RSS प्रमुख मोहन भागवत ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और अन्य मुस्लिम बुद्धिजीवियों से एक 'दुर्लभ' बंद कमरे की बैठक में मुलाक़ात की, जहाँ भागवत ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को अपनी पहचान अरब से नहीं बल्कि भारत की ज़मीन से जोड़नी चाहिए — News18 की रिपोर्ट के अनुसार।
संघ प्रमुख जब किसी से मिलते हैं तो वह 'मुलाक़ात' नहीं होती — वह एक संदेश होती है। और जब वह मुलाक़ात पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी जैसे मुस्लिम बुद्धिजीवी से हो, बंद कमरे में, बिना कैमरों के — तो वह संदेश और भी ज़ोरदार होता है।
News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कुरैशी और कई अन्य मुस्लिम विचारकों-बुद्धिजीवियों के साथ एक 'दुर्लभ' बैठक की। इस बैठक को 'दुर्लभ' इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि संघ का शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक रूप से मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से इस तरह की औपचारिक बातचीत बहुत कम करता है। भागवत ने इस मुलाक़ात में जो बात रखी, उसका सार यह था: भारतीय मुसलमानों को अपनी पहचान अरब से नहीं बल्कि हिंदुस्तान की ज़मीन से जोड़नी चाहिए। उनका तर्क था कि भारतीय मुसलमानों के पूर्वज इसी धरती के हैं और उन्हें सांस्कृतिक रूप से 'विदेशी' मानना ग़लत है — लेकिन इसके लिए ख़ुद मुस्लिम समुदाय को भी पहल करनी होगी।
कुरैशी ने इस बातचीत को 'सकारात्मक' बताया — News18 के अनुसार। उन्होंने कहा कि भागवत ने खुले दिमाग़ से बात सुनी और संवाद का माहौल बनाने की कोशिश की। लेकिन कुरैशी ने यह भी स्पष्ट किया कि असली परीक्षा शब्दों में नहीं, ज़मीनी हक़ीक़त में होगी — क्या यह संवाद RSS के कार्यकर्ता-स्तर तक पहुँचेगा?
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस बैठक को लेकर दो तरह की फुसफुसाहटें हैं। पहली यह कि संघ ने 2024 के लोकसभा चुनावों में BJP की सीटों में आई गिरावट के बाद अपनी रणनीति पर गहन मंथन किया है — ख़ासकर उन सीटों पर जहाँ मुस्लिम मतदाताओं का ध्रुवीकरण विपक्ष के पक्ष में गया। ट्रेड सर्किल में चर्चा है कि संघ अब 'सॉफ्ट हिंदुत्व' से आगे बढ़कर एक ऐसा नैरेटिव गढ़ना चाहता है जिसमें मुस्लिम समुदाय को 'विरोधी' नहीं बल्कि 'भारतीय परंपरा का हिस्सा' दिखाया जा सके — ताकि 2027 और 2029 के चुनावों में मुस्लिम वोट बैंक में कम से कम एक दरार पड़े।
दूसरी फुसफुसाहट ज़्यादा संदेहपूर्ण है। विपक्षी खेमे और कई मुस्लिम संगठन इसे 'ऑप्टिक्स' मान रहे हैं — एक ऐसा दिखावा जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की छवि सुधारने और घरेलू राजनीति में 'सबको साथ' का मुखौटा लगाने के लिए किया जा रहा है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठनों ने अब तक इस बैठक पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक हलकों की अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
संघ का इतिहास और 'आउटरीच' का पैटर्न
यह पहली बार नहीं है जब संघ ने मुस्लिम समुदाय तक पहुँचने की कोशिश की हो। भागवत ख़ुद पिछले कई वर्षों में कई बार ऐसे बयान दे चुके हैं जो RSS की परंपरागत लाइन से अलग दिखते हैं — 'लिंचिंग भारतीय परंपरा नहीं' से लेकर 'मस्जिद में राम तलाशने की ज़रूरत नहीं' तक। लेकिन आलोचक कहते हैं कि शीर्ष नेतृत्व की भाषा और ज़मीनी कार्यकर्ता की भाषा में फ़ासला बना रहता है। ठीक वैसे ही जैसे किसी कंपनी का CEO बोर्डरूम में डायवर्सिटी की बात करे लेकिन फ़ैक्ट्री फ़्लोर पर कुछ और चले।
News18 के अनुसार, इस बैठक में भागवत ने यह भी कहा कि मुसलमानों को 'डर के माहौल' से बाहर निकलना चाहिए और RSS के दरवाज़े संवाद के लिए खुले हैं। यह वाक्य अपने आप में दिलचस्प है — क्योंकि यह अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करता है कि एक 'डर का माहौल' है, भले ही इसकी ज़िम्मेदारी किसी पर न डाली गई हो।
असली सवाल: शब्दों से आगे क्या?
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि इस बैठक को न तो पूरी तरह ख़ारिज किया जा सकता है और न ही इसे किसी ऐतिहासिक मोड़ का दर्जा दिया जा सकता है — अभी तो यह एक 'सिग्नल' है, 'शिफ़्ट' नहीं। संघ का असली इम्तिहान तब होगा जब यह आउटरीच नागपुर के मुख्यालय से निकलकर ज़िला-स्तरीय शाखाओं तक पहुँचे, जब लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दों पर ज़मीनी भाषा बदले, और जब चुनावी रैलियों में 'सबका साथ' सिर्फ़ नारा न रहे बल्कि टिकट वितरण और नीतिगत फ़ैसलों में दिखे।
आने वाले महीनों में देखने लायक़ यह होगा कि क्या ऐसी बैठकें सिलसिलेवार होती हैं या यह एक 'वन-ऑफ़ इवेंट' बनकर रह जाती है। अगर संघ सचमुच इसे संस्थागत बनाता है — जैसे मुस्लिम राष्ट्रीय मंच को ज़्यादा सक्रिय और दृश्यमान किया जाए — तो 2029 तक के चुनावी गणित में एक नया चर जुड़ सकता है। लेकिन अगर यह सिर्फ़ भागवत-स्तरीय 'सद्भावना मुलाक़ात' बनी रहती है जबकि ज़मीन पर वही पुरानी बयानबाज़ी चले, तो यह कुरैशी के शब्दों में ही कहें — 'असली परीक्षा ज़मीन पर है।'
एक बात तय है: भागवत ने यह दरवाज़ा खोला है, लेकिन दरवाज़ा खोलना और उसमें से गुज़रना — दोनों बहुत अलग बातें हैं। सवाल यह है कि क्या संघ उस दरवाज़े से गुज़रने को तैयार है, या बस यह दिखाना काफ़ी है कि दरवाज़ा खुला था?
आरोप और बयान संबंधित सूत्रों से उद्धृत हैं और जब तक अदालत निर्णय न दे, अप्रमाणित हैं; न्यायाधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
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मुख्य बातें
- RSS प्रमुख मोहन भागवत ने पूर्व CEC एसवाई कुरैशी और मुस्लिम बुद्धिजीवियों से 'दुर्लभ' बंद कमरे की बैठक की — News18 के अनुसार।
- भागवत ने कहा कि भारतीय मुसलमानों की पहचान अरब से नहीं, भारत की ज़मीन से है और उन्हें 'डर के माहौल' से बाहर आना चाहिए।
- कुरैशी ने बातचीत को 'सकारात्मक' बताया लेकिन कहा कि असली परीक्षा ज़मीनी स्तर पर होगी।
- सियासी विश्लेषक इसे 2024 चुनावों में BJP की सीट-गिरावट के बाद संघ की रणनीतिक शिफ्ट से जोड़ रहे हैं।
- यह 'सिग्नल' है, 'शिफ्ट' नहीं — असली इम्तिहान ज़िला-स्तरीय शाखाओं और चुनावी ज़मीन पर होगा।
आँकड़ों में
- 2024 लोकसभा चुनावों में BJP को 63 सीटों का नुक़सान हुआ था जो संघ की रणनीतिक समीक्षा का बड़ा कारण माना जाता है
- RSS प्रमुख ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से बंद कमरे की बैठक की — जिसे News18 ने 'दुर्लभ' करार दिया
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: RSS प्रमुख मोहन भागवत और पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी सहित मुस्लिम बुद्धिजीवी — News18 के अनुसार।
- क्या: एक बंद कमरे की बैठक जिसमें भागवत ने भारतीय मुसलमानों की 'भारतीय जड़ों' पर ज़ोर दिया और आपसी संवाद की ज़रूरत बताई — News18 के अनुसार।
- कब: 2026 में, तारीख़ स्रोत में स्पष्ट नहीं — News18 की रिपोर्ट के अनुसार।
- कहाँ: भारत में, स्थान निर्दिष्ट नहीं — News18 के अनुसार।
- क्यों: RSS का मुस्लिम समुदाय तक पहुँच बनाने का प्रयास, जिसमें भागवत ने कहा कि भारतीय मुसलमानों की जड़ें इसी ज़मीन में हैं — News18 के अनुसार।
- कैसे: भागवत ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों को बंद कमरे में बुलाकर सीधा संवाद किया और सांस्कृतिक-ऐतिहासिक तर्कों से अपनी बात रखी — News18 के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मोहन भागवत ने कुरैशी से क्या कहा?
News18 के अनुसार, भागवत ने कहा कि भारतीय मुसलमानों को अपनी पहचान अरब से नहीं बल्कि भारत की ज़मीन से जोड़नी चाहिए और उन्हें 'डर के माहौल' से बाहर निकलना चाहिए।
यह बैठक क्यों हुई?
2024 लोकसभा चुनावों में BJP की सीट-गिरावट के बाद संघ ने रणनीतिक समीक्षा की है और मुस्लिम समुदाय तक पहुँच बनाने की कोशिश इसी का हिस्सा मानी जा रही है।
क्या RSS सचमुच मुस्लिम समुदाय के प्रति नज़रिया बदल रहा है?
विश्लेषकों के अनुसार यह अभी एक 'सिग्नल' है, 'शिफ्ट' नहीं। असली परीक्षा ज़मीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के व्यवहार और चुनावी नीतियों में बदलाव से होगी।
कुरैशी ने इस बैठक पर क्या कहा?
News18 के अनुसार, कुरैशी ने बातचीत को 'सकारात्मक' बताया लेकिन कहा कि शब्दों से ज़्यादा ज़रूरी ज़मीनी हक़ीक़त में बदलाव है।





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