भारत में UDISE+ आँकड़ों के अनुसार तीन लाख से अधिक शिक्षक पद खाली हैं। सरकारें AI और एडटेक को विकल्प बता रही हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत यह है कि बिना प्रशिक्षित शिक्षक के तकनीक महज़ महँगा खिलौना है — असली सवाल भर्ती और प्रशिक्षण का है।
एक सरकारी प्राइमरी स्कूल, बिहार का कोई ज़िला। पाँच कमरे, तीन में ताला। दो कमरों में सौ से ज़्यादा बच्चे और एक अकेला शिक्षक — जो एक साथ गणित भी पढ़ाता है, मिड-डे मील की रजिस्ट्री भी भरता है, और जनगणना का फ़ॉर्म भी। दीवार पर एक चमचमाता पोस्टर लगा है: 'डिजिटल इंडिया — AI से पढ़ाई, नई पीढ़ी की कमाई।' पोस्टर के नीचे रखा टैबलेट धूल खा रहा है — बिजली तीन दिन से नहीं आई।
यह कहानी किसी एक गाँव की नहीं है। यह भारत के सरकारी स्कूलों की सामूहिक दास्तान है, जहाँ UDISE+ 2024-25 के आँकड़ों के अनुसार तीन लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं। और सरकार का ताज़ा जवाब? आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस। जैसे कि एक भूखे बच्चे को खाना देने की जगह उसे रेसिपी वीडियो दिखा दो।
आँकड़ों की ज़बान — ज़मीन कितनी खोखली
संसदीय शिक्षा समिति की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में अकेले 68,000 से अधिक शिक्षक पद खाली हैं। बिहार में यह संख्या 50,000 के पार है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड मिलाकर एक लाख से ज़्यादा। ASER 2024 की रिपोर्ट बताती है कि कक्षा पाँच के 43% बच्चे कक्षा दो का पाठ नहीं पढ़ सकते। यह आँकड़ा सिर्फ़ गुणवत्ता का नहीं, मौजूदगी का संकट है — जहाँ शिक्षक ही नहीं, वहाँ पढ़ाई कैसी?
इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 2026-27 के बजट में AI-आधारित शिक्षण उपकरणों के लिए 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं — यह पिछले साल से 40% ज़्यादा है। DIKSHA प्लेटफ़ॉर्म पर AI ट्यूटर मॉड्यूल लॉन्च हुए, PM eVidya के तहत 'स्मार्ट क्लासरूम' का विस्तार हो रहा है। सुनने में यह भविष्य की शिक्षा लगती है। लेकिन ठहरिए — भविष्य की शिक्षा उस जगह कैसे पहुँचेगी जहाँ वर्तमान की बिजली नहीं पहुँचती?
AI का सच — जहाँ चार्जर नहीं, वहाँ चैटबॉट क्या करेगा
नीति आयोग के अपने आँकड़ों के मुताबिक भारत के 40% से अधिक ग्रामीण स्कूलों में स्थिर इंटरनेट कनेक्शन नहीं है। बिहार और झारखंड के कई ब्लॉक-स्तरीय स्कूलों में बिजली की आपूर्ति दिन में चार-पाँच घंटे ही है। ऐसे में AI-पावर्ड टैबलेट या स्मार्ट बोर्ड का होना उतना ही बेमतलब है जितना रेगिस्तान में नाव रखना।
लेकिन असली मुद्दा इससे भी गहरा है। मान लीजिए बिजली आ गई, इंटरनेट आ गया, टैबलेट चार्ज हो गया — फिर भी AI एक शिक्षक की जगह ले सकता है? UNESCO की 2025 की रिपोर्ट 'AI and Education: Guidance for Policy-Makers' साफ़ कहती है: AI उपकरण शिक्षक का सहायक हो सकता है, विकल्प नहीं। छोटे बच्चों को सिर्फ़ जानकारी नहीं चाहिए — उन्हें वह इंसान चाहिए जो उनकी आँखों में देखकर समझे कि वे कहाँ अटके हैं, जो उनकी ग़लती पर मुस्कुराए और फिर से समझाए। कोई एल्गोरिदम यह नहीं कर सकता।
इनसाइड टॉक
शिक्षा नीति के हलकों में एक कड़वी चर्चा ज़ोरों पर है: AI का यह पूरा शोर असल में भर्ती से ध्यान हटाने की राजनीतिक रणनीति है। एक वरिष्ठ शिक्षा विशेषज्ञ के शब्दों में — 'सरकारें भर्ती इसलिए नहीं करतीं क्योंकि हर नई भर्ती एक स्थायी ख़र्च है, जबकि टैबलेट बाँटना एक बार का फ़ोटो-ऑप।' ट्रेड में यह भी फुसफुसाहट है कि कई एडटेक कंपनियाँ सरकारी AI कॉन्ट्रैक्ट लेने के लिए ज़ोर-शोर से लॉबीइंग कर रही हैं — करोड़ों का कारोबार है, लेकिन ज़मीन पर इम्पैक्ट का कोई ऑडिट नहीं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
NEP 2020 का अधूरा वादा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने कहा था कि GDP का 6% शिक्षा पर ख़र्च होगा। छह साल बीत गए — यह आँकड़ा अभी भी 3% के आसपास अटका है, जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 बताता है। नीति ने शिक्षक प्रशिक्षण में आमूलचूल बदलाव का वादा किया था, मल्टी-डिसिप्लिनरी B.Ed. प्रोग्राम की बात कही थी — लेकिन अधिकांश राज्यों में पुराने ढर्रे के B.Ed. कॉलेज वैसे ही चल रहे हैं। AI तो NEP का एक छोटा-सा हिस्सा था, सहायक उपकरण के रूप में — अब उसे पूरे ढाँचे की जगह बिठाने की कोशिश हो रही है।
इंडिया हेराल्ड का गहरा पॉलिटिकल रीड यह है: AI शिक्षा में एक चमकदार स्क्रीन है जिसके पीछे नीतिगत विफलता छिपाई जा रही है। असली लड़ाई भर्ती की है — तीन लाख शिक्षकों को नियुक्त करना, प्रशिक्षित करना, और उन्हें वेतन देना। यह महँगा है, धीमा है, और इसमें कोई 'लॉन्च इवेंट' नहीं होता। इसलिए यह राजनीतिक रूप से कम आकर्षक है। लेकिन बच्चों को इसी की ज़रूरत है।
आगे क्या — देखने लायक़ बातें
आने वाले महीनों में कई राज्यों में शिक्षक भर्ती परीक्षाएँ होनी हैं — UP में Super TET, बिहार में BPSC शिक्षक भर्ती, मध्य प्रदेश में संविदा शिक्षक भर्ती। सवाल यह है कि क्या ये भर्तियाँ समय पर होंगी या फिर 'तकनीकी कारणों' से स्थगित हो जाएँगी। केंद्र सरकार का AI शिक्षा मिशन 2.0 अगस्त में लॉन्च होने की उम्मीद है — इसमें शिक्षक प्रशिक्षण का हिस्सा कितना होगा, यह असली कसौटी होगी। अगर AI मिशन में शिक्षक को केंद्र में नहीं रखा गया, तो यह एक और करोड़ों का 'डिजिटल ड्रीम' बनकर रह जाएगा।
एक बात और — जो कोई नहीं कह रहा। भारत के बच्चों को सिर्फ़ पढ़ाई नहीं चाहिए, उन्हें एक भरोसेमंद बड़ा चाहिए। वह शिक्षक जो सुबह नाम पुकारे, जो डाँटे भी और सिखाए भी, जो बच्चे को यह भरोसा दे कि कोई उसे देख रहा है। AI यह भरोसा नहीं दे सकता — कोई स्क्रीन यह भरोसा नहीं दे सकती। और जब तक यह समझ नीति-निर्माताओं के दिमाग़ में नहीं उतरती, भारत के सबसे ग़रीब बच्चे सबसे सस्ते विकल्प से पढ़ाए जाते रहेंगे — चाहे वह विकल्प धूल खाता टैबलेट हो या अकेला थका हुआ शिक्षक।
इस रिपोर्ट में उल्लिखित आरोप/दावे नामित स्रोतों के हवाले से हैं; न्यायालय द्वारा निर्णय होने तक ये अप्रमाणित हैं।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- UDISE+ 2024-25 के अनुसार भारत में 3 लाख+ शिक्षक पद रिक्त हैं — UP और बिहार सबसे ज़्यादा प्रभावित।
- सरकार ने AI शिक्षण उपकरणों पर 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किए — पिछले साल से 40% अधिक — लेकिन 40% ग्रामीण स्कूलों में इंटरनेट ही नहीं।
- UNESCO की 2025 रिपोर्ट स्पष्ट कहती है: AI शिक्षक का सहायक हो सकता है, विकल्प कभी नहीं।
- NEP 2020 ने GDP का 6% शिक्षा पर ख़र्च का वादा किया — छह साल बाद भी आँकड़ा 3% पर अटका है।
- असली समाधान भर्ती, प्रशिक्षण और स्थायी निवेश है — AI सिर्फ़ उसका पूरक हो सकता है, रणनीति नहीं।
आँकड़ों में
- भारत में 3 लाख+ शिक्षक पद रिक्त — UDISE+ 2024-25
- UP में 68,000+ और बिहार में 50,000+ शिक्षक पद खाली — संसदीय शिक्षा समिति 2025
- AI शिक्षण बजट 1,500 करोड़ रुपये — पिछले साल से 40% अधिक
- 40%+ ग्रामीण स्कूलों में स्थिर इंटरनेट नहीं — नीति आयोग
- शिक्षा पर ख़र्च GDP का 3% — NEP लक्ष्य 6% — आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26
- कक्षा 5 के 43% बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ सकते — ASER 2024
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: भारत के सरकारी स्कूलों के करोड़ों बच्चे और लाखों रिक्त शिक्षक पद — केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्य सरकारें।
- क्या: देश भर में तीन लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं; सरकारें AI-आधारित शिक्षण उपकरणों को समाधान के रूप में पेश कर रही हैं।
- कब: जुलाई 2026 — UDISE+ 2024-25 रिपोर्ट और NEP 2020 के छठे वर्ष के संदर्भ में।
- कहाँ: उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं।
- क्यों: दशकों से भर्ती प्रक्रिया में देरी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, और बजट में शिक्षा की उपेक्षा — AI को सस्ता शॉर्टकट बताना आसान है।
- कैसे: केंद्र सरकार PM eVidya और DIKSHA जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर AI टूल्स बढ़ा रही है; कई राज्य टैबलेट बाँट रहे हैं — लेकिन बिजली, इंटरनेट और शिक्षक प्रशिक्षण के बिना ये उपकरण बेकार पड़े हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत में कितने शिक्षक पदों पर कोई नियुक्ति नहीं है?
UDISE+ 2024-25 के आँकड़ों के अनुसार भारत में तीन लाख से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं। उत्तर प्रदेश (68,000+) और बिहार (50,000+) सबसे अधिक प्रभावित राज्य हैं।
क्या AI शिक्षकों की जगह ले सकता है?
UNESCO की 2025 रिपोर्ट के अनुसार AI शिक्षक का सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन विकल्प नहीं। छोटे बच्चों को व्यक्तिगत ध्यान, भावनात्मक जुड़ाव और मार्गदर्शन की ज़रूरत होती है जो कोई एल्गोरिदम नहीं दे सकता।
NEP 2020 में शिक्षा बजट का लक्ष्य क्या था और अभी कितना ख़र्च हो रहा है?
NEP 2020 ने GDP का 6% शिक्षा पर ख़र्च करने का लक्ष्य रखा था। छह साल बाद, आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार यह आँकड़ा अभी भी लगभग 3% है — लक्ष्य का आधा।
सरकार AI शिक्षा पर कितना ख़र्च कर रही है?
केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने 2026-27 बजट में AI-आधारित शिक्षण उपकरणों के लिए 1,500 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं, जो पिछले वर्ष से 40% अधिक है।






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