मोरक्को में 6.8 तीव्रता के भूकंप ने 2,000 से ज़्यादा लोगों की जान ली। भारत के दिल्ली-NCR, उत्तराखंड और बिहार जैसे सिस्मिक ज़ोन-IV व V इलाक़ों में बिल्डिंग कोड का पालन बेहद कमज़ोर है, जो किसी भी बड़े भूकंप में मोरक्को से भी बड़ी तबाही की ज़मीन तैयार करता है।
दो हज़ार से ज़्यादा लाशें। मलबे के नीचे दबी चीख़ें। और एक पूरा शहर जो सोते-सोते ख़त्म हो गया। मोरक्को के अल-हौज़ इलाक़े में 6.8 तीव्रता के भूकंप ने वो तबाही मचाई जो बताती है कि ज़मीन जब हिलती है तो सरकारी फ़ाइलों में लिखे 'आपदा प्रबंधन प्लान' का कोई मतलब नहीं रह जाता — News18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक़ मरने वालों की तादाद 2,000 पार कर गई और हज़ारों घायल हैं। अब असली सवाल यह है: अगर यही रात दिल्ली, गाज़ियाबाद, नोएडा या देहरादून की होती, तो क्या होता?
यह सवाल डरावना लगता है, पर ज़रूरी है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के अनुसार भारत का 59% भूभाग मध्यम से गंभीर सिस्मिक ज़ोन (ज़ोन-III से V) में आता है। दिल्ली-NCR ज़ोन-IV में है, उत्तराखंड और पूर्वोत्तर का बड़ा हिस्सा ज़ोन-V में — यानी सबसे ख़तरनाक। और बिहार? उत्तर बिहार का तराई इलाक़ा ज़ोन-IV और V दोनों में बँटा है — वही ज़मीन जहाँ 1934 में 8.1 तीव्रता का महाभूकंप आया था।
मोरक्को की त्रासदी को समझें तो एक बात साफ़ दिखती है — मारा भूकंप ने नहीं, इमारतों ने। अल-हौज़ और आसपास के गाँवों में पत्थर और मिट्टी की बिना प्रबलित दीवारें (unreinforced masonry) सेकंडों में ढह गईं। News18 की रिपोर्ट बताती है कि शहरी इलाक़ों में भी कई इमारतें बिना किसी सिस्मिक रेट्रोफ़िटिंग के खड़ी थीं। अब दिल्ली-NCR की तस्वीर देखिए: नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDMA) की एक स्टडी बताती है कि दिल्ली की क़रीब 80% इमारतें BIS (ब्यूरो ऑफ़ इंडियन स्टैंडर्ड्स) के सिस्मिक कोड IS 1893 के मुताबिक़ नहीं बनी हैं। यानी अगर 6.5 से ऊपर का झटका आया, तो लाखों लोग उन्हीं 'कमज़ोर बक्सों' में सो रहे होंगे जो मोरक्को में ताश के पत्तों की तरह गिरे।
और बात सिर्फ़ पुरानी इमारतों की नहीं है। गुरुग्राम और नोएडा में पिछले दो दशकों में खड़ी हुई अनगिनत हाइराइज़ सोसायटियों में से कितनी ने सच में सिस्मिक डिज़ाइन का पालन किया, इसका कोई भरोसेमंद ऑडिट सार्वजनिक नहीं है। RERA ने ट्रांसपेरेंसी बढ़ाई, पर स्ट्रक्चरल सिस्मिक ऑडिट अब भी अनिवार्य नहीं है — यह एक ज़मीनी सच्चाई है जिसे न बिल्डर बताएगा, न ब्रोशर।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में यह बात दबी ज़ुबान में होती है कि भूकंप 'वोट नहीं लाता' — इसलिए कोई भी सरकार बिल्डिंग कोड एनफ़ोर्समेंट पर चुनावी पूँजी ख़र्च नहीं करती। दिल्ली नगर निगम (MCD) में बिल्डिंग इंस्पेक्टरों की संख्या ज़रूरत का एक-चौथाई बताई जाती है। उत्तराखंड में जोशीमठ धँसने के बाद भी स्ट्रक्चरल ऑडिट की रफ़्तार शिकायतों से भरी है — स्थानीय प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि संसाधन और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों की कमी है। बिहार में नीतीश सरकार ने BSDMA (बिहार स्टेट डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी) का बजट बढ़ाया तो है, पर ज़मीनी स्तर पर मॉक ड्रिल और जागरूकता अभियानों की हालत सवालों के घेरे में है — विपक्षी दलों ने बार-बार इसे 'फ़ाइलों में सिमटा प्लान' बताया है।
(यह राजनीतिक हलकों और प्रशासनिक सूत्रों से मिली चर्चा पर आधारित है, पुष्ट ऑडिट रिपोर्ट नहीं।)
इस पूरे मामले की एक और परत है जो कोई नहीं बोलता — अर्बन प्लानिंग। दिल्ली-NCR में यमुना के बाढ़क्षेत्र (floodplain) में बने अवैध निर्माण, पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में चार-पाँच मंज़िला बिना नक्शे की इमारतें, और पूर्वी दिल्ली-गाज़ियाबाद बॉर्डर पर लिक्विफ़ेक्शन-प्रोन (liquefaction-prone) ज़मीन पर बने मकान — ये सब मिलकर एक ऐसा कॉकटेल बनाते हैं जो मोरक्को से कम ख़तरनाक नहीं। भारतीय भूकंप विज्ञान के जाने-माने विशेषज्ञ और IIT कानपुर के प्रोफ़ेसरों ने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा है कि दिल्ली में 7+ तीव्रता का भूकंप 'अगर' नहीं, 'कब' का सवाल है।
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि मोरक्को की तबाही भारतीय राजनीति के लिए सबक़ तो है, पर बदलाव की उम्मीद कम — क्योंकि भूकंप-प्रूफ़िंग एक 'इनविज़िबल इन्वेस्टमेंट' है जिसका क्रेडिट कोई नेता नहीं ले सकता जब तक भूकंप न आए, और जब आता है तब सब कुछ बहुत देर हो चुकी होती है। 2027 के चुनावी मौसम में किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में 'सिस्मिक रेट्रोफ़िटिंग' शब्द खोजिए — मिलेगा नहीं।
तो आगे क्या? अगर केंद्र सरकार मोरक्को को 'वेक-अप कॉल' मानकर तीन काम कर दे — पहला, दिल्ली-NCR और सिस्मिक ज़ोन-IV/V के सभी शहरों में सभी सरकारी और पाँच मंज़िल से ऊपर की इमारतों का अनिवार्य सिस्मिक ऑडिट; दूसरा, MCD और नगर निगमों में बिल्डिंग इंस्पेक्टरों की संख्या तीन गुना करना; तीसरा, स्कूलों और अस्पतालों की सिस्मिक रेट्रोफ़िटिंग को केंद्रीय फ़ंडिंग से जोड़ना — तो शायद अगली त्रासदी में 'मोरक्को दोहराया' न लिखना पड़े। पर इसकी संभावना? फ़िलहाल सियासी माहौल में इसे 'ग़ैर-चुनावी मुद्दा' ही माना जा रहा है।
मोरक्को ने वो क़ीमत चुकाई जो उसे नहीं चुकानी चाहिए थी। भारत के पास अभी भी वक़्त है — सवाल यह है कि क्या कोई सरकार उस वक़्त का इस्तेमाल करेगी, या हम भी उसी रात का इंतज़ार करेंगे जब ज़मीन हिलेगी और सवाल पूछने वाला कोई बचेगा ही नहीं?
आरोप और तथ्य यहाँ नामित स्रोतों को श्रेय दिए गए हैं और जब तक अदालत ने फ़ैसला नहीं दिया, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- भारत का 59% भूभाग मध्यम से गंभीर सिस्मिक ज़ोन में — दिल्ली-NCR ज़ोन-IV, उत्तराखंड व पूर्वोत्तर ज़ोन-V में है।
- दिल्ली की लगभग 80% इमारतें BIS सिस्मिक कोड IS 1893 का पालन नहीं करतीं — NDMA आकलन के अनुसार।
- मोरक्को में तबाही का मुख्य कारण भूकंप नहीं, बल्कि बिना प्रबलित निर्माण शैली थी — भारत में भी करोड़ों लोग ऐसी ही इमारतों में रहते हैं।
- सिस्मिक रेट्रोफ़िटिंग और बिल्डिंग ऑडिट 'ग़ैर-चुनावी मुद्दा' होने के कारण राजनीतिक प्राथमिकता में नहीं है।
- दिल्ली में 7+ तीव्रता का भूकंप 'अगर' नहीं 'कब' का सवाल — भूकंप विज्ञान विशेषज्ञों की बार-बार चेतावनी।
आँकड़ों में
- मोरक्को भूकंप: 6.8 तीव्रता, 2,000 से ज़्यादा मौतें — News18 रिपोर्ट
- भारत का 59% भूभाग सिस्मिक ज़ोन-III से V में — भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI)
- दिल्ली की ~80% इमारतें BIS सिस्मिक कोड IS 1893 के अनुरूप नहीं — NDMA आकलन
- 1934 में बिहार-नेपाल में 8.1 तीव्रता का महाभूकंप — ऐतिहासिक सिस्मिक रिकॉर्ड
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: मोरक्को की आबादी, और भारत के दिल्ली-NCR, उत्तराखंड, बिहार के सिस्मिक ज़ोन में रहने वाले करोड़ों लोग
- क्या: मोरक्को में 6.8 तीव्रता का विनाशकारी भूकंप और भारत की भूकंप-तैयारी का रियलिटी चेक
- कब: मोरक्को भूकंप सितंबर 2023 में आया; भारत में भूकंप का ख़तरा सतत बना हुआ है — NDMA और भूकंप विज्ञान विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं
- कहाँ: मोरक्को का अल-हौज़ क्षेत्र; भारत में दिल्ली-NCR, उत्तराखंड, बिहार, हिमाचल प्रदेश सहित पूरा सिस्मिक ज़ोन-IV और V
- क्यों: मोरक्को में पुरानी निर्माण शैली और कमज़ोर कोड एनफ़ोर्समेंट ने तबाही बढ़ाई; भारत में भी BIS कोड IS 1893 का पालन 10% से कम इमारतों में होता है — News18 रिपोर्ट के अनुसार
- कैसे: News18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक़ मोरक्को में रात के वक़्त आए भूकंप ने बिना प्रबलित (unreinforced) पत्थर-मिट्टी की इमारतें ताश के पत्तों की तरह गिरा दीं; भारत में भी करोड़ों लोग ऐसी ही कमज़ोर संरचनाओं में रहते हैं
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिल्ली-NCR किस सिस्मिक ज़ोन में आता है?
दिल्ली-NCR सिस्मिक ज़ोन-IV में आता है, जो 'गंभीर ख़तरे' की श्रेणी है — भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के वर्गीकरण के अनुसार।
भारत में कितनी इमारतें भूकंप-प्रतिरोधी कोड का पालन करती हैं?
NDMA के आकलन के अनुसार दिल्ली की लगभग 80% इमारतें BIS के सिस्मिक कोड IS 1893 का पालन नहीं करतीं। राष्ट्रीय स्तर पर यह आँकड़ा और भी चिंताजनक माना जाता है।
मोरक्को भूकंप में इतनी तबाही क्यों हुई?
6.8 तीव्रता का भूकंप रात में आया जब लोग सो रहे थे, और अल-हौज़ क्षेत्र में अधिकतर इमारतें बिना प्रबलित पत्थर-मिट्टी की थीं जो सेकंडों में ढह गईं — News18 रिपोर्ट के अनुसार।
क्या दिल्ली में बड़ा भूकंप आ सकता है?
भूकंप विज्ञान विशेषज्ञों और IIT कानपुर के शोधकर्ताओं के अनुसार दिल्ली में 7+ तीव्रता का भूकंप 'अगर' नहीं बल्कि 'कब' का सवाल है — यह चेतावनी बार-बार दी गई है।




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