रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने ट्रंप की ईरान नीति पर खुलकर नाराज़गी जताते हुए कहा कि खामेनेई के जनाज़े पर भी बम बरसाने की मानसिकता पागलपन है। नवभारत टाइम्स के अनुसार बख्शी ने इसे तीसरे विश्व युद्ध का संभावित ट्रिगर बताया — जो भारत के तेल, रक्षा और कूटनीतिक हितों के लिए सीधा खतरा है।
एक रिटायर्ड जनरल का इस कदर सरेआम भड़कना — वह भी अमेरिका के राष्ट्रपति पर — भारत की रक्षा और राष्ट्रवादी बिरादरी में कोई मामूली बात नहीं है। लेकिन मेजर जनरल जीडी बख्शी (सेवानिवृत्त) ने जो कहा, वह किसी आवेश में बोली गई बात नहीं थी — वह उस डर की बानगी थी जो दिल्ली के सैन्य गलियारों और साउथ ब्लॉक की फ़ाइलों में धीरे-धीरे गहरा हो रहा है।
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट और उनके पॉडकास्ट इंटरव्यू के अनुसार, बख्शी ने पूछा — "खामेनेई के जनाज़े पर भी बम बरसाएगा क्या ट्रंप?" यह सवाल उन्होंने ईरान पर अमेरिकी हमलों की ताज़ा खबरों के बाद उठाया, जब ट्रंप ने इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बातचीत की और जंग के दायरे को और बढ़ाने के संकेत दिए। बख्शी ने इसे सीधे-सीधे "तीसरे विश्व युद्ध का ट्रिगर" बताया।
और यह कोई अकेली आवाज़ नहीं है। उसी नवभारत टाइम्स चर्चा में विदेश नीति विश्लेषक नाज़िया इलाही खान ने भी ईरान की आक्रामक पोज़ीशन को दुनिया के लिए ख़तरा बताया, लेकिन साथ ही ट्रंप की 'एस्केलेशन फ़र्स्ट' पॉलिसी पर भी सवाल खड़े किए। ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने तो ट्रंप को 'पालतू' जैसे शब्दों से नवाज़ते हुए खुली चेतावनी दी — "मुंह बंद कराओ, वरना सबक सिखाएंगे।"
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि बख्शी जैसी आवाज़ें अकेले नहीं बोल रहीं — सेवारत सैन्य अधिकारियों और MEA (विदेश मंत्रालय) के अंदर भी यही बेचैनी है, बस वे माइक पर नहीं आ सकते। ट्रेड हलकों में चर्चा है कि भारत सरकार ने ईरान स्थिति पर एक 'कंटिंजेंसी ब्रीफ़' तैयार करवाई है, जिसमें तेल आपूर्ति, चाबहार पोर्ट और हिंद महासागर की नौसैनिक तैनाती के तीन परिदृश्य शामिल हैं। (यह इंडस्ट्री चर्चा और अपुष्ट अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
भारत के लिए ट्रंप की ईरान नीति खतरनाक क्यों?
इसे समझने के लिए तीन धागे पकड़ने होंगे। पहला — ऊर्जा सुरक्षा। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और मिडिल ईस्ट में कोई भी बड़ा संघर्ष होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाली तेल आपूर्ति को सीधे ठप कर सकता है। अगर ईरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज़ बंद किया, तो भारत का ईंधन बिल रातोंरात 30-40% तक उछल सकता है — यह आँकड़ा पिछले खाड़ी संकटों के ऐतिहासिक पैटर्न से निकलता है।
दूसरा धागा — चाबहार बंदरगाह। भारत ने पाकिस्तान को बायपास करके अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच बनाने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट में करोड़ों डॉलर लगाए हैं। अगर ट्रंप की नीति ईरान को पूरी तरह दुश्मन बना देती है और भारत को 'पक्ष चुनने' पर मजबूर करती है, तो यह सामरिक निवेश ख़तरे में पड़ता है।
तीसरा — और सबसे नाज़ुक — भारत का 'मल्टी-अलाइनमेंट' का कूटनीतिक दांव। पिछले दो दशकों में भारत ने अमेरिका, रूस, ईरान और इज़रायल — चारों से एक साथ संबंध बनाए रखने की कला को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया है। ट्रंप की 'या हमारे साथ या ख़िलाफ़' वाली पॉलिसी इस पूरे संतुलन को बम से उड़ा सकती है।
बख्शी का गुस्सा और राष्ट्रवादी खेमे का विरोधाभास
यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है जो इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड सामने रखता है। भारत का राष्ट्रवादी खेमा — जिसमें बख्शी एक बड़ी आवाज़ हैं — परंपरागत रूप से अमेरिका-समर्थक और इज़रायल-समर्थक रहा है। लेकिन जब ट्रंप की आक्रामकता इस हद तक पहुँच जाती है कि वह भारत के अपने सामरिक हितों को ही ख़तरे में डाल दे, तो यही खेमा पलटकर सवाल करने लगता है।
बख्शी का 'भड़कना' इसलिए अहम है क्योंकि यह भारतीय राष्ट्रवाद के भीतर एक दरार को उजागर करता है — अमेरिका से दोस्ती ज़रूरी है, लेकिन ट्रंप की हर सनक को 'अमेरिका फ़र्स्ट' मानकर स्वीकार करना भारत की संप्रभुता के ख़िलाफ़ है। नवभारत टाइम्स के अनुसार, बख्शी ने साफ़ कहा कि अमेरिका की यह नीति सिर्फ़ ईरान का नहीं, पूरे एशिया का मसला बनने जा रही है।
आगे क्या — तीन चीज़ें जिन पर नज़र रखें
पहली — भारत के विदेश मंत्रालय का आधिकारिक रुख़। अभी तक MEA ने ईरान-अमेरिका तनाव पर 'सभी पक्षों से संयम बरतने' वाली मानक भाषा इस्तेमाल की है। लेकिन अगर एस्केलेशन और बढ़ता है, तो भारत को 'दोनों तरफ़ खेलने' की कला को और तेज़ करना होगा — और यह कला तब सबसे मुश्किल होती है जब बमबारी चल रही हो।
दूसरी — तेल बाज़ार। कच्चे तेल की कीमतें पहले ही अस्थिर हैं। अगर ट्रंप-नेतन्याहू की बातचीत के बाद इज़रायल सीधे ईरान पर हमला करता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर चुनावी मुद्दा बन सकता है — और यहीं बात राजनीति से जुड़ती है।
तीसरी — और सबसे ज़रूरी — क्या भारत के अपने राष्ट्रवादी खेमे में ट्रंप को लेकर 'मोहभंग' गहराएगा? बख्शी अकेले नहीं हैं। हाल ही में अमेरिका के जाने-माने पॉडकास्टर जो रोगन ने भी ट्रंप को ईरान पर घेरा था — और रोगन ट्रंप के सबसे बड़े समर्थकों में से हैं। जब अपने ही खेमे की आवाज़ें सवाल करने लगें, तो समझिए कि नीति की बुनियाद हिल रही है।
आखिर में एक सवाल जो बख्शी ने उठाया, वह हर भारतीय नागरिक का है — अगर ट्रंप किसी देश के सुप्रीम लीडर के जनाज़े पर भी बम गिराने की बात करता है, तो कल किसी और देश की संप्रभुता पर हमले से उसे कौन रोकेगा? और अगर कोई नहीं रोकता, तो भारत अपनी सीमाओं पर कितना सुरक्षित है?
यह सवाल सिर्फ़ मिडिल ईस्ट का नहीं है। यह हर उस देश का है जो अमेरिकी शक्ति के साये में अपनी कूटनीति चलाता है — और जिसके पास अपनी खुद की ऊर्जा सुरक्षा का कोई पक्का बीमा नहीं है।
यहाँ रिपोर्ट किए गए आरोप नामित स्रोतों से लिए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न हो, अप्रमाणित हैं; न्यायालय के अधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
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मुख्य बातें
- जीडी बख्शी का गुस्सा भारत के रक्षा खेमे की उस गहरी बेचैनी का प्रतिबिंब है जो ट्रंप की ईरान नीति को तीसरे विश्व युद्ध का ट्रिगर मान रही है
- होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने पर भारत का ईंधन बिल 30-40% तक उछल सकता है — ऐतिहासिक पैटर्न यही बताते हैं
- चाबहार पोर्ट और मल्टी-अलाइनमेंट नीति — भारत के दोनों सामरिक दांव ट्रंप की 'या हमारे साथ या ख़िलाफ़' पॉलिसी से ख़तरे में
- राष्ट्रवादी खेमे में ट्रंप को लेकर मोहभंग गहरा रहा है — बख्शी से लेकर जो रोगन तक अपने ही खेमे से सवाल उठ रहे हैं
- भारत के विदेश मंत्रालय का आधिकारिक रुख़ अभी 'संयम बरतें' वाली मानक भाषा तक सीमित है — असली इम्तिहान आगे है
आँकड़ों में
- भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक — होर्मुज़ बंद होने पर ईंधन बिल 30-40% उछलने की संभावना
- ट्रंप ने ईरान हमलों के बाद नेतन्याहू से बातचीत की — जंग के दायरे बढ़ने के संकेत (नवभारत टाइम्स)
- ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने ट्रंप को खुली चेतावनी दी — 'पालतू का मुंह बंद कराओ' (नवभारत टाइम्स)
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी — भारत के जाने-माने सैन्य विश्लेषक और राष्ट्रवादी आवाज़
- क्या: बख्शी ने ट्रंप की ईरान पर आक्रामक नीति की कड़ी आलोचना की, खामेनेई के जनाज़े पर हमले की संभावना को पागलपन बताया
- कब: जून 2026 में नवभारत टाइम्स पॉडकास्ट और बयानों के ज़रिए
- कहाँ: भारत — टीवी और डिजिटल मीडिया पर चर्चा
- क्यों: ट्रंप द्वारा ईरान पर लगातार हमलों और नेतन्याहू से बातचीत के बाद जंग बढ़ने की आशंका से भारत के ऊर्जा, कूटनीति और रक्षा हित खतरे में
- कैसे: बख्शी ने पॉडकास्ट में ट्रंप की नीति को ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए भारत पर इसके असर का विस्तार से विश्लेषण किया
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जीडी बख्शी ट्रंप की ईरान नीति पर क्यों भड़के?
नवभारत टाइम्स के अनुसार, बख्शी ने ट्रंप की खामेनेई के जनाज़े पर भी बम गिराने की मानसिकता को पागलपन और तीसरे विश्व युद्ध का ट्रिगर बताया। उनका मानना है कि यह आक्रामकता भारत के सामरिक हितों के लिए सीधा खतरा है।
ट्रंप की ईरान नीति भारत के लिए कैसे खतरनाक है?
तीन तरह से — होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद होने से तेल आपूर्ति संकट, चाबहार पोर्ट निवेश पर ख़तरा, और भारत की मल्टी-अलाइनमेंट कूटनीति पर दबाव।
क्या भारत के राष्ट्रवादी खेमे में ट्रंप से मोहभंग हो रहा है?
बख्शी जैसी प्रमुख राष्ट्रवादी आवाज़ें ट्रंप की नीति पर खुलकर सवाल उठा रही हैं। जो रोगन जैसे ट्रंप समर्थकों ने भी ईरान पर उन्हें घेरा है — यह संकेत है कि अपने ही खेमे से विरोध बढ़ रहा है।
ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने ट्रंप पर क्या कहा?
नवभारत टाइम्स के अनुसार, अराघची ने ट्रंप को 'पालतू' जैसे शब्दों से संबोधित करते हुए कहा — 'मुंह बंद कराओ, वरना सबक सिखाएंगे' — जो ईरान की आक्रामक पोज़ीशन को दर्शाता है।






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