चावल से पेट्रोल बनाओ, थाली महँगी करो — E20 का 'ग्रीन सपना' हिंदी बेल्ट की रसोई में किसकी जेब काटेगा?
E20 इथेनॉल नीति में चावल से इथेनॉल बनाने को लेखिका ए. रंगनाथन ने News18 पर 'अपराध' करार दिया है। उनका तर्क: भारत जैसे देश में जहाँ करोड़ों लोग सस्ते अनाज पर निर्भर हैं, खाद्यान्न को ईंधन में बदलना खाद्य सुरक्षा और कीमतों दोनों के लिए ख़तरनाक है।
एक देश जहाँ 80 करोड़ से ज़्यादा लोगों को मुफ़्त राशन बँटता है, वहाँ अगर चावल पेट्रोल टंकी में डाला जाए तो क्या होगा? E20 इथेनॉल नीति में चावल के इस्तेमाल को लेकर यही सवाल अब सिर्फ़ नीतिगत बहस नहीं रहा — यह हिंदी बेल्ट की रसोई और खेत, दोनों की राजनीति का बारूद बनने जा रहा है।
लेखिका और तीखी टिप्पणीकार ए. रंगनाथन ने News18 पर प्रकाशित अपने लेख में सीधे शब्दों में कहा है कि खाद्यान्न से इथेनॉल बनाना 'अपराध' (criminal) है। उनका तर्क साफ़ है: भारत खाद्य-अतिरिक्त (food-surplus) देश ज़रूर है, लेकिन यह अतिरिक्त इतना नाज़ुक है कि एक ख़राब मानसून या वैश्विक आपूर्ति संकट इसे पलट सकता है। जब दुनिया के सबसे बड़े अनाज वितरण कार्यक्रम (PMGKAY और NFSA) का ढाँचा चावल पर टिका हो, तो उसी चावल को ईंधन फ़ीडस्टॉक बनाना खाद्य सुरक्षा की नींव में सेंध लगाना है।
News18 की ही विस्तृत रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार का पक्ष यह है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल का आयात बिल ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा घटा है, ग्रामीण डिस्टिलरीज़ में रोज़गार बना है, और किसानों को MSP से ऊपर भाव मिल रहा है क्योंकि डिस्टिलरीज़ प्रतिस्पर्धी ख़रीदार के रूप में बाज़ार में आई हैं। सरकारी तर्क में दम है — इथेनॉल सप्लाई चेन ने गन्ना बेल्ट में पश्चिमी UP और महाराष्ट्र के किसानों की हालत सुधारी है, और चावल को फ़ीडस्टॉक में शामिल करने से बिहार-छत्तीसगढ़ के धान किसानों को भी यही फ़ायदा पहुँचाने का लक्ष्य है।
लेकिन यहीं कहानी पलटती है। रंगनाथन और कई खाद्य नीति विशेषज्ञ एक बुनियादी सवाल उठाते हैं: अगर FCI के गोदामों से 'अतिरिक्त' चावल डिस्टिलरीज़ को जा रहा है, तो वह अतिरिक्त किसने तय किया? आज जो स्टॉक 'ज़रूरत से ज़्यादा' दिखता है, वह कल बाढ़, सूखे या अंतरराष्ट्रीय निर्यात प्रतिबंधों के बीच बफ़र का काम करता है। 2022 में जब भारत ने चावल निर्यात पर पाबंदियाँ लगाईं, तो वह इसीलिए कि घरेलू स्टॉक पर दबाव बढ़ रहा था — उसी दौर में इथेनॉल के लिए चावल की आपूर्ति जारी रही। यह विरोधाभास है जिसे कोई सरकारी प्रेस नोट नहीं समझाता।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि E20 की समयसीमा 2025-26 में इसलिए आक्रामक रखी गई क्योंकि यह 'ग्रीन इंडिया' की वैश्विक छवि और ऑयल इंपोर्ट बिल — दोनों पर एक साथ निशाना साधती है। लेकिन अब 2027 UP-बिहार विधानसभा चुनावों की छाया में ट्रेड हलकों और विपक्षी खेमों में चर्चा है कि खाद्य महँगाई अगर चावल की क़ीमतों से भड़की, तो E20 का 'ग्रीन टैग' सत्तारूढ़ दल के लिए बचाव कवच नहीं, बल्कि हमले की सतह बन जाएगा। विपक्ष के रणनीतिकार पहले से इसे 'अमीरों की गाड़ी चले, ग़रीब की थाली ख़ाली' जैसे नारों में ढालने की तैयारी कर रहे हैं — यह वही भाषा है जो हिंदी बेल्ट के मतदाता को सबसे सीधे छूती है।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
जो कोण बाकी मीडिया से छूट रहा है और जिसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है, वह यह: यह बहस सिर्फ़ 'चावल बनाम पेट्रोल' नहीं है। यह असल में दो भारतों के बीच की टक्कर है — एक भारत जो ऊर्जा आत्मनिर्भरता और कार्बन क्रेडिट की भाषा बोलता है, और दूसरा भारत जो ₹2 किलो चावल पर ज़िंदा है। जब तक सरकार यह साबित नहीं कर पाती कि इथेनॉल फ़ीडस्टॉक के लिए चावल का इस्तेमाल खाद्य कीमतों को नहीं छूता, तब तक रंगनाथन जैसी आवाज़ें और तेज़ होंगी — और 2027 में मतदाता अपने अनुभव से फ़ैसला करेगा, प्रेस नोट से नहीं।
गन्ने से इथेनॉल बनाना अलग बात थी — गन्ना मुख्य खाद्यान्न नहीं है, और चीनी का अतिरिक्त स्टॉक वाक़ई बोझ था। लेकिन चावल भारतीय थाली का रीढ़ की हड्डी है। अमेरिका जब मक्के से इथेनॉल बनाता है तो वहाँ मक्का मुख्य भोजन नहीं है और प्रति हेक्टेयर उपज कई गुना ज़्यादा है — भारत की तुलना वहाँ से करना बेमानी है।
सरकार के पास अभी दो रास्ते हैं। पहला: चावल की जगह दूसरे नॉन-फ़ूड फ़ीडस्टॉक (बाँस, कृषि अवशेष, टूटा अनाज जो खाने योग्य नहीं) की तरफ़ तेज़ी से शिफ़्ट करे — जो तकनीकी रूप से कठिन पर राजनीतिक रूप से सुरक्षित है। दूसरा: चावल से इथेनॉल जारी रखे और दाँव लगाए कि कीमतें क़ाबू में रहेंगी — जो अच्छे मानसून पर निर्भर जुआ है।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ होगा कि सरकार FCI के चावल आवंटन में कोई कटौती करती है या नहीं। अगर मानसून सामान्य रहा तो शायद यह बहस अकादमिक बनी रहे। लेकिन अगर जुलाई-अगस्त में बारिश कम हुई, तो चावल की क़ीमत, इथेनॉल का हिस्सा और राशन की उपलब्धता — तीनों एक साथ सुर्खियों में होंगे। और तब यह सवाल किसी ऑप-एड कॉलम में नहीं, हिंदी बेल्ट की हर चुनावी सभा में गूँजेगा।
असली सवाल यह नहीं है कि ए. रंगनाथन सही हैं या सरकार — असली सवाल यह है कि जब रसोई का बजट और पेट्रोल पंप का बिल एक ही नीति से जुड़ जाए, तो सबसे पहले किसकी चीख़ सुनी जाएगी — गाड़ी चलाने वाले की, या चूल्हा जलाने वाले की?
आरोप और दावे संबंधित स्रोतों के हवाले से प्रस्तुत हैं; जब तक कोर्ट फ़ैसला न दे, ये अप्रमाणित हैं। उप-न्यायिक मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- ए. रंगनाथन ने News18 पर चावल से इथेनॉल बनाने को 'अपराध' बताया — तर्क: खाद्य सुरक्षा ख़तरे में
- सरकार का दावा: इथेनॉल ब्लेंडिंग से ₹30,000 करोड़+ का तेल आयात बचा और किसानों को MSP से ऊपर भाव मिला
- 2027 UP-बिहार चुनावों से पहले चावल महँगाई E20 नीति को विपक्ष के सबसे बड़े हमले का हथियार बना सकती है
- गन्ने से इथेनॉल और चावल से इथेनॉल में बुनियादी फ़र्क़ — चावल भारतीय थाली की रीढ़ है, गन्ना नहीं
- मानसून की गुणवत्ता तय करेगी कि यह बहस अकादमिक रहती है या चुनावी बारूद बनती है
आँकड़ों में
- News18 के अनुसार इथेनॉल ब्लेंडिंग से भारत का कच्चे तेल का आयात बिल ₹30,000 करोड़ से ज़्यादा घटा है
- 80 करोड़+ भारतीय NFSA/PMGKAY के तहत मुफ़्त या रियायती अनाज पर निर्भर हैं — जिसमें चावल मुख्य है
- 2022 में भारत ने घरेलू स्टॉक दबाव के चलते चावल निर्यात पर पाबंदियाँ लगाईं — उसी दौर में इथेनॉल हेतु चावल आपूर्ति जारी रही
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: लेखिका और टिप्पणीकार ए. रंगनाथन, केंद्र सरकार की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति, हिंदी बेल्ट के चावल उत्पादक किसान और उपभोक्ता
- क्या: E20 नीति (पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण) में चावल सहित खाद्यान्न के इस्तेमाल पर तीखी बहस — रंगनाथन ने इसे राष्ट्रीय हित के विरुद्ध बताया (News18 के अनुसार)
- कब: जून 2026 — E20 लक्ष्य की समयसीमा नज़दीक आने के साथ बहस तेज़
- कहाँ: भारत, विशेषकर हिंदी बेल्ट के चावल उत्पादक राज्य — UP, बिहार, छत्तीसगढ़, MP
- क्यों: क्योंकि चावल को ईंधन में बदलने से खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ता है और कीमतें ऊपर जा सकती हैं — जबकि सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को बेहतर दाम और ऊर्जा आत्मनिर्भरता मिलेगी
- कैसे: सरकार FCI और राज्य एजेंसियों के ज़रिए अतिरिक्त चावल स्टॉक को डिस्टिलरीज़ को देती है; डिस्टिलरीज़ इथेनॉल बनाकर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को बेचती हैं जो पेट्रोल में मिलाती हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
E20 इथेनॉल पॉलिसी क्या है और इसमें चावल का क्या रोल है?
E20 नीति के तहत पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाया जाता है। पहले इथेनॉल मुख्यतः गन्ने से बनता था, अब सरकार ने FCI के 'अतिरिक्त' चावल स्टॉक को भी डिस्टिलरीज़ को फ़ीडस्टॉक के रूप में देना शुरू किया है — News18 की रिपोर्ट के अनुसार।
चावल से इथेनॉल बनाने से खाद्य कीमतें क्यों बढ़ सकती हैं?
चावल भारत का मुख्य खाद्यान्न है और 80 करोड़+ लोग सरकारी राशन पर निर्भर हैं। जब चावल का एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में चला जाता है, तो बाज़ार में आपूर्ति घटती है और क़ीमतें बढ़ सकती हैं — ख़ासकर ख़राब मानसून वाले साल में।
ए. रंगनाथन ने E20 नीति पर क्या कहा?
लेखिका ए. रंगनाथन ने News18 पर प्रकाशित लेख में चावल से इथेनॉल बनाने को 'criminal' (अपराध) करार दिया और कहा कि यह भारत जैसे देश में खाद्य सुरक्षा के लिए ख़तरनाक है।
E20 नीति का 2027 चुनावों पर क्या असर हो सकता है?
अगर चावल की क़ीमतें बढ़ीं तो विपक्ष E20 को 'अमीरों की गाड़ी के लिए ग़रीब की थाली' के रूप में पेश कर सकता है — हिंदी बेल्ट के UP-बिहार विधानसभा चुनावों में यह बड़ा मुद्दा बन सकता है।





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