पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि लोकतंत्र में सरकार विरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है। अदालत ने कहा कि केस दर्ज कर नागरिकों को 'ग़ुलाम' बनाया जा रहा है। यह फ़ैसला BNS की धारा 152 के तहत दर्ज हज़ारों मामलों पर सवाल खड़ा करता है।
एक आदमी सड़क पर खड़ा है। उसके हाथ में तख़्ती है, मुँह से नारा निकलता है — 'सरकार मुर्दाबाद'। अगले दिन वह थाने में है, उस पर राजद्रोह का मुकदमा है। यह कोई काल्पनिक दृश्य नहीं — यह UP, हरियाणा, MP में हज़ारों लोगों की असली कहानी है। लेकिन अब पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक ऐसा फ़ैसला सुनाया है जो इस पूरी स्क्रिप्ट को उलट सकता है।
द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, हाईकोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा है कि लोकतंत्र में सरकार के ख़िलाफ़ नारे लगाना राजद्रोह नहीं है। अदालत ने इससे भी आगे जाकर टिप्पणी की — 'नागरिकों पर केस दर्ज कर उन्हें ग़ुलाम बनाया जा रहा है।' ये शब्द किसी विपक्षी नेता के नहीं, एक संवैधानिक अदालत के हैं — और इसीलिए ये इतने भारी हैं।
यहीं वह मोड़ आता है जहाँ यह फ़ैसला सिर्फ़ क़ानूनी नहीं, गहरे तौर पर राजनीतिक हो जाता है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी हाल ही में ठीक यही सुर अपनाया — द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़ बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूछा, 'नागरिक सरकार के फ़ैसलों का विरोध क्यों नहीं कर सकते? केस लगाकर उन्हें ग़ुलाम बनाया जा रहा है।' जब दो अलग-अलग हाईकोर्ट एक ही भाषा बोलें, तो यह संयोग नहीं, न्यायपालिका की सामूहिक चेतावनी है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस फ़ैसले को लेकर जो फुसफुसाहट है, वह कोर्टरूम से कहीं ज़्यादा दिलचस्प है। विपक्षी खेमे में चर्चा है कि यह फ़ैसला अब 'हथियार' बनेगा — हर उस राज्य में जहाँ प्रदर्शनकारियों पर राजद्रोह या उससे मिलते-जुलते मामले दर्ज हुए हैं, वहाँ ज़मानत अर्ज़ियों की बाढ़ आ सकती है। BJP शासित राज्यों के गृह विभागों में बेचैनी की ख़बरें हैं — ख़ासकर UP में, जहाँ CAA विरोध और किसान आंदोलन के दौरान सैकड़ों लोगों पर ऐसे केस दर्ज हुए। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
लेकिन असली पेंच यहाँ है — और यह वह कोण है जो बाक़ी मीडिया से छूट रहा है। 2023 में जब भारतीय न्याय संहिता (BNS) ने पुरानी IPC की जगह ली, तो सरकार ने कहा कि धारा 124A — यानी राजद्रोह — ख़त्म कर दी गई। बड़ी सुर्ख़ियाँ बनीं, बड़े दावे हुए। लेकिन BNS की धारा 152 में वही अपराध नए शब्दों में वापस आ गया — 'भारत की एकता और अखंडता को ख़तरा पहुँचाने वाला कृत्य'। परिभाषा इतनी चौड़ी है कि एक नारा, एक ट्वीट, एक व्हाट्सएप स्टेटस — कुछ भी इसके दायरे में आ सकता है। पुराना साँप नई खाल में है।
आने वाले दिनों में यह समीकरण किस ओर मुड़ेगा — इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि यह फ़ैसला सीधे सुप्रीम कोर्ट की उस संविधान पीठ से टकराएगा जो 2022 से धारा 124A पर सुनवाई कर रही थी। अब सवाल BNS की धारा 152 पर शिफ्ट होगा। अगर सुप्रीम कोर्ट इसी दिशा में चलता है, तो BJP शासित राज्यों में दर्ज सैकड़ों-हज़ारों मामले ताश के पत्तों की तरह गिर सकते हैं — और वह राजनीतिक बवंडर होगा जिसके लिए कोई तैयार नहीं है।
इसे थोड़ा और गहराई से समझिए। 2019 से 2024 के बीच सिर्फ़ UP में किसान आंदोलन, CAA विरोध और विभिन्न प्रदर्शनों के दौरान हज़ारों लोगों पर राजद्रोह या उससे जुड़ी धाराएँ लगाई गईं। हरियाणा में किसान आंदोलन के दौरान यही पैटर्न दोहराया गया। MP में भी विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर ऐसे केस दर्ज होते रहे हैं। अब हाईकोर्ट का यह फ़ैसला इन सभी मामलों में एक नज़ीर बन जाता है — क्योंकि अगर नारा लगाना राजद्रोह नहीं है, तो उन मामलों का आधार ही ढह जाता है।
लेकिन सरकार के पास भी अपना तर्क है। सत्ता पक्ष की दलील लगातार यही रही है कि कुछ नारे 'सिर्फ़ नारे' नहीं होते — वे हिंसा भड़काने का औज़ार होते हैं। यह फ़र्क़ — शांतिपूर्ण विरोध और उकसावे के बीच की रेखा — वही है जो इस पूरी बहस को जटिल बनाती है। सरकार की ओर से अब तक इस विशिष्ट फ़ैसले पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
यह लड़ाई सिर्फ़ क़ानूनी नहीं है — यह सीधे 2027 के आम चुनावों की ज़मीन तैयार कर रही है। विपक्ष के पास अब एक हाईकोर्ट का फ़ैसला है जो कहता है कि सरकार की आलोचना अपराध नहीं। अगर कांग्रेस और INDIA ब्लॉक इसे चुनावी हथियार बनाते हैं — 'BJP राज में बोलने पर जेल' — तो यह नैरेटिव उन करोड़ों लोगों से जुड़ेगा जो कभी न कभी किसी आंदोलन में शामिल हुए हैं।
और यहीं वह सवाल है जो हर नागरिक का है — न सिर्फ़ प्रदर्शनकारी का, न सिर्फ़ विपक्षी का। लोकतंत्र में विरोध की सीमा कौन तय करेगा — वह सरकार जिसका विरोध हो रहा है, या वह संविधान जिसने विरोध का अधिकार दिया है? हाईकोर्ट ने अपना जवाब दे दिया है। अब बारी सुप्रीम कोर्ट की है — और उससे भी ज़्यादा, उस जनता की जो अगली बार सड़क पर उतरे तो यह जानना चाहेगी कि उसका नारा उसे जेल भेजेगा या उसकी आवाज़ बनेगा।
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मुख्य बातें
- पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकार विरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है — यह लोकतांत्रिक अधिकार है (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- BNS की धारा 152 में पुराना राजद्रोह नए शब्दों में मौजूद है — परिभाषा इतनी व्यापक है कि नारे, ट्वीट, स्टेटस सब इसके दायरे में आ सकते हैं।
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी हाल में ठीक यही टिप्पणी की — दो हाईकोर्ट की एक ही भाषा न्यायपालिका की सामूहिक चेतावनी है।
- UP, हरियाणा, MP में किसान आंदोलन और CAA विरोध के दौरान दर्ज हज़ारों मामले अब इस नज़ीर से ढह सकते हैं।
- यह फ़ैसला 2027 आम चुनावों से पहले विपक्ष के लिए एक शक्तिशाली नैरेटिव बन सकता है।
आँकड़ों में
- पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा — 'केस दर्ज कर नागरिकों को ग़ुलाम बनाया जा रहा है' (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- BNS की धारा 152 ने IPC की धारा 124A की जगह ली — लेकिन राजद्रोह जैसा अपराध व्यापक परिभाषा में बरक़रार है।
- 2019-2024 के बीच UP-हरियाणा-MP में किसान व CAA आंदोलन के दौरान हज़ारों लोगों पर राजद्रोह या समान धाराएँ लगाई गईं।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने यह ऐतिहासिक टिप्पणी की (द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार)।
- क्या: अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार विरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है और नागरिकों पर केस दर्ज कर उन्हें ग़ुलाम नहीं बनाया जा सकता।
- कब: जून 2026 में यह फ़ैसला आया (द इंडियन एक्सप्रेस)।
- कहाँ: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट, चंडीगढ़ में।
- क्यों: क्योंकि प्रदर्शनकारियों पर राजद्रोह के मामले दर्ज कर उनके मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा था — अदालत ने इसे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का हिस्सा माना।
- कैसे: अदालत ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि नारेबाज़ी हिंसा भड़काने से अलग है और इसे राजद्रोह का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या हाईकोर्ट का यह फ़ैसला पूरे भारत में लागू होगा?
यह फ़ैसला सीधे तौर पर पंजाब और हरियाणा के क्षेत्राधिकार में बाध्यकारी है, लेकिन अन्य हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इसे नज़ीर के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं — ख़ासकर जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इसी तरह की टिप्पणी की है।
BNS की धारा 152 और पुरानी IPC की धारा 124A में क्या फ़र्क़ है?
IPC की धारा 124A में 'राजद्रोह' (sedition) शब्द का सीधा इस्तेमाल था। BNS की धारा 152 में शब्द बदले गए हैं — अब यह 'भारत की एकता और अखंडता को ख़तरा पहुँचाने वाला कृत्य' कहलाता है, लेकिन इसकी परिभाषा पहले से अधिक व्यापक है।
UP और हरियाणा में राजद्रोह के कितने मामले दर्ज हैं?
सटीक आँकड़े राज्य सरकारों द्वारा सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन CAA विरोध और किसान आंदोलन के दौरान हज़ारों लोगों पर राजद्रोह या समान धाराएँ लगाई गईं — यह विभिन्न रिपोर्ट्स और अदालती दस्तावेज़ों से स्पष्ट है।
क्या इस फ़ैसले से पहले से दर्ज मामले ख़ारिज हो जाएँगे?
अपने आप नहीं — लेकिन आरोपियों के वकील इस फ़ैसले को नज़ीर के रूप में पेश कर ज़मानत और केस ख़ारिज करवाने की अर्ज़ी दे सकते हैं। अंतिम फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट के रुख़ पर निर्भर करेगा।





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