सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) मैच्योरिटी पर रिडीम करें तो कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री है, लेकिन सेकेंडरी मार्केट में बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स लगता है। ब्याज हमेशा टैक्सेबल है — 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' में रिपोर्ट करें। ITR में ग़लत हेड चुना तो टैक्स-फ्री फ़ायदा भी टैक्सेबल बन सकता है।

सोचिए — आपने आठ साल पहले सोने में भरोसा जताया, सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) ख़रीदा, और अब मैच्योरिटी पर सोने की क़ीमत लगभग दोगुनी हो गई। लाखों का मुनाफ़ा, और सरकार कह रही है कि यह पूरी तरह टैक्स-फ्री है। लेकिन ITR का फ़ॉर्म खोलिए — एक ग़लत कॉलम चुना, एक ग़लत शेड्यूल टिक किया, और वही टैक्स-फ्री रक़म अचानक टैक्सेबल बन जाती है। यह कोई काल्पनिक डर नहीं, यह हर साल हज़ारों निवेशकों के साथ होता है।

Mint की रिपोर्ट के अनुसार, SGB से होने वाली आय को ITR में रिपोर्ट करते समय सबसे बड़ी ग़लती यह होती है कि निवेशक मैच्योरिटी रिडेम्पशन और सेकेंडरी मार्केट सेल के बीच का फ़र्क़ नहीं समझते — और दोनों को एक ही तरह ट्रीट कर देते हैं। यह फ़र्क़ लाखों रुपये का है।

मैच्योरिटी पर रिडीम किया? पूरा कैपिटल गेन टैक्स-फ्री

इनकम टैक्स एक्ट के तहत, अगर आपने SGB को उसकी पूर्ण मैच्योरिटी (आम तौर पर 8 साल) तक होल्ड किया और RBI के ज़रिए रिडीम कराया, तो जो भी कैपिटल गेन हुआ — चाहे ₹50,000 हो या ₹5 लाख — वह पूरी तरह टैक्स-फ्री है। Upstox की गाइड के मुताबिक़, इसे ITR में 'एग्ज़ेम्प्ट इनकम' (छूट-प्राप्त आय) शेड्यूल में दिखाना होता है — शेड्यूल EI में, जहाँ आप वह रक़म भरते हैं जिस पर कोई टैक्स देनदारी नहीं है।

यहीं वह नुक़सानदेह ग़लती होती है: बहुत से लोग इस मुनाफ़े को शेड्यूल CG (कैपिटल गेन्स) में डाल देते हैं, जैसा कि शेयर या म्यूचुअल फ़ंड बेचने पर करते हैं। ऐसा करते ही सिस्टम उस पर टैक्स कैलकुलेट कर लेता है — और आपका टैक्स-फ्री फ़ायदा, टैक्सेबल बन जाता है।

सेकेंडरी मार्केट में बेचा? तो खेल बिलकुल अलग है

अब ज़रा दूसरा परिदृश्य समझिए। अगर आपने SGB को मैच्योरिटी से पहले स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) पर किसी और को बेच दिया, तो यह 'ट्रांसफ़र' माना जाएगा — और इस पर कैपिटल गेन टैक्स लगेगा। Mint की रिपोर्ट के अनुसार, अगर आपने बॉन्ड 12 महीने से ज़्यादा होल्ड किया (जो SGB में आम तौर पर होता ही है, क्योंकि लॉक-इन ही 5 साल का है), तो यह लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन (LTCG) होगा।

यहाँ टैक्स की दर इस बात पर निर्भर करती है कि बॉन्ड कब ख़रीदा गया था। Upstox के अनुसार, 23 जुलाई 2024 के बजट बदलाव के बाद, लिस्टेड बॉन्ड्स पर LTCG की दर 12.5% है — बिना इंडेक्सेशन के। पहले इंडेक्सेशन का फ़ायदा मिलता था जिससे टैक्सेबल गेन कम होता था, लेकिन अब वह सुविधा नहीं रही। इसे ITR में शेड्यूल CG के अंतर्गत रिपोर्ट करना होगा।

2.5% सालाना ब्याज — यह कभी टैक्स-फ्री नहीं था

एक और बात जो कई निवेशक भूल जाते हैं: SGB पर हर छह महीने में जो 2.5% सालाना ब्याज मिलता है, वह हमेशा से टैक्सेबल है। इस पर कोई छूट नहीं — न मैच्योरिटी पर, न सेकेंडरी सेल पर। Mint के अनुसार, यह ब्याज आपकी कुल आय में जुड़ता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। ITR में इसे 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' हेड के तहत रिपोर्ट करना ज़रूरी है।

ध्यान दें — इस ब्याज पर TDS नहीं कटता, इसलिए बहुत से लोग इसे रिपोर्ट करना ही भूल जाते हैं। लेकिन इनकम टैक्स विभाग के पास यह डेटा RBI से आता है। अगर आपने इसे ITR में नहीं दिखाया, तो डिमांड नोटिस आने की पूरी संभावना है।

इंडिया हेराल्ड का पॉलिसी रीड: असली जाल कहाँ है

सतह पर देखें तो SGB शायद भारत का सबसे 'क्लीन' निवेश लगता है — सरकारी गारंटी, सोने जैसा रिटर्न, और मैच्योरिटी पर टैक्स-फ्री। लेकिन इंडिया हेराल्ड का विश्लेषण कहता है कि असली जाल ITR के फ़ॉर्म डिज़ाइन में है। एग्ज़ेम्प्ट इनकम और कैपिटल गेन के शेड्यूल अलग-अलग हैं, लेकिन आम निवेशक को यह अंतर समझाने का कोई इन-बिल्ट मैकेनिज़्म फ़ॉर्म में नहीं है। SGB जैसे ख़ास इंस्ट्रूमेंट के लिए ITR फ़ॉर्म में एक डेडिकेटेड ड्रॉपडाउन तक नहीं है जो बताए कि 'मैच्योरिटी रिडेम्पशन है तो यहाँ भरो, सेकेंडरी सेल है तो वहाँ।' यह सिस्टम की कमी है, और इसका ख़ामियाज़ा निवेशक भुगतता है।

आने वाले महीनों में जैसे-जैसे पुराने SGB ट्रांच मैच्योर होंगे (2024-25 से कई ट्रांच मैच्योरिटी पर आ रहे हैं), इस तरह की ग़लतियों की संख्या और बढ़ेगी। अगर इनकम टैक्स विभाग ने अपना ऑटो-प्रोसेसिंग सिस्टम ठीक नहीं किया, तो हज़ारों निवेशकों को ग़लत डिमांड नोटिस मिलेंगे — और रिफ़ंड का चक्कर महीनों चलेगा।

तो ITR भरते वक़्त क्या करें — एक-एक क़दम

पहला: अगर SGB मैच्योरिटी पर रिडीम हुआ है — कैपिटल गेन को शेड्यूल EI (एग्ज़ेम्प्ट इनकम) में भरें, शेड्यूल CG में नहीं।

दूसरा: अगर सेकेंडरी मार्केट में बेचा है — LTCG को शेड्यूल CG में 12.5% की दर से (बिना इंडेक्सेशन) रिपोर्ट करें।

तीसरा: 2.5% सालाना ब्याज को 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' में ज़रूर दिखाएँ — TDS न कटने का मतलब यह नहीं कि टैक्स नहीं है।

चौथा: AIS (एनुअल इन्फ़ॉर्मेशन स्टेटमेंट) ज़रूर चेक करें — वहाँ SGB से जुड़ी हर ट्रांज़ैक्शन दिखती है। अगर AIS में दिख रहा है और ITR में नहीं, तो नोटिस तय है।

सोने में निवेश की चमक तभी बरक़रार रहेगी जब ITR का फ़ॉर्म सही भरा जाए। वरना वही होगा जो हमेशा होता है — सरकार ने छूट दी, लेकिन फ़ॉर्म की जटिलता ने वह छूट वापस ले ली। सवाल यह नहीं है कि SGB अच्छा निवेश है या नहीं — सवाल यह है कि क्या हमारा टैक्स सिस्टम इतना सरल है कि एक आम निवेशक अपना हक़ ख़ुद ले सके?

यह रिपोर्ट पत्रकारिता है, वित्तीय सलाह नहीं; निवेश और टैक्स से जुड़े निर्णयों के लिए योग्य वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

मुख्य बातें

  • SGB मैच्योरिटी पर रिडीम करने पर कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री है — इसे ITR में शेड्यूल EI (एग्ज़ेम्प्ट इनकम) में भरें, शेड्यूल CG में नहीं — Upstox के अनुसार।
  • सेकेंडरी मार्केट में SGB बेचने पर LTCG टैक्स 12.5% लगता है, बिना इंडेक्सेशन — इसे शेड्यूल CG में रिपोर्ट करें — Mint के अनुसार।
  • SGB पर 2.5% सालाना ब्याज हमेशा टैक्सेबल है, 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' में रिपोर्ट करें — TDS न कटने के बावजूद विभाग के पास RBI का डेटा होता है।
  • AIS (एनुअल इन्फ़ॉर्मेशन स्टेटमेंट) में SGB ट्रांज़ैक्शन चेक करें — वहाँ दिखा और ITR में नहीं तो नोटिस तय है।

आँकड़ों में

  • SGB मैच्योरिटी रिडेम्पशन पर कैपिटल गेन: 100% टैक्स-फ्री (इनकम टैक्स एक्ट के तहत) — Upstox
  • SGB सेकेंडरी मार्केट सेल पर LTCG टैक्स दर: 12.5% बिना इंडेक्सेशन (23 जुलाई 2024 बजट बदलाव के बाद) — Mint
  • SGB पर सालाना ब्याज दर: 2.5%, हमेशा टैक्सेबल, TDS नहीं कटता — Mint

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: वे सभी भारतीय निवेशक जिन्होंने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड (SGB) में निवेश किया है और AY 2026-27 के लिए ITR भर रहे हैं।
  • क्या: SGB से होने वाली आय — ब्याज और कैपिटल गेन — को ITR में सही हेड और शेड्यूल में रिपोर्ट करना, ताकि टैक्स छूट का लाभ मिले और नोटिस न आए।
  • कब: आकलन वर्ष (AY) 2026-27 के लिए ITR फाइलिंग सीज़न, जुलाई 2026 तक की डेडलाइन।
  • कहाँ: भारत — इनकम टैक्स विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल पर।
  • क्यों: क्योंकि मैच्योरिटी पर रिडेम्पशन और सेकेंडरी मार्केट सेल का टैक्स ट्रीटमेंट बिलकुल अलग है; ग़लत रिपोर्टिंग से टैक्स-फ्री लाभ पर भी टैक्स लग सकता है या नोटिस आ सकता है।
  • कैसे: मैच्योरिटी पर कैपिटल गेन को एग्ज़ेम्प्ट इनकम शेड्यूल में, सेकेंडरी सेल पर LTCG को शेड्यूल CG में, और 2.5% सालाना ब्याज को 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' में रिपोर्ट करें — Mint और Upstox के अनुसार।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

SGB मैच्योरिटी पर रिडीम करने पर कितना टैक्स लगता है?

बिलकुल नहीं। अगर SGB को पूरी मैच्योरिटी (8 साल) तक होल्ड करके RBI के ज़रिए रिडीम कराया, तो कैपिटल गेन पूरी तरह टैक्स-फ्री है — इसे ITR में एग्ज़ेम्प्ट इनकम शेड्यूल (EI) में दिखाएँ, Upstox के अनुसार।

SGB को सेकेंडरी मार्केट में बेचने पर टैक्स कैसे लगता है?

सेकेंडरी मार्केट (स्टॉक एक्सचेंज) पर बेचने पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स 12.5% की दर से लगता है, बिना इंडेक्सेशन के। इसे ITR में शेड्यूल CG में रिपोर्ट करें — Mint के अनुसार।

SGB के 2.5% ब्याज पर टैक्स कैसे भरें?

यह ब्याज हमेशा टैक्सेबल है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। इसे 'इनकम फ्रॉम अदर सोर्सेज़' में रिपोर्ट करें। इस पर TDS नहीं कटता, लेकिन विभाग के पास RBI का डेटा होता है — Mint के अनुसार।

ITR में SGB रिपोर्ट करते समय सबसे बड़ी ग़लती क्या होती है?

सबसे बड़ी ग़लती मैच्योरिटी रिडेम्पशन के कैपिटल गेन को शेड्यूल CG में भर देना है, जबकि यह शेड्यूल EI (एग्ज़ेम्प्ट इनकम) में जाना चाहिए। ग़लत शेड्यूल चुनते ही टैक्स-फ्री मुनाफ़ा टैक्सेबल हो जाता है।

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