रेलवे के जूनियर इंजीनियर (JE) और सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) 8वें वेतन आयोग के गठन से पहले ग्रुप B (राजपत्रित) दर्जा, वेतन समानता और बेहतर करियर ग्रोथ की मांग कर रहे हैं। Livemint की रिपोर्ट के अनुसार, ये इंजीनियर तकनीकी रूप से रेलवे संचालन की रीढ़ हैं, लेकिन दशकों से ग्रुप C में अटके हैं।
एक इंजीनियर जो रात दो बजे ट्रैक पर खड़ा होकर सिग्नलिंग फ़ॉल्ट ठीक करता है, जिसकी ग़लती का मतलब सैकड़ों ज़िंदगियाँ हैं — वह सरकारी काग़ज़ों में उसी श्रेणी में है जिसमें एक क्लर्क। यही वह कड़वी सच्चाई है जो 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के गठन से पहले रेलवे इंजीनियरों को सड़क पर ला रही है।
Livemint की ताज़ा रिपोर्ट ने इस सुलगती माँग को सामने रखा है: भारतीय रेलवे के जूनियर इंजीनियर (JE) और सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) ग्रुप B (राजपत्रित) दर्जा, वेतन समानता यानी pay parity, और बेहतर करियर ग्रोथ की माँग कर रहे हैं। सुनने में यह महज़ एक और सरकारी कर्मचारी माँग लगती है — लेकिन इसके नीचे दशकों का जमा हुआ ग़ुस्सा है, और इसके राजनीतिक नतीजे सरकार के लिए आसान नहीं होंगे।
ग्रुप C में फँसे तकनीकी दिमाग़ — समस्या की जड़
भारतीय रेलवे दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है — लगभग 12 लाख से अधिक कर्मचारी। इनमें जूनियर इंजीनियर और सीनियर सेक्शन इंजीनियर वे लोग हैं जो ट्रैक, ब्रिज, सिग्नलिंग, इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल सिस्टम — यानी रेलवे का पूरा तकनीकी ढाँचा — अपने कंधों पर उठाते हैं। इसके बावजूद, 6वें और 7वें वेतन आयोग ने इन पदों को ग्रुप C (गैर-राजपत्रित) में ही छोड़ दिया। इसका सीधा मतलब: न राजपत्रित अधिकारी का दर्जा, न वैसे भत्ते, न प्रशासनिक अधिकार, और सबसे दर्दनाक — अत्यंत सीमित प्रमोशन के रास्ते।
विरोधाभास देखिए — केंद्रीय सेवाओं में समकक्ष तकनीकी पदों पर कई जगह ग्रुप B का दर्जा दिया जाता है। रेलवे के इंजीनियर अपने साथियों को दूसरे विभागों में ऊँचा दर्जा पाते देखते हैं, जबकि उनकी ज़िम्मेदारी — यात्री सुरक्षा से लेकर माल ढुलाई तक — शायद सबसे अधिक है। यह वेतन विसंगति (pay disparity) सालों से जमा होती गई है।
पॉलिटिकल पल्स — वेतन आयोग की आहट और सियासी हिसाब-किताब
8वें वेतन आयोग का गठन अभी प्रस्तावित अवस्था में है, लेकिन सरकारी कर्मचारियों की दुनिया में इसकी गूँज किसी चुनाव की घंटी से कम नहीं। सियासी गलियारों में फुसफुसाहट है कि रेलवे इंजीनियर संगठन इस बार रणनीतिक तरीके से दबाव बना रहे हैं — ठीक उसी समय जब सरकार को 2026-27 में कई राज्यों में चुनावी मैदान पर उतरना है। करीब 3 लाख से अधिक तकनीकी कर्मचारी और उनके परिवार — यह कोई छोटा वोट बैंक नहीं है।
इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यह है कि यह माँग अब सिर्फ़ 'वेतन और दर्जे' की नहीं रही — यह सरकार की कर्मचारी-नीति पर एक बड़ा भरोसे का सवाल बन गई है। पिछले वेतन आयोगों में भी यह माँग उठी और दबा दी गई। लेकिन इस बार फ़र्क यह है कि सोशल मीडिया पर इन इंजीनियरों की आवाज़ सीधे जनता तक पहुँच रही है, और 'तकनीकी कर्मचारियों के साथ सौतेला व्यवहार' का नैरेटिव तेज़ी से गढ़ा जा रहा है।
वेतन समानता — सिर्फ़ तनख़्वाह नहीं, आत्मसम्मान का मामला
Livemint की रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियर संगठनों की प्रमुख माँगों में ग्रुप B दर्जे के अलावा pay parity — यानी समकक्ष अन्य केंद्रीय सेवाओं के अधिकारियों के बराबर वेतन — और करियर प्रोग्रेशन में सुधार शामिल है। एक SSE जो 20 साल सेवा देकर भी उसी पे-लेवल पर अटका रहे, जबकि प्रशासनिक अधिकारी कई प्रमोशन पा चुके हों — इससे बड़ा असंतोष और क्या होगा?
रेलवे बोर्ड के सूत्रों की मानें तो इस माँग पर आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई है — जो अपने आप में एक बयान है। सरकार जानती है कि ग्रुप B देने का मतलब वित्तीय बोझ बढ़ना है, लेकिन न देने का मतलब एक बड़ी तकनीकी वर्कफ़ोर्स को नाराज़ करना है — और वह भी ठीक चुनावी मौसम से पहले।
आगे क्या — 8वाँ वेतन आयोग किसका पक्ष लेगा?
अगर 8वां वेतन आयोग 2026 में गठित होता है, तो उसकी सिफारिशों में इस माँग का ज़िक्र होना तय है — क्योंकि इंजीनियर संगठनों ने पहले ही अपनी मेमोरंडम तैयार कर ली हैं। लेकिन असली सवाल यह है: क्या सरकार वेतन आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करेगी, या फिर 6वें और 7वें की तरह इस माँग को 'विचाराधीन' की ठंडी फ़ाइल में दफ़न कर देगी?
ट्रेड हलकों में चर्चा है कि अगर ग्रुप B दर्जा नहीं मिला, तो कुछ इंजीनियर संगठन विरोध के कड़े तरीक़े अपना सकते हैं — जिसमें कार्य बहिष्कार से लेकर सामूहिक इस्तीफ़ों की धमकी तक शामिल है। रेलवे जैसे संवेदनशील क्षेत्र में ऐसा कोई भी क़दम सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द बन सकता है।
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जो बात सबसे ज़्यादा चुभती है वह यह है: भारतीय रेलवे ख़ुद को 'मेक इन इंडिया' और 'वंदे भारत' की तकनीकी उपलब्धियों का श्रेय लेता है — लेकिन वही तकनीकी दिमाग़ जो ट्रेनें चलाते हैं, सरकारी दर्जे में एक क्लर्क के बराबर माने जाते हैं। यह विरोधाभास जितना ज़्यादा उजागर होगा, सरकार के लिए उतना ही असुविधाजनक होगा।
आख़िरकार, 8वें वेतन आयोग की बिसात पर यह सबसे दिलचस्प लड़ाई बनने जा रही है — क्योंकि यहाँ सवाल सिर्फ़ तनख़्वाह का नहीं, बल्कि यह है कि भारत अपने तकनीकी कर्मचारियों को क्या दर्जा देता है। और वह जवाब ही तय करेगा कि अगली पीढ़ी सरकारी नौकरी में इंजीनियरिंग चुनेगी — या क्लर्क बनकर चैन से बैठेगी।
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मुख्य बातें
- रेलवे के जूनियर इंजीनियर (JE) और सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) दशकों से ग्रुप C (गैर-राजपत्रित) में हैं — 8वें वेतन आयोग से पहले ग्रुप B (राजपत्रित) दर्जे की माँग तेज़ हुई है।
- वेतन समानता (pay parity) और करियर प्रोग्रेशन की कमी — समकक्ष केंद्रीय सेवाओं में इंजीनियरों को बेहतर दर्जा और प्रमोशन मिलते हैं, रेलवे में नहीं।
- लगभग 3 लाख से अधिक तकनीकी कर्मचारी और उनके परिवार — चुनावी मौसम में यह बड़ा वोट बैंक बन सकता है।
- सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया अब तक नहीं आई — यह चुप्पी अपने आप में राजनीतिक गणित का संकेत है।
- अगर माँग नहीं मानी गई, तो कार्य बहिष्कार या सामूहिक विरोध की आशंका — रेलवे जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह सरकार के लिए बड़ा जोखिम है।
आँकड़ों में
- भारतीय रेलवे में कुल कर्मचारी संख्या लगभग 12 लाख से अधिक — Livemint रिपोर्ट
- ग्रुप B दर्जे की माँग करने वाले तकनीकी कर्मचारी (JE/SSE) अनुमानित 3 लाख से अधिक
- 6वें और 7वें — दोनों वेतन आयोगों ने इन पदों को ग्रुप C में ही रखा
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारतीय रेलवे के जूनियर इंजीनियर (JE), सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) और उनके संगठन — जो ग्रुप B (राजपत्रित) दर्जे की मांग कर रहे हैं।
- क्या: 8वें वेतन आयोग के गठन से पहले रेलवे इंजीनियर ग्रुप B दर्जा, वेतन समानता (pay parity) और बेहतर करियर ग्रोथ के अवसरों की माँग कर रहे हैं।
- कब: 2026 में, 8वें वेतन आयोग के प्रस्तावित गठन से ठीक पहले यह माँग तेज़ हुई है।
- कहाँ: भारतीय रेलवे — देश भर के ज़ोनल और डिवीज़नल कार्यालयों में।
- क्यों: दशकों से ग्रुप C (गैर-राजपत्रित) में अटके रहने, प्रशासनिक अधिकारियों की तुलना में भारी वेतन विसंगति और सीमित प्रमोशन अवसरों के कारण।
- कैसे: Livemint की रिपोर्ट के अनुसार, इंजीनियर संगठनों ने 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों में ग्रुप B दर्जा शामिल करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
रेलवे इंजीनियर ग्रुप B दर्जे की माँग क्यों कर रहे हैं?
रेलवे के JE और SSE दशकों से ग्रुप C (गैर-राजपत्रित) में हैं, जबकि अन्य केंद्रीय सेवाओं में समकक्ष तकनीकी पदों पर ग्रुप B दर्जा मिलता है। इससे वेतन विसंगति, सीमित प्रमोशन और कम प्रशासनिक अधिकार जैसी समस्याएँ हैं।
8वें वेतन आयोग में इंजीनियरों की माँग शामिल होगी?
इंजीनियर संगठनों ने अपनी मेमोरंडम पहले ही तैयार कर ली हैं। 8वें वेतन आयोग के गठन पर इस माँग पर विचार होने की संभावना है, लेकिन सरकार की अंतिम स्वीकृति अनिश्चित है।
ग्रुप B और ग्रुप C में क्या फ़र्क है?
ग्रुप B राजपत्रित (Gazetted) श्रेणी है जिसमें बेहतर वेतन, भत्ते, प्रशासनिक अधिकार और प्रमोशन के अवसर मिलते हैं। ग्रुप C गैर-राजपत्रित है जिसमें ये सभी सीमित हैं।
अगर माँग नहीं मानी गई तो क्या होगा?
ट्रेड हलकों में चर्चा है कि इंजीनियर संगठन कार्य बहिष्कार या सामूहिक विरोध कर सकते हैं, जो रेलवे संचालन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।








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