की उस पावर प्ले की हूबहू नक़ल है जिसमें उन्होंने चुनाव से पहले ही संगठन पर अपनी पकड़ इतनी मज़बूत कर ली थी कि बाक़ी दावेदार हाशिये पर चले गए। वही ब्लूप्रिंट अब नए हाथों में है।
रिपोर्ट में एक और तीखी बात सामने आई है — पंजाब कांग्रेस के पोल पैनलों में गंभीर क्षेत्रीय असंतुलन है। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, मालवा, दोआबा और माझा — पंजाब के तीन प्रमुख क्षेत्रों में पार्टी पैनलों का गठन एक क्षेत्र और एक गुट की तरफ़ झुका हुआ है। यह सिर्फ़ 'संतुलन की कमी' नहीं — यह जानबूझकर खेला गया दांव है जो बाक़ी खेमों को संदेश देता है: या तो लाइन में आओ, या बाहर रहो।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि चन्नी खेमा दलित वोट बैंक को अपनी 'अंतिम ढाल' बनाकर हाईकमान के सामने यह दांव लगा रहा है कि मुख्यमंत्री चेहरा बदलने की हिम्मत अब दिल्ली में किसी की नहीं। दूसरी तरफ़, सिद्धू समर्थक नाराज़ हैं — उनका मानना है कि 2022 में जो 'कुर्सी का वादा' किया गया था, वह चन्नी की ताजपोशी के बाद हवा हो गया और अब दोबारा वही खेल दोहराया जा रहा है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के क़रीबी सूत्रों के हवाले से चर्चा है कि राहुल गांधी की टीम '2027 प्लानिंग' में पंजाब को 'ज़रूरी लेकिन मुश्किल' की कैटेगरी में रखती है — न छोड़ सकते हैं, न सुलझा सकते हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट सियासी अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
वही स्क्रिप्ट, वही नतीजा — या इस बार कुछ अलग?
ज़रा पीछे मुड़कर देखिए। 2017 से पहले कैप्टन बनाम प्रताप सिंह बाजवा। 2022 से पहले कैप्टन बनाम सिद्धू बनाम चन्नी — तीन-तरफ़ा महाभारत जिसमें पार्टी ने पहले अमरिंदर को हटाया, फिर चन्नी को बिठाया, फिर सिद्धू को 'प्रदेश अध्यक्ष' का ताज देकर शांत किया, और आख़िर में तीनों गुट एक-दूसरे को काटते हुए AAP के सामने ढेर हो गए। नतीजा: 117 में से सिर्फ़ 18 सीटें — इतिहास की सबसे बुरी हार। अब 2027 की तैयारी में वही किरदार, वही गलियारे, वही फुसफुसाहटें।
असली सवाल यह नहीं कि पंजाब कांग्रेस में गुटबाज़ी क्यों होती है — हर पार्टी में गुट होते हैं। असली सवाल यह है कि दिल्ली हाईकमान बार-बार इसे 'मैनेज' करने का दावा क्यों करती है और बार-बार विफल क्यों होती है? इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यह है कि कांग्रेस का 'पंजाब मॉडल' दरअसल कोई मॉडल है ही नहीं — यह रिएक्शन मोड है। जब तक संकट न फूटे, दिल्ली हिलती नहीं। जब फूटता है तो जल्दबाज़ी में कोई 'समझौता उम्मीदवार' थोपा जाता है, जिसे न ज़मीनी ताक़त मिलती है न समय।
यही पैटर्न सिर्फ़ पंजाब तक सीमित नहीं
यह बीमारी पंजाब की नहीं, कांग्रेस के DNA की है। राजस्थान में गहलोत-पायलट, मध्य प्रदेश में कमलनाथ-सिंधिया, उत्तर प्रदेश में हर बार नया चेहरा और फिर वही पुराना सूनापन — हर राज्य में स्क्रिप्ट एक जैसी है। केंद्रीय नेतृत्व स्थानीय नेता को पूरी ताक़त देने से डरता है कि कहीं वह 'बहुत बड़ा' न हो जाए, और इस डर में इतनी कतरन करता है कि कोई भी इतना बड़ा नहीं बचता कि चुनाव जीत सके।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में जो 'क्षेत्रीय असंतुलन' का ज़िक्र है, वह इसी डर का लक्षण है। अगर एक गुट को पैनलों में तरजीह दी जा रही है, तो इसका मतलब हाईकमान ने अभी से अपना 'प्रिफ़र्ड कैंडिडेट' चुन लिया है — लेकिन इसे खुलकर ऐलान करने की हिम्मत नहीं है। यही अधूरापन ज़हर बनता है। 2022 में यही हुआ — चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन सिद्धू को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा, दोनों को लगा वे 'असली बॉस' हैं, और नतीजा सबके सामने है।
आगे क्या होगा — और किसकी बलि चढ़ेगी?
अगर इतिहास कोई संकेत है — और कांग्रेस के मामले में इतिहास सबसे भरोसेमंद भविष्यवक्ता है — तो आने वाले महीनों में तीन चीज़ें देखने को मिलेंगी। पहला, चन्नी खेमा अपनी पकड़ और मज़बूत करेगा और किसी न किसी बहाने 'दलित चेहरा' का नैरेटिव आगे रखेगा। दूसरा, नाराज़ गुट दिल्ली में 'शिकायती दौरे' शुरू करेंगे — जैसे पायलट ने राजस्थान में किए थे। तीसरा, हाईकमान अंतिम समय तक फ़ैसला टालेगी और जब टालना असंभव होगा तब 'कंप्रोमाइज़ फ़ॉर्मूला' लाएगी जो किसी को ख़ुश नहीं करेगा।
इस बीच AAP और शिरोमणि अकाली दल चुपचाप बैठकर तमाशा देख रहे होंगे। उन्हें कुछ करने की ज़रूरत नहीं — कांग्रेस ख़ुद अपना सबसे बड़ा विपक्ष है।
पंजाब कांग्रेस का असली सवाल किसी गुट की जीत-हार का नहीं है — सवाल यह है कि क्या एक ऐसी पार्टी जो अपने घर में ही शांति नहीं रख सकती, बाहर किसी को शांति और विकास का वादा कर सकती है? जब तक हाईकमान 'मैनेजमेंट' और 'नेतृत्व' के बीच का फ़र्क़ नहीं समझती, पंजाब में हर चुनाव से पहले यही कांग्रेसी महाभारत दोहराई जाती रहेगी।
आरोप और बयान संबंधित सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित हैं; जब तक कोई न्यायालय निर्णय न दे, ये अप्रमाणित हैं। सब-ज्यूडिस मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- पंजाब कांग्रेस में 2027 चुनाव से पहले फिर गुटबाज़ी शुरू — चन्नी खेमे की ताक़त बढ़ी, पोल पैनलों में क्षेत्रीय असंतुलन (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- चन्नी कैंप की रणनीति 2015 में कैप्टन अमरिंदर सिंह की पावर प्ले जैसी — संगठन पर पकड़ मज़बूत करने की कोशिश (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- 2022 में कांग्रेस को 117 में से सिर्फ़ 18 सीटें मिली थीं — गुटबाज़ी सबसे बड़ा कारण
- यही पैटर्न राजस्थान (गहलोत-पायलट), MP (कमलनाथ-सिंधिया), UP में भी दोहराया जा चुका है
- दिल्ली हाईकमान का 'मैनेजमेंट मोड' हर बार रिएक्टिव रहता है — प्रोएक्टिव नेतृत्व का अभाव
आँकड़ों में
- 2022 पंजाब चुनाव में कांग्रेस को 117 में से सिर्फ़ 18 सीटें मिलीं — गुटबाज़ी के बाद इतिहास की सबसे बुरी हार
- पंजाब के तीन प्रमुख क्षेत्र — मालवा, दोआबा, माझा — पोल पैनलों में क्षेत्रीय असंतुलन की शिकायत (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पंजाब कांग्रेस के प्रमुख गुट — चरणजीत सिंह चन्नी खेमा, नवजोत सिंह सिद्धू समर्थक, और दिल्ली हाईकमान (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- क्या: चुनावी पैनलों में क्षेत्रीय असंतुलन और चन्नी खेमे की बढ़ती ताक़त ने पार्टी में खुली गुटबाज़ी शुरू कर दी है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- कब: जुलाई 2026, 2027 पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी के दौरान
- कहाँ: पंजाब और कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व, नई दिल्ली
- क्यों: चन्नी खेमे की रणनीतिक पोज़िशनिंग 2015 में कैप्टन अमरिंदर सिंह की पावर प्ले जैसी है, जिससे बाकी गुट असुरक्षित हैं (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
- कैसे: पोल पैनलों में एक क्षेत्र/गुट को तरजीह देकर संगठन पर पकड़ मज़बूत की जा रही है, जबकि दूसरे गुटों को हाशिये पर धकेला जा रहा है (टाइम्स ऑफ़ इंडिया)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पंजाब कांग्रेस में 2027 चुनाव से पहले गुटबाज़ी क्यों हो रही है?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक चन्नी खेमे ने संगठन और पोल पैनलों पर पकड़ मज़बूत की है, जिससे दूसरे गुट — ख़ासकर सिद्धू समर्थक — नाराज़ हैं। पैनलों में क्षेत्रीय असंतुलन ने टकराव बढ़ाया है।
चन्नी कैंप की रणनीति कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसी कैसे है?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे 2015 में कैप्टन ने चुनाव से पहले संगठन पर एकाधिकार जमाया था, वैसे ही चन्नी खेमा पोल पैनलों और पार्टी संरचना में अपने लोगों को बैठाकर बढ़त बना रहा है।
2022 में पंजाब कांग्रेस की हार का मुख्य कारण क्या था?
कैप्टन-सिद्धू-चन्नी के बीच तीन-तरफ़ा गुटबाज़ी के कारण पार्टी बिखर गई और AAP के सामने 117 में से सिर्फ़ 18 सीटों पर सिमट गई — यह इतिहास की सबसे बुरी हार थी।
क्या कांग्रेस की गुटबाज़ी सिर्फ़ पंजाब तक सीमित है?
नहीं। यही पैटर्न राजस्थान में गहलोत-पायलट, मध्य प्रदेश में कमलनाथ-सिंधिया और उत्तर प्रदेश में बार-बार दोहराया जा चुका है। मूल समस्या हाईकमान के केंद्रीकृत और रिएक्टिव नेतृत्व शैली में है।





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