दिल्ली में SIR (Summary Revision) अभियान के तहत एक करोड़ से अधिक मतदाताओं को एनुमरेशन फॉर्म बाँटे गए हैं और 5.75 लाख फॉर्म डिजिटाइज़ हो चुके हैं। AAP इसे अपने वोटरों को काटने की साज़िश बता रही है, जबकि BJP और निर्वाचन आयोग इसे मतदाता सूची शुद्धि का नियमित काम बता रहे हैं।
एक करोड़ — हाँ, पूरे एक करोड़ — दिल्ली के मतदाताओं के दरवाज़े पर सरकारी कर्मचारी दस्तक दे रहे हैं, हाथ में एक फॉर्म लिए। ऊपर से देखें तो यह एक रूटीन प्रशासनिक काम लगता है — मतदाता सूची की 'सफ़ाई'। लेकिन ज़रा नज़र घुमाइए तो दिखेगा कि इस 'सफ़ाई' के पीछे दिल्ली की सियासत का सबसे ज़हरीला सवाल छिपा है: किसके वोटर कटेंगे, और किसकी ज़मीन बचेगी?
Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक़ दिल्ली निर्वाचन आयोग के SIR (Summary Revision) अभियान में अब तक 52% से ज़्यादा मतदाताओं — यानी एक करोड़ से अधिक लोगों — को एनुमरेशन फॉर्म बाँटे जा चुके हैं। इनमें से 5,75,000 फॉर्म डिजिटाइज़ भी हो गए हैं। Business Standard ने इस आँकड़े की पुष्टि करते हुए बताया कि डिजिटाइज़ेशन की रफ़्तार बढ़ाई जा रही है।
सुनने में बहुत 'तकनीकी' लगता है — फॉर्म बाँटना, डिजिटाइज़ करना, सूची अपडेट करना। लेकिन दिल्ली की गलियों में इस 'तकनीकी' काम का मतलब बहुत अलग है। जिस शहर में हर विधानसभा सीट 10,000-15,000 वोटों के अंतर से पलटती रही है, वहाँ अगर दस-बीस हज़ार वोटर ग़लती से या 'ग़लती से' कट जाएँ, तो नतीजे बदल जाते हैं। यही वह नुक्ता है जहाँ AAP और BJP का असली संघर्ष चल रहा है — चुनाव से पहले, वोटिंग मशीन से पहले, बैलट से भी पहले।
AAP का आरोप: 'हमारे वोटर निशाने पर'
AAP लगातार कह रही है कि SIR अभियान के बहाने उनके कोर वोटर — ख़ासकर झुग्गी बस्तियों, अनधिकृत कॉलोनियों और किरायेदार तबक़े के नाम — चुपचाप काटे जा रहे हैं। पार्टी का तर्क है कि जो लोग पते बदलते रहते हैं, या जिनके पास स्थायी पता नहीं है, उन्हें BLO 'not found' दिखाकर सूची से बाहर कर सकते हैं। दिल्ली की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा — कुछ अनुमानों के मुताबिक़ 30% से ज़्यादा — किराये के मकानों में रहता है, और इस तबक़े की 'ट्रेसेबिलिटी' सबसे कमज़ोर होती है।
यही वह तबक़ा है जिसने 2020 में AAP को 62 सीटें दिलवाई थीं। AAP की चिंता महज़ शिकायत नहीं — एक ठोस चुनावी गणित है।
BJP का पलटवार: 'सफ़ाई से डर क्यों?'
BJP का जवाब भी उतना ही पैना है। पार्टी और निर्वाचन आयोग दोनों का कहना है कि दिल्ली की मतदाता सूची में लाखों डुप्लिकेट, मृत और शिफ्ट हो चुके नाम हैं — और उन्हें हटाना लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है। BJP का इशारा साफ़ है: अगर AAP को सूची शुद्धि से डर लग रहा है, तो शायद उनकी ताक़त 'असली' वोटरों पर नहीं, 'फ़र्ज़ी' एंट्रीज़ पर टिकी थी। यह आरोप अपुष्ट है, लेकिन चुनावी बयानबाज़ी में इसकी धार काफ़ी तेज़ है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में जो फुसफुसाहट है, वह आँकड़ों से ज़्यादा दिलचस्प है। दिल्ली के चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि SIR अभियान की टाइमिंग संयोग नहीं है — MCD और विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इतने बड़े पैमाने पर मतदाता सत्यापन का मतलब यह है कि कोई न कोई पक्ष इस 'शुद्धि' का चुनावी लाभ उठाने की स्थिति में होगा। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि BJP की ज़मीनी मशीनरी — बूथ लेवल तक — AAP से कहीं मज़बूत है, और SIR प्रक्रिया में जो पक्ष ज़मीन पर सक्रिय है, वही तय करता है कि 'not found' कौन दिखता है और कौन नहीं।
(यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुमानों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
52% एनुमरेशन — आँकड़ा कितना बड़ा?
ज़रा इस संख्या को परिप्रेक्ष्य में रखिए। दिल्ली में कुल पंजीकृत मतदाता लगभग दो करोड़ हैं। 52% का मतलब है कि आधे से ज़्यादा वोटरों के दरवाज़े पर BLO पहुँच चुके हैं। Times of India के अनुसार डिजिटाइज़ेशन की रफ़्तार अब बढ़ाई जा रही है ताकि बाक़ी 48% को भी जल्द कवर किया जा सके। लेकिन सवाल यह है कि जो 5.75 लाख फॉर्म अब तक डिजिटाइज़ हुए हैं, उनमें कितने वोटरों के नाम 'मिसमैच' या 'not found' आए — यह डेटा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। और यही वह जगह है जहाँ पारदर्शिता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है।
असली खेल: ज़मीन पर कौन मज़बूत, वही तय करेगा 'शुद्धि' का नतीजा
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि SIR अभियान अपने आप में न अच्छा है न बुरा — यह एक ज़रूरी प्रशासनिक प्रक्रिया है। लेकिन दिल्ली जैसे हाइपर-कॉम्पिटिटिव चुनावी मैदान में कोई भी प्रक्रिया 'तटस्थ' नहीं रहती। जिस पार्टी की बूथ-लेवल मशीनरी मज़बूत है, जिसके कार्यकर्ता हर गली में मौजूद हैं, वही यह सुनिश्चित कर सकती है कि उसके वोटर फॉर्म भरें, सत्यापित हों, और सूची में बने रहें। जिस पार्टी की ज़मीनी पकड़ कमज़ोर है, उसके वोटर 'कागज़ पर' ग़ायब हो सकते हैं — बिना किसी षड्यंत्र के, महज़ लापरवाही और अनुपस्थिति से।
आने वाले हफ़्तों में देखने लायक़ बात यह होगी कि AAP अपने कार्यकर्ताओं को बूथ लेवल पर कितना सक्रिय कर पाती है। अगर पार्टी सिर्फ़ प्रेस कॉन्फ़्रेंस में आरोप लगाती रही और ज़मीन पर अपने वोटरों को फॉर्म भरवाने नहीं पहुँची, तो SIR अभियान BJP के पक्ष में काम करेगा — चाहे कोई 'साज़िश' हो या न हो। यही चुनावी राजनीति की सबसे क्रूर सच्चाई है: लोकतंत्र में भी, सिर्फ़ वही वोट गिनता है जो सूची में है।
दिल्ली का यह SIR अभियान 2026 की सबसे बड़ी 'साइलेंट बैटल' बन सकता है। सवाल यह नहीं कि सूची साफ़ हो रही है या नहीं — सवाल यह है कि इस सफ़ाई में झाड़ू किसके हाथ में है?
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मुख्य बातें
- दिल्ली में SIR अभियान के तहत एक करोड़ से अधिक मतदाताओं — कुल मतदाताओं के 52% — को एनुमरेशन फॉर्म बाँटे जा चुके हैं, 5.75 लाख डिजिटाइज़ हुए (Times of India, Business Standard)।
- AAP का आरोप है कि किरायेदार और झुग्गी बस्ती के वोटर — उनका कोर बेस — इस प्रक्रिया में 'not found' दिखाकर काटे जा रहे हैं; BJP का कहना है कि सूची शुद्धि लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारी है।
- चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि जिस पार्टी की बूथ-लेवल मशीनरी मज़बूत है, वही SIR अभियान का चुनावी लाभ उठा सकती है — और फ़िलहाल यह बढ़त BJP के पास दिखती है।
- 'Not found' या 'mismatch' वोटरों का डेटा अभी सार्वजनिक नहीं किया गया — पारदर्शिता की कमी दोनों पक्षों के आरोपों को हवा दे रही है।
आँकड़ों में
- दिल्ली में 52% से अधिक मतदाताओं — एक करोड़ से ज़्यादा — को SIR एनुमरेशन फॉर्म बाँटे गए (Times of India)।
- 5,75,000 फॉर्म अब तक डिजिटाइज़ किए गए हैं (Business Standard)।
- दिल्ली की कुल पंजीकृत मतदाता संख्या लगभग दो करोड़ है — इस पैमाने पर SIR भारत के सबसे बड़े शहरी मतदाता सत्यापन अभियानों में से एक है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: दिल्ली निर्वाचन आयोग (CEO दिल्ली), AAP और BJP — तीनों इस अभियान के केंद्र में हैं (Times of India के अनुसार)।
- क्या: SIR (Summary Revision) अभियान के तहत दिल्ली के 52% से अधिक — यानी एक करोड़ से ज़्यादा — मतदाताओं को एनुमरेशन फॉर्म दिए गए और 5,75,000 फॉर्म डिजिटाइज़ किए गए (Business Standard एवं Times of India)।
- कब: 2026 में SIR अभियान चल रहा है; डिजिटाइज़ेशन की प्रक्रिया तेज़ की जा रही है (Times of India)।
- कहाँ: दिल्ली — सभी विधानसभा क्षेत्रों में (Business Standard)।
- क्यों: मतदाता सूची से डुप्लिकेट, मृत, और शिफ्ट हो चुके वोटरों के नाम हटाकर सूची को शुद्ध करना — लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसका इस्तेमाल चुनावी फ़ायदे के लिए हो रहा है।
- कैसे: बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं को फॉर्म दे रहे हैं, भरे फॉर्म डिजिटाइज़ किए जा रहे हैं, और इस डेटा के आधार पर मतदाता सूची अपडेट होगी (Times of India)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
SIR फॉर्म क्या होता है और दिल्ली में यह क्यों बाँटा जा रहा है?
SIR (Summary Revision) निर्वाचन आयोग की नियमित प्रक्रिया है जिसमें बूथ लेवल ऑफिसर घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करते हैं। इसका मक़सद डुप्लिकेट, मृत, और शिफ्ट हो चुके वोटरों के नाम हटाकर मतदाता सूची को अपडेट करना है (Times of India)।
क्या SIR अभियान से मेरा वोट कट सकता है?
अगर BLO आपके घर आने पर आप मौजूद नहीं मिलते या आपकी जानकारी मेल नहीं खाती, तो आपका नाम 'not found' या 'mismatch' श्रेणी में जा सकता है — जिससे सूची से नाम हटने का ख़तरा बनता है। इसलिए BLO से मिलना और फॉर्म सही भरना ज़रूरी है।
AAP और BJP इस अभियान पर क्यों लड़ रहे हैं?
AAP का आरोप है कि SIR की आड़ में उनके कोर वोटर — किरायेदार और झुग्गी बस्ती के लोग — काटे जा रहे हैं। BJP कहती है कि लिस्ट शुद्धि ज़रूरी है और AAP को इससे डरने की ज़रूरत नहीं। चुनावी विश्लेषक मानते हैं कि ज़मीनी मशीनरी वाली पार्टी को इसका फ़ायदा मिलता है।
दिल्ली में अगले चुनाव कब हैं और SIR का उन पर क्या असर हो सकता है?
दिल्ली में MCD और विधानसभा चुनाव निकट भविष्य में अपेक्षित हैं। SIR से तैयार होने वाली अपडेटेड मतदाता सूची इन चुनावों का आधार बनेगी — इसलिए जिस पार्टी के वोटर इस सूची में बने रहेंगे, उसे सीधा फ़ायदा होगा।






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