पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में TTP ठिकानों पर हवाई हमले तेज़ किए हैं, जिस पर संयुक्त राष्ट्र ने नागरिक हताहतों और मानवीय संकट को लेकर गहरी चिंता जताई है। दशकों की 'गुड तालिबान-बैड तालिबान' नीति अब पाकिस्तान के ही गले की फाँस बन चुकी है।
वो सांप जो आप ख़ुद पालते हैं, वो पड़ोसी को काटने की गारंटी नहीं देता — कभी-कभी अपने ही पालने वाले की बाँह पर दाँत गड़ा देता है। 2026 में पाकिस्तान के सामने यही तस्वीर है: दशकों तक जिस तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को रावलपिंडी ने 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' के नाम पर आँख मूँदकर पनपने दिया, आज वही संगठन पाकिस्तान की छाती पर बम फोड़ रहा है — और इस्लामाबाद मजबूरन अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन पर बम बरसा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र ने ताज़ा बयान में इन हमलों पर गहरी चिंता जताई है। UN की चिंता सिर्फ़ भू-राजनीतिक नहीं है — ज़मीनी सच्चाई यह है कि पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक में नागरिक मारे जा रहे हैं, विस्थापन बढ़ रहा है, और पहले से तबाह अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय संकट और गहरा हो रहा है। लोकमत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़ UN ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
लेकिन असली कहानी बमों के पीछे है, बमों में नहीं।
जब 'गुड तालिबान' ने करवट बदली
पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने दशकों तक एक ख़तरनाक खेल खेला — तालिबान को दो हिस्सों में बाँटकर देखा: एक 'गुड तालिबान' जो अफ़ग़ानिस्तान और कश्मीर में भारत के ख़िलाफ़ काम आए, और एक 'बैड तालिबान' (TTP) जो पाकिस्तान के भीतर हमले करे। यह बँटवारा हमेशा काग़ज़ी था — ज़मीन पर दोनों के कैडर, फ़ंडिंग और विचारधारा एक-दूसरे में घुलती-मिलती रही।
2021 में जब अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान छोड़ा और तालिबान सत्ता में लौटा, तो पाकिस्तान ने सबसे पहले जश्न मनाया — 'हमारे लड़के' जीत गए। लेकिन जश्न की स्याही सूखने से पहले ही हक़ीक़त सामने आ गई: काबुल में बैठे अफ़ग़ान तालिबान ने TTP को अपनी ज़मीन से निकालने से साफ़ इनकार कर दिया। सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि TTP के शीर्ष कमांडर पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में खुलेआम रहते हैं, ट्रेनिंग कैंप चलाते हैं, और वहीं से पाकिस्तान में हमलों की प्लानिंग करते हैं।
नतीजा? 2023 से पाकिस्तान में आतंकी हमलों में भारी बढ़ोतरी। इंस्टीट्यूट फ़ॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस की ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान लगातार दुनिया के सबसे आतंक-प्रभावित देशों में बना हुआ है — और TTP इसका सबसे बड़ा कारक है।
डूरंड लाइन: वो 'सरहद' जो कभी सरहद थी ही नहीं
इस पूरे संकट की जड़ में एक और ऐतिहासिक ज़ख़्म है — डूरंड लाइन। 1893 में ब्रिटिश भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच खींची गई यह रेखा कभी भी अफ़ग़ान सरकारों ने — चाहे वो राजशाही हो, गणतंत्र हो या तालिबान — अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में स्वीकार नहीं की। दोनों तरफ़ पश्तून आबादी बसती है, रिश्तेदारियाँ हैं, क़बीलाई वफ़ादारियाँ हैं जो किसी नक़्शे की लकीर नहीं मानतीं।
जब पाकिस्तान अफ़ग़ान ज़मीन पर बम गिराता है, तो काबुल इसे अपनी 'संप्रभुता का उल्लंघन' कहता है — भले ही वो सरकार ख़ुद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता-प्राप्त नहीं है। यह विडंबना कम, भू-राजनीतिक गतिरोध ज़्यादा है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि रावलपिंडी का यह आक्रामक रुख़ सिर्फ़ सुरक्षा के बारे में नहीं — यह पाकिस्तानी फ़ौज की घरेलू राजनीतिक ज़रूरत भी है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था IMF के सहारे साँस ले रही है, बलूचिस्तान में अलगाववादी आंदोलन सुलग रहा है, और सिविल-मिलिट्री तनाव चरम पर है। ऐसे में 'बाहरी दुश्मन' पर ज़ोरदार कार्रवाई दिखाना फ़ौज के लिए जनता और राजनीतिक वर्ग दोनों के सामने अपनी प्रासंगिकता साबित करने का ज़रिया है।
विश्लेषकों के हलक़ों में चर्चा यह भी है कि चीन — जो पाकिस्तान का सबसे बड़ा सहारा है — ने CPEC कॉरिडोर पर बढ़ते हमलों से चिढ़कर इस्लामाबाद पर दबाव बढ़ाया है कि TTP को निपटाओ, वरना निवेश और रुकेगा।
(यह सियासी गलियारों में चल रही चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत के लिए इशारा — और सबक़
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम एक ज़िंदा केस स्टडी है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही कहता है कि पाकिस्तान की 'स्ट्रैटेजिक डेप्थ' पॉलिसी का यह दर्दनाक अंत भारत की उस पुरानी चेतावनी की पुष्टि है जो नई दिल्ली दशकों से हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देती रही है — आतंकवाद में 'गुड' और 'बैड' का फ़र्क़ नहीं होता; आग पालोगे तो जलोगे ज़रूर।
लेकिन इसमें भारत के लिए सीधा ख़तरा भी है। अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर बढ़ती अस्थिरता का मतलब है कि TTP और उससे जुड़े जिहादी नेटवर्क दबाव में और बिखरेंगे — और बिखरे हुए लड़ाके नए ठिकाने तलाशते हैं। LoC पर भारत को अपनी सतर्कता और कड़ी रखनी होगी। साथ ही, भारत के लिए यह कूटनीतिक मौक़ा भी है — UN में पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद का यह 'सेल्फ़-गोल' उजागर करने का।
UN की चिंता असल में किसकी चिंता है?
UN का बयान दिखने में तटस्थ है — 'दोनों पक्ष संयम बरतें।' लेकिन इसकी टाइमिंग और भाषा दोनों महत्वपूर्ण हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्ट्स के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में 2.3 करोड़ से अधिक लोग गंभीर खाद्य संकट झेल रहे हैं — ऐसे में बमबारी से बढ़ता विस्थापन एक और मानवीय तबाही का रास्ता खोलता है। UN की चिंता सिर्फ़ भू-राजनीतिक खेल नहीं, ज़मीनी इंसानी दर्द है।
लेकिन UN की 'चिंता' का असर कितना होता है, यह भी सब जानते हैं। न पाकिस्तान रुकेगा, न तालिबान झुकेगा — और बीच में अफ़ग़ान नागरिक पिसते रहेंगे, जैसा दशकों से होता आया है।
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मुख्य बातें
- पाकिस्तान की 'गुड तालिबान-बैड तालिबान' नीति पूरी तरह विफल — TTP अब अफ़ग़ान ज़मीन से पाकिस्तान पर ही हमले कर रहा है।
- UN ने पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक से नागरिक हताहतों और विस्थापन पर गहरी चिंता जताई, दोनों पक्षों से संयम की अपील।
- अफ़ग़ान तालिबान ने TTP को अपनी ज़मीन से हटाने से इनकार किया — डूरंड लाइन विवाद इस गतिरोध को और जटिल बनाता है।
- भारत के लिए दोहरा संकेत: कूटनीतिक मौक़ा भी, और LoC पर जिहादी नेटवर्क के बिखराव से बढ़ता ख़तरा भी।
- पाकिस्तानी फ़ौज की आक्रामकता के पीछे घरेलू राजनीतिक मजबूरी और चीन का CPEC-संबंधी दबाव भी माना जा रहा है।
आँकड़ों में
- अफ़ग़ानिस्तान में 2.3 करोड़ से अधिक लोग गंभीर खाद्य संकट में हैं — अंतरराष्ट्रीय संगठनों की रिपोर्ट्स के अनुसार।
- ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स के मुताबिक़ पाकिस्तान लगातार दुनिया के सबसे आतंक-प्रभावित देशों में शामिल है।
- डूरंड लाइन 1893 में खींची गई — 130 से अधिक वर्षों में किसी भी अफ़ग़ान सरकार ने इसे अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पाकिस्तानी सेना, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), अफ़ग़ान तालिबान सरकार, और संयुक्त राष्ट्र (UN)।
- क्या: पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान के भीतर TTP ठिकानों पर एयरस्ट्राइक किए, जिस पर UN ने नागरिक प्रभाव और क्षेत्रीय अस्थिरता पर चिंता व्यक्त की है।
- कब: 2026 में हालिया हफ़्तों में हमले तेज़ हुए; UN ने ताज़ा बयान में चिंता जताई।
- कहाँ: अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान सीमा (डूरंड लाइन) के दोनों ओर, ख़ासकर पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के सीमावर्ती इलाक़ों में।
- क्यों: TTP ने अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन से पाकिस्तान में हमलों की आवृत्ति बढ़ा दी है, और अफ़ग़ान तालिबान सरकार TTP के ख़िलाफ़ कार्रवाई में असमर्थ या अनिच्छुक है।
- कैसे: पाकिस्तानी वायुसेना ने क्रॉस-बॉर्डर एयरस्ट्राइक किए; अफ़ग़ान तालिबान ने इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया; UN ने नागरिक हताहतों की रिपोर्ट के आधार पर दोनों पक्षों से संयम की अपील की।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान पर एयरस्ट्राइक क्यों कर रहा है?
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में ठिकाने बनाकर पाकिस्तान में हमले कर रहा है। अफ़ग़ान तालिबान सरकार TTP के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में असमर्थ या अनिच्छुक है, जिससे पाकिस्तान ने ख़ुद क्रॉस-बॉर्डर एयरस्ट्राइक शुरू किए हैं।
UN ने पाकिस्तानी हमलों पर क्या कहा?
संयुक्त राष्ट्र ने इन हमलों से नागरिक हताहतों और विस्थापन पर गहरी चिंता जताई है और दोनों पक्षों — पाकिस्तान और अफ़ग़ान तालिबान — से संयम बरतने और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है।
'गुड तालिबान-बैड तालिबान' नीति क्या है और यह कैसे विफल हुई?
पाकिस्तानी सुरक्षा प्रतिष्ठान ने दशकों तक तालिबान को दो श्रेणियों में बाँटा — 'गुड तालिबान' जो भारत/अफ़ग़ानिस्तान के ख़िलाफ़ उपयोगी हो, और 'बैड तालिबान' (TTP) जो पाकिस्तान पर हमले करे। लेकिन ज़मीन पर दोनों के कैडर और विचारधारा हमेशा मिले-जुले रहे, और अब TTP अफ़ग़ान तालिबान की शरण में रहकर पाकिस्तान पर ही हमले कर रहा है।
भारत के लिए इसके क्या मायने हैं?
भारत के लिए यह दोहरा संकेत है: एक ओर UN मंचों पर पाकिस्तान-प्रायोजित आतंकवाद का 'सेल्फ़-गोल' उजागर करने का कूटनीतिक मौक़ा है, दूसरी ओर सीमा पर बिखरते जिहादी नेटवर्क से LoC पर ख़तरा बढ़ सकता है।




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