सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता ने CJI सूर्य कांत पर कागज़ फेंके और अपशब्द कहे। CJI ने उसे कंटेम्प्ट में दंडित करने की बजाय कहा — 'कभी-कभी बच्चे भी ऐसा करते हैं।' NDTV और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, अदालत ने शख़्स को 'मानसिक रूप से विचलित' मानकर माफ़ किया।
देश की सबसे ऊँची अदालत। वो जगह जहाँ संविधान की हर लकीर की अंतिम व्याख्या होती है। और उस पवित्र बेंच पर बैठे CJI सूर्य कांत के चेहरे की तरफ़ कागज़ उड़ते हैं — साथ में गालियाँ, और एक बेतुकी माँग: 'I order you to order.' टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, यह दृश्य किसी फ़िल्म का नहीं, भारत के सुप्रीम कोर्ट का है।
ज़रा सोचिए — जिस व्यक्ति के एक आदेश से सरकारें झुकती हैं, विधायिकाएँ रुकती हैं, उस पर एक याचिकाकर्ता कागज़ फेंक रहा है। और CJI? उन्होंने कहा — 'कभी-कभी बच्चे भी ऐसा करते हैं।' NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक़ अदालत ने शख़्स को कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में दंडित करने से मना कर दिया और उसे 'मानसिक रूप से विचलित' मानते हुए छोड़ दिया।
यह संयम अभूतपूर्व था। लेकिन इस संयम के पीछे जो सवाल खड़ा है, वो कहीं ज़्यादा तकलीफ़देह है।
कोर्टरूम में हाई ड्रामा — असल में हुआ क्या?
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान अचानक CJI की बेंच की ओर कागज़ फेंके। उसने न सिर्फ़ अपशब्दों का इस्तेमाल किया, बल्कि 'I order you to order' जैसी बेतुकी माँगें भी रखीं — जैसे वो ख़ुद जज हो और CJI उसका क्लर्क। कोर्टरूम में मौजूद वकीलों और अधिकारियों में सन्नाटा छा गया। सुरक्षाकर्मियों ने शख़्स को तुरंत क़ाबू में किया।
NDTV के अनुसार, CJI सूर्य कांत ने इस पूरे प्रकरण को असाधारण धैर्य से सँभाला। उन्होंने कंटेम्प्ट की कार्यवाही शुरू नहीं की, बल्कि कहा कि शख़्स 'स्पष्ट रूप से विचलित' (disturbed) है और उसे सज़ा देने से कोई मक़सद हल नहीं होगा। यह बात ध्यान देने लायक़ है — कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में छह महीने तक की जेल और जुर्माना हो सकता है, लेकिन CJI ने वो रास्ता नहीं चुना।
पॉलिटिकल पल्स — परदे के पीछे की चर्चा
सियासी गलियारों और कानूनी हलकों में इस घटना पर जो बात हो रही है, वो सिर्फ़ 'सुरक्षा चूक' तक सीमित नहीं है। दिल्ली बार काउंसिल के क़रीबी सूत्रों में फुसफुसाहट है कि हाल के सालों में सुप्रीम कोर्ट में 'फ्रिवोलस लिटिगेंट्स' — यानी ग़ैर-ज़रूरी और बेतुकी याचिकाएँ दायर करने वालों — की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। ट्रेड में चर्चा है कि CJI की बेंच पर महीने में दर्जनों ऐसी याचिकाएँ आती हैं जिनमें याचिकाकर्ता वकील भी नहीं रखता, ख़ुद बहस करने आता है, और जब बात नहीं बनती तो हताशा में आक्रामक हो जाता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अदालती हलकों की अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
एक और बात जो विश्लेषकों का ध्यान खींच रही है: CJI का 'कभी-कभी बच्चे भी ऐसा करते हैं' वाला बयान। यह सिर्फ़ संयम नहीं है — यह न्यायपालिका की उस थकान का इशारा है जहाँ सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश को भी एक बिंदु पर आकर कहना पड़ता है कि यह व्यक्ति बच्चे जैसा व्यवहार कर रहा है, इसे सज़ा देने का कोई अर्थ नहीं। यह वाक्य दरअसल एक प्रणालीगत निराशा का बयान है — जहाँ जज भी इंसान हैं, और सिस्टम की दरारों से जो हताशा रिस रही है, वो अब कोर्टरूम के अंदर फट रही है।
कंटेम्प्ट बनाम 'सुने जाने का अधिकार' — असली टकराव यहाँ है
यह घटना दो बुनियादी सिद्धांतों के बीच की टक्कर को सामने लाती है। एक तरफ़ कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट — अदालत की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया की रक्षा का औज़ार। दूसरी तरफ़ आम नागरिक का 'सुने जाने का अधिकार' — वो हताशा जो तब जन्म लेती है जब किसी को लगता है कि सिस्टम उसकी बात सुन ही नहीं रहा।
NDTV के अनुसार, अदालत ने शख़्स को छोड़ते हुए यह भी ध्यान में रखा कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी। लेकिन यहाँ बड़ा सवाल यह है — हर बार ऐसी घटनाओं को 'मानसिक विचलन' कहकर ख़ारिज कर देना क्या सही है? क्या यह हताशा सिर्फ़ एक शख़्स की है, या यह उन हज़ारों-लाखों लोगों की आवाज़ है जो सालों तक अदालतों के चक्कर काटते हैं और जिन्हें लगता है कि न्याय एक लक्ज़री है जो उनकी पहुँच से बाहर है?
भारत में पेंडिंग मामलों की संख्या पाँच करोड़ से ऊपर है — यह आँकड़ा अपने आप में एक चीख़ है। जब एक व्यक्ति दशकों तक 'तारीख़ पर तारीख़' का सामना करता है, तो उसकी हताशा का कोई न कोई आउटलेट तो होगा। यह कागज़ फेंकना उसी आउटलेट की सबसे कुरूप अभिव्यक्ति है।
CJI का संयम — ताक़त या मजबूरी?
इंडिया हेराल्ड का सीधा पॉलिटिकल रीड यह है: CJI सूर्य कांत का यह संयम सिर्फ़ व्यक्तिगत गुण नहीं, यह एक सोची-समझी संस्थागत रणनीति है। अगर CJI ने कंटेम्प्ट का हथियार चलाया होता, तो नैरेटिव तुरंत बदल जाता — 'बेचारे याचिकाकर्ता पर ताक़तवर अदालत ने हथौड़ा चला दिया।' सोशल मीडिया में जजों को विलेन बनाने का ट्रेंड पहले से चरम पर है। CJI ने वो ज़मीन ही नहीं दी।
लेकिन इस संयम की एक क़ीमत भी है। अगर हर बार ऐसी हरकतों को 'बच्चों जैसा व्यवहार' कहकर टाल दिया जाए, तो यह एक ख़तरनाक मिसाल बन सकती है। कल कोई और शख़्स यही सोचकर आएगा कि सुप्रीम कोर्ट में तमाशा करो तो भी कुछ नहीं होता। अदालत की गरिमा और सहानुभूति के बीच वो पतली लकीर कहाँ है — यही असली संस्थागत सवाल है।
आगे क्या होगा — सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा और लिटिगेंट प्रोटोकॉल
इस घटना के बाद सबसे तत्काल सवाल सुरक्षा प्रोटोकॉल का है। सुप्रीम कोर्ट में प्रवेश के लिए सुरक्षा जाँच होती है, लेकिन कागज़ात तो हर याचिकाकर्ता लेकर आता है — उन्हें हथियार नहीं माना जाता। अब जबकि कागज़ ही 'प्रक्षेपास्त्र' बन गए, सुरक्षा एजेंसियों को नए सिरे से सोचना होगा।
विश्लेषकों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट प्रशासन कुछ क़दम उठा सकता है — जैसे पार्टी-इन-पर्सन (बिना वकील ख़ुद पेश होने वाले) याचिकाकर्ताओं के लिए अलग बेंच या अलग प्रोटोकॉल, कोर्टरूम में बेंच और याचिकाकर्ता के बीच भौतिक दूरी बढ़ाना, या कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य स्क्रीनिंग तंत्र जो बार-बार अतार्किक याचिकाएँ दायर करने वालों की पहचान कर सके।
लेकिन असली समाधान इन तकनीकी उपायों से बहुत आगे है। जब तक पाँच करोड़ से ज़्यादा लंबित मामलों वाली न्यायिक व्यवस्था में आम आदमी को लगता रहेगा कि उसकी सुनवाई नहीं हो रही, तब तक ऐसी घटनाएँ किसी न किसी रूप में दोहराई जाती रहेंगी। CJI का 'बच्चे' वाला मेटाफ़र शायद सटीक था — लेकिन सवाल यह है कि इन 'बच्चों' को बड़ा कौन करेगा? क्या सिस्टम उन्हें सुनेगा इससे पहले कि वे अगली बार कागज़ की जगह कुछ और फेंकें?
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मुख्य बातें
- CJI सूर्य कांत पर सुप्रीम कोर्ट में एक याचिकाकर्ता ने कागज़ फेंके और गालियाँ दीं, लेकिन CJI ने कंटेम्प्ट कार्रवाई से परहेज़ किया — NDTV और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- CJI ने कहा 'कभी-कभी बच्चे भी ऐसा करते हैं' — यह बयान न्यायपालिका की संस्थागत थकान और सिस्टम की दरारों का इशारा है।
- भारत में पाँच करोड़ से ज़्यादा मामले लंबित हैं — यह हताशा की वो ज़मीन है जहाँ से ऐसी घटनाएँ जन्म लेती हैं।
- कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट बनाम 'सुने जाने का अधिकार' — यह टकराव आने वाले दिनों में और तीखा होगा।
- सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा और लिटिगेंट प्रोटोकॉल में बदलाव की ज़रूरत अब अनिवार्य हो गई है।
आँकड़ों में
- भारत में लंबित मामलों की संख्या पाँच करोड़ से ऊपर है — न्यायपालिका पर बोझ का सबसे बड़ा संकेतक।
- कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में छह महीने तक की जेल और जुर्माना हो सकता है, लेकिन CJI ने इस मामले में कार्रवाई नहीं की।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: एक याचिकाकर्ता, जिसकी पहचान अभी सार्वजनिक नहीं की गई, और CJI सूर्य कांत — टाइम्स ऑफ़ इंडिया और NDTV के अनुसार।
- क्या: याचिकाकर्ता ने CJI सूर्य कांत पर कागज़ फेंके, अपशब्द कहे और 'I order you to order' जैसी अतार्किक माँगें रखीं — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
- कब: जून 2026 — NDTV और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, हाल ही में सुनवाई के दौरान।
- कहाँ: नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट की कोर्टरूम — NDTV के अनुसार।
- क्यों: याचिकाकर्ता अपनी याचिका पर सुनवाई से असंतुष्ट था और मानसिक रूप से विचलित बताया गया — NDTV के अनुसार।
- कैसे: शख़्स ने सुनवाई के दौरान अचानक कागज़ CJI की बेंच की ओर फेंके, गालियाँ दीं; CJI ने कंटेम्प्ट कार्रवाई से बचते हुए उसे छोड़ दिया — टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
CJI सूर्य कांत पर सुप्रीम कोर्ट में किसने कागज़ फेंके?
NDTV और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान CJI सूर्य कांत पर कागज़ फेंके और अपशब्द कहे। शख़्स की पूरी पहचान अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
CJI ने कागज़ फेंकने वाले शख़्स के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की?
NDTV के अनुसार, CJI ने कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की कार्रवाई नहीं की। उन्होंने शख़्स को 'मानसिक रूप से विचलित' मानते हुए छोड़ दिया और कहा — 'कभी-कभी बच्चे भी ऐसा करते हैं।'
कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट में क्या सज़ा हो सकती है?
कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट्स एक्ट के तहत छह महीने तक की जेल और दो हज़ार रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। लेकिन इस मामले में CJI ने यह रास्ता नहीं चुना।
सुप्रीम कोर्ट में ऐसी घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं?
विश्लेषकों के अनुसार, भारत में पाँच करोड़ से ज़्यादा मामले लंबित हैं। जब आम याचिकाकर्ता को सालों तक सुनवाई नहीं मिलती, तो हताशा आक्रामकता में बदल जाती है। पार्टी-इन-पर्सन याचिकाकर्ताओं की बढ़ती संख्या भी एक कारण है।




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