दिलजीत दोसांझ की फ़िल्म 'सतलुज' को Zee5 से रातों-रात हटा दिया गया और IMDb ने उसकी 9.5 रेटिंग डिलीट कर दी। निर्देशक संजय गुप्ता ने IMDb को 'बोगस' बताया। फ़िल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पर आधारित है, जिस पर CBFC ने 120+ कट्स लगाए थे।
9.5 — IMDb पर यह रेटिंग किसी भारतीय फ़िल्म के लिए लगभग अनसुनी है। 'द शॉशैंक रिडेम्प्शन' की 9.3 रेटिंग को भी पीछे छोड़ दे, ऐसा स्कोर। और फिर एक सुबह आप जागते हैं — वह नंबर ग़ायब। फ़िल्म ग़ायब। जैसे किसी ने बोर्ड से चॉक ही पोंछ दिया हो।
यही हुआ है दिलजीत दोसांझ की 'सतलुज' के साथ। बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार, IMDb ने फ़िल्म की 9.5 रेटिंग को प्लेटफ़ॉर्म से पूरी तरह हटा दिया, और Zee5 ने भी इसे अपने कैटलॉग से चुपचाप डिलीट कर दिया — बिना किसी आधिकारिक बयान के, बिना किसी सफ़ाई के।
निर्देशक संजय गुप्ता ख़ामोश नहीं रहे। बॉलीवुड हंगामा के हवाले से उन्होंने IMDb पर सीधा निशाना साधा: "यह साबित करता है कि वे कितने बोगस हैं।" गुप्ता का गुस्सा समझ में आता है — जब दुनिया का सबसे बड़ा फ़िल्म डेटाबेस किसी फ़िल्म की रेटिंग रातों-रात ग़ायब कर दे, तो सवाल उठना लाज़िमी है: क्या यह तकनीकी 'ग्लिच' है, या कुछ और?
वह कहानी जो 'सिस्टम' को असहज करती है
'सतलुज' कोई मसाला एंटरटेनर नहीं है। यह पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पर आधारित है — वह शख़्स जिसने 1990 के दशक में पंजाब पुलिस द्वारा हज़ारों सिखों की ग़ैरक़ानूनी हत्याओं और गुमनाम अंतिम संस्कारों का पर्दाफ़ाश किया, और फिर ख़ुद 'ग़ायब' कर दिया गया। CBFC ने फ़िल्म पर 120 से अधिक कट्स लगाए, उसका नाम तक बदलवा दिया — पहले 'सतलज' था, फिर 'सतलुज' हुआ। News18 की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा विवाद अब सेंसरशिप और प्लेटफ़ॉर्म पॉलिटिक्स का एक बड़ा सवाल बन गया है।
ज़रा सोचिए: एक फ़िल्म जो सरकारी अत्याचार के काले अध्याय पर रोशनी डालती है, उसे पहले CBFC ने 120+ कट्स से छीला, फिर OTT प्लेटफ़ॉर्म से हटाया गया, फिर दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म डेटाबेस ने उसकी रेटिंग मिटा दी। इतने सारे दरवाज़े एक साथ बंद होते हैं तो 'इत्तेफ़ाक़' शब्द अपनी विश्वसनीयता खो देता है।
इनसाइड टॉक
इंडस्ट्री की गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि Zee5 पर दबाव ऊपर से आया — किस 'ऊपर' से, यह कोई रिकॉर्ड पर नहीं कहता। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि 'सतलुज' की रेटिंग इसलिए नहीं हटाई गई कि वह 'फ़ेक' थी, बल्कि इसलिए कि इतनी ऊँची रेटिंग फ़िल्म को और ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचा रही थी — और यही किसी को रास नहीं आ रहा था। फ़ैन्स मानते हैं कि दिलजीत की स्टार पावर और खालड़ा की कहानी का कॉम्बिनेशन ही असली 'ख़तरा' है। सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार घूम रहा है: "अगर कहानी झूठी होती, तो इसे दबाने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती?" (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
IMDb की विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान
संजय गुप्ता का 'बोगस' वाला बयान सिर्फ़ एक निर्देशक की निराशा नहीं है — यह उस प्लेटफ़ॉर्म पर सवाल है जिसे दुनियाभर के दर्शक फ़िल्म देखने से पहले 'जजमेंट' के लिए खोलते हैं। बॉलीवुड हंगामा की रिपोर्ट के अनुसार, गुप्ता ने साफ़ कहा कि रेटिंग हटाना प्लेटफ़ॉर्म की निष्पक्षता पर गहरा सवाल खड़ा करता है। अगर IMDb किसी फ़िल्म की रेटिंग दबाव में हटा सकता है, तो बाक़ी रेटिंग्स पर भरोसा क्यों? यह सवाल सिर्फ़ 'सतलुज' तक सीमित नहीं — यह हर उस फ़िल्म पर लागू होता है जिसकी रेटिंग किसी को 'असुविधाजनक' लगे।
दिलजीत की ख़ामोशी — सबसे तेज़ बयान
दिलचस्प बात यह है कि दिलजीत दोसांझ ने अब तक इस पूरे मामले पर कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। इंडस्ट्री विश्लेषकों का मानना है कि यह ख़ामोशी रणनीतिक है — जितना शोर 'सिस्टम' मचा रहा है, उतना ही दिलजीत का 'अंडरडॉग' ब्रांड मज़बूत हो रहा है। इंडिया हेराल्ड का आकलन यह है कि यह पूरा प्रकरण डिजिटल सेंसरशिप के उस नए युग की तस्वीर है जहाँ फ़िल्म को थिएटर या OTT से हटाना काफ़ी नहीं — अब रेटिंग, रिव्यू, यहाँ तक कि डिजिटल 'अस्तित्व' को ही मिटाने की कोशिश हो रही है।
लेकिन इतिहास गवाह है — जो किताब जलाई जाती है, वही सबसे ज़्यादा पढ़ी जाती है। पाइरेसी में 'सतलुज' पहले ही लीक हो चुकी है, और हर 'बैन' के बाद उसकी सर्च वॉल्यूम बढ़ी है, घटी नहीं। Zee5 और IMDb ने जवाब देने से अब तक इनकार किया है — उनकी ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक नहीं हुई है।
अब सवाल यह नहीं कि 'सतलुज' कब वापस आएगी। सवाल यह है: डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स के युग में, जब रेटिंग मिटाई जा सकती है, लिस्टिंग हटाई जा सकती है, और कहानी का 'डिजिटल DNA' ही बदला जा सकता है — तो सच को ज़िंदा कौन रखेगा? शायद वही दर्शक, जो अब 'सतलुज' को इसलिए ढूँढ रहे हैं क्योंकि किसी ने उन्हें 'न देखने' को कहा।
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मुख्य बातें
- बॉलीवुड हंगामा के अनुसार, 'सतलुज' की 9.5 IMDb रेटिंग रातों-रात डिलीट कर दी गई और Zee5 ने फ़िल्म को कैटलॉग से हटाया — बिना किसी सार्वजनिक बयान के।
- निर्देशक संजय गुप्ता ने IMDb को 'बोगस' बताया — यह सवाल अब सिर्फ़ एक फ़िल्म का नहीं, बल्कि प्लेटफ़ॉर्म निष्पक्षता का है।
- CBFC ने पहले 120+ कट्स लगाए, नाम बदलवाया — अब डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने भी 'सतलुज' से दूरी बनाई।
- फ़िल्म पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पर आधारित है — जिसने 1990 के दशक में पुलिस अत्याचारों का पर्दाफ़ाश किया था।
- हर बैन के बाद 'सतलुज' की ऑनलाइन सर्च बढ़ी है — सेंसरशिप ख़ुद फ़िल्म का सबसे बड़ा प्रमोशन बन रही है।
आँकड़ों में
- बॉलीवुड हंगामा के अनुसार, 'सतलुज' की IMDb रेटिंग 9.5 थी — जो हटाए जाने से पहले किसी भी हालिया भारतीय फ़िल्म से सबसे ऊँची थी।
- CBFC ने फ़िल्म पर 120 से अधिक कट्स लगाए — News18 की रिपोर्ट के अनुसार।







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