जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश ने बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए हैं, 25 लोगों को रेस्क्यू किया गया। एनडीटीवी के अनुसार कई इलाकों में पानी भर गया। लेकिन असली सवाल यह है कि 2014 की तबाही के बाद बने फ्लड मैनेजमेंट प्लान बार-बार क्यों फेल हो रहे हैं।

पच्चीस लोग। बाढ़ के पानी से निकाले गए — फिर से, उसी जम्मू-कश्मीर से, उसी मानसून में, उसी तरह। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार भारी बारिश ने घाटी और जम्मू संभाग के कई इलाकों में बाढ़ जैसे हालात पैदा कर दिए, सड़कें डूबीं, मकानों में पानी घुसा, और बचाव दलों को एक बार फिर वही काम करना पड़ा जो वे हर जुलाई करते हैं। इस बार संख्या 25 है — अगली बार कितनी होगी, यह सवाल किसी के एजेंडे पर नहीं है।

और यही वह बिंदु है जहाँ ख़बर ख़त्म होती है और असली कहानी शुरू होती है।

2014 की तबाही से सीखा क्या?

सितंबर 2014 — जम्मू-कश्मीर की सबसे भयावह बाढ़। झेलम उफान पर, श्रीनगर का बड़ा हिस्सा डूबा, सरकारी आँकड़ों के अनुसार 300 से ज़्यादा लोगों ने जान गँवाई, हज़ारों करोड़ का नुकसान। उसके बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने जो वादे किए — फ्लड मैनेजमेंट प्लान, झेलम फ्लड चैनल की सफ़ाई, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, NDMA की गाइडलाइंस का अमल — उनकी फ़ाइलें ज़रूर मोटी हुईं, ज़मीन पर बहुत कम बदला। NDMA की अपनी वेबसाइट पर बाढ़ प्रबंधन के दिशानिर्देशों में स्पष्ट लिखा है कि बाढ़-प्रवण राज्यों में सालाना मॉक ड्रिल, नदी-तटबंधों की नियमित जाँच और ड्रेनेज अपग्रेड ज़रूरी है। सवाल सीधा है: ये सब कागज़ पर तो हैं — ज़मीन पर कहाँ हैं?

अमरनाथ रूट: तीर्थयात्रा और राजनीति दोनों 'बारिश-प्रूफ' नहीं

हर साल जून-जुलाई में लाखों श्रद्धालु अमरनाथ यात्रा पर निकलते हैं — ठीक उसी वक़्त जब मानसून अपने शबाब पर होता है। यात्रा रूट पर लैंडस्लाइड, फ़्लैश फ़्लड और सड़कें बंद होना लगभग सालाना रिवाज़ बन चुका है। 2022 में क्लाउडबर्स्ट ने यात्रा रूट पर तबाही मचाई, कई लोगों की जान गई — इसके बाद भी रूट इंफ्रा में जो बड़े बदलाव होने चाहिए थे, वे टुकड़ों में रहे। NDRF और SDRF की तैनाती ज़रूर होती है, लेकिन यह 'रिएक्टिव मॉडल' है — 'प्रिवेंटिव' नहीं। बाढ़ आए, फिर बचाओ। सवाल यह है कि क्या अमरनाथ यात्रा रूट पर स्थायी वॉटरशेड मैनेजमेंट, रिटेनिंग वॉल और ड्रेनेज सिस्टम के लिए जो करोड़ों मंज़ूर हुए, वे सही जगह ख़र्च हुए?

पॉलिटिकल पल्स

सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि जम्मू-कश्मीर में बाढ़ राहत अब एक 'इवेंट मैनेजमेंट' बन चुकी है — हर बार तबाही के बाद केंद्रीय मंत्री का दौरा, राहत पैकेज का ऐलान, फिर अगले मानसून तक सन्नाटा। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश है — यानी बाढ़ प्रबंधन की ज़िम्मेदारी सीधे केंद्र सरकार की है, कोई 'राज्य सरकार ने नहीं किया' वाला बहाना नहीं चलता। लेकिन राजनीतिक हलकों में यह बात खुलकर कोई नहीं कहता कि आपदा प्रबंधन पर ख़र्च 'दिखता' कम है क्योंकि उसमें रिबन-कटिंग और उद्घाटन नहीं होता — ड्रेनेज साफ़ करना, तटबंध मज़बूत करना, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाना — ये काम चुनावी रैली में जनता को दिखाने लायक नहीं होते।

(यह राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चल रही चर्चा पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)

'स्मार्ट सिटी' का पैसा और बाढ़ की नाली

श्रीनगर को स्मार्ट सिटी मिशन में शामिल किया गया, करोड़ों आवंटित हुए। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का एक बड़ा हिस्सा 'स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज' और 'वॉटर मैनेजमेंट' पर ख़र्च होना था। लेकिन जब भी बारिश तेज़ होती है, श्रीनगर की सड़कों पर नाव चलती है — डल झील का जलस्तर बढ़ता है, लोगों के घर डूबते हैं। यह सवाल किसी विपक्षी दल का नहीं, आम नागरिक का है: पैसा गया कहाँ?

इस पूरी तस्वीर के पीछे जो गणित छिपा है, उसे इंडिया हेराल्ड सीधे सामने रख रहा है — यह महज़ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, यह एक ऐसी राजनीतिक संरचना की विफलता है जहाँ आपदा-तैयारी में निवेश का कोई चुनावी 'रिटर्न' नहीं दिखता। जब तक बाढ़ रोकथाम का काम राजनीतिक रूप से 'ग़ैर-ग्लैमरस' रहेगा, तब तक हर जुलाई वही तबाही दोहराई जाएगी।

आगे क्या देखें

अगर मानसून और तेज़ हुआ — जो मौसम विभाग के पूर्वानुमानों के अनुसार इस बार सामान्य से अधिक बारिश की संभावना जताता है — तो अगले कुछ हफ़्तों में जम्मू-कश्मीर में और बड़ी बाढ़ की स्थिति बन सकती है। अमरनाथ यात्रा के दौरान कोई बड़ी घटना होती है तो केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वे 'रिएक्टिव' मॉडल छोड़कर स्थायी इंफ्रा निवेश करें। विपक्ष — चाहे नेशनल कॉन्फ्रेंस हो, PDP हो या कांग्रेस — इस मुद्दे को संसद और मीडिया में उठाएगा, लेकिन जिस तरह बड़े भू-राजनीतिक मुद्दों पर ध्यान बँटता है, बाढ़ प्रबंधन हमेशा की तरह अगली हेडलाइन के नीचे दब सकता है।

25 लोग बचाए गए — यह राहत है। लेकिन जिस दिन रेस्क्यू की ज़रूरत ही न पड़े, उस दिन के लिए कौन काम कर रहा है? यह सवाल इस मानसून का नहीं, हर मानसून का है — और जब तक इसका जवाब नहीं मिलता, कश्मीर की वादियाँ हर जुलाई में डूबती रहेंगी।

आरोप और दावे यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से रिपोर्ट किए गए हैं और जब तक अदालत का फ़ैसला न आए, अप्रमाणित हैं; न्यायालय के अधीन मामले बिना पूर्वाग्रह के रिपोर्ट किए गए हैं।

इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।

More from India Herald

Zero Commissioners, Full Ballot Boxes — Is Trump Engineering America's First Unpoliced Midterm?PoliticsZero Commissioners, Full Ballot Boxes — Is Trump Engineering America's First Unpoliced Midterm?With both remaining members of the Election Assistance Commission dismissed weeks before critical 2026 midterm preparations begin, America's…Modi in Auckland, First Indian PM in 40 Years — But What Did He Trade Away in Canberra to Open New Zealand's Dairy Door?PoliticsModi in Auckland, First Indian PM in 40 Years — But What Did He Trade Away in Canberra to Open New Zealand's Dairy Door?Narendra Modi lands in Auckland as the first Indian PM in four decades — but the real story isn't the handshake, it's the free trade agreeme…Ajay Devgn's 'Chauhaan' Quietly Erases Zeeshan Ayyub's Voice — Is Bollywood Now Cancelling Its Own Cast Before the Boycott Even Trends?MoviesAjay Devgn's 'Chauhaan' Quietly Erases Zeeshan Ayyub's Voice — Is Bollywood Now Cancelling Its Own Cast Before the Boycott Even Trends?The 'Chauhaan' teaser was quietly re-edited, with Mohammed Zeeshan Ayyub's voiceover reportedly replaced — a stealth manoeuvre that reveals …F-35s for Ankara, CAATSA Relief for Delhi — But Who Arms Pakistan Through the Back Door Trump Just Opened?PoliticsF-35s for Ankara, CAATSA Relief for Delhi — But Who Arms Pakistan Through the Back Door Trump Just Opened?Trump's sudden embrace of Ankara — lifting the S-400 penalty and restoring F-35 access — hands India a potential CAATSA shield. But the same…Israeli Intel Fed Trump an 'Iran Kill Plot' — Genuine Threat or the Pretext That Reprices India's Crude Overnight?PoliticsIsraeli Intel Fed Trump an 'Iran Kill Plot' — Genuine Threat or the Pretext That Reprices India's Crude Overnight?Israel shared intelligence with the Trump administration about an alleged Iranian assassination plot — but the real question is whether this…

मुख्य बातें

  • एनडीटीवी के अनुसार जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश से बाढ़ जैसे हालात, 25 लोगों को रेस्क्यू किया गया।
  • 2014 की विनाशकारी बाढ़ के बाद बने फ्लड मैनेजमेंट प्लान ज़मीन पर लागू होने में बार-बार विफल रहे हैं।
  • अमरनाथ यात्रा रूट इंफ्रा अभी भी 'रिएक्टिव मॉडल' पर चलता है — स्थायी प्रिवेंटिव निवेश नहीं।
  • श्रीनगर स्मार्ट सिटी मिशन के तहत ड्रेनेज पर आवंटित फंड का ज़मीनी असर सवालों के घेरे में।
  • अनुच्छेद 370 हटने के बाद बाढ़ प्रबंधन की पूरी ज़िम्मेदारी सीधे केंद्र सरकार पर — बहाने का कोई रास्ता नहीं।

आँकड़ों में

  • 25 लोगों को बाढ़ जैसे हालात में रेस्क्यू किया गया — एनडीटीवी
  • 2014 की जम्मू-कश्मीर बाढ़ में सरकारी आँकड़ों के अनुसार 300 से अधिक लोगों की मौत
  • श्रीनगर स्मार्ट सिटी मिशन में स्टॉर्मवॉटर ड्रेनेज पर करोड़ों आवंटित — आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय

छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे

  • कौन: जम्मू-कश्मीर के बाढ़ प्रभावित इलाकों के निवासी और बचाव दल — एनडीटीवी के अनुसार 25 लोगों को बचाया गया।
  • क्या: भारी बारिश के बाद जम्मू-कश्मीर में बाढ़ जैसे हालात बने, कई इलाकों में पानी भरा और बचाव अभियान चलाया गया।
  • कब: जुलाई 2026 — मानसून सीज़न के दौरान।
  • कहाँ: जम्मू-कश्मीर, जिसमें अमरनाथ यात्रा रूट और आसपास के इलाके शामिल।
  • क्यों: भारी मानसूनी बारिश, अपर्याप्त ड्रेनेज इंफ्रास्ट्रक्चर और फ्लड मैनेजमेंट योजनाओं के ज़मीनी क्रियान्वयन की कमी।
  • कैसे: लगातार बारिश से नदियाँ और नाले उफान पर आए, निचले इलाकों में पानी भरा और NDRF-SDRF टीमों ने 25 फँसे लोगों को रेस्क्यू किया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जम्मू-कश्मीर में 2026 की बाढ़ में कितने लोगों को बचाया गया?

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार भारी बारिश के बाद बाढ़ जैसे हालात में 25 लोगों को रेस्क्यू किया गया।

2014 की बाढ़ के बाद जम्मू-कश्मीर में फ्लड मैनेजमेंट प्लान क्यों काम नहीं कर रहा?

NDMA की गाइडलाइंस के बावजूद झेलम फ्लड चैनल सफ़ाई, अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और ड्रेनेज अपग्रेड का ज़मीनी क्रियान्वयन बेहद कमज़ोर रहा है। आपदा-रोकथाम में राजनीतिक 'रिटर्न' न होने से निवेश टलता रहा।

अमरनाथ यात्रा रूट पर बाढ़ और लैंडस्लाइड का ख़तरा क्यों बना रहता है?

यात्रा का समय ठीक मानसून पीक के दौरान होता है और रूट पर स्थायी वॉटरशेड मैनेजमेंट, रिटेनिंग वॉल और ड्रेनेज सिस्टम अभी भी अपर्याप्त हैं — मॉडल 'प्रिवेंटिव' नहीं, 'रिएक्टिव' है।

अनुच्छेद 370 हटने के बाद बाढ़ प्रबंधन की ज़िम्मेदारी किसकी है?

जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद बाढ़ प्रबंधन सहित आपदा तैयारी की ज़िम्मेदारी सीधे केंद्र सरकार पर आती है।

More from India Herald

ट्रंप झुकेंगे नहीं, पुतिन रुकेंगे नहीं — दो खुफिया रिपोर्ट्स ने तीसरे विश्व युद्ध का डर क्यों जगा दिया?Politicsट्रंप झुकेंगे नहीं, पुतिन रुकेंगे नहीं — दो खुफिया रिपोर्ट्स ने तीसरे विश्व युद्ध का डर क्यों जगा दिया?दो ताज़ा इंटेलिजेंस असेसमेंट बताती हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति पुतिन — दोनों पीछे हटने को तैयार नहीं। इंडिया हेराल्ड …खामेनेई की क़ब्र पर 'Kill Trump' के नारे — ईरान के नए 'सुप्रीम' की रेस में भारत का चाबहार किसके हाथ लगेगा?Politicsखामेनेई की क़ब्र पर 'Kill Trump' के नारे — ईरान के नए 'सुप्रीम' की रेस में भारत का चाबहार किसके हाथ लगेगा?मशहद में लाखों का जनसैलाब, 'Kill Trump' के पोस्टर, और पर्दे के पीछे सुप्रीम लीडर की कुर्सी के लिए IRGC बनाम सुधारवादी खेमे की ख़ूनी जंग — इं…पुतिन के 'दोस्त' ट्रंप ने यूक्रेन को पैट्रियट का लाइसेंस दिया — इस यू-टर्न के पीछे कौन सा मास्टरप्लान?Politicsपुतिन के 'दोस्त' ट्रंप ने यूक्रेन को पैट्रियट का लाइसेंस दिया — इस यू-टर्न के पीछे कौन सा मास्टरप्लान?जो ट्रंप चुनाव प्रचार में यूक्रेन को एक डॉलर और देने से मना कर रहे थे, उन्होंने अचानक ज़ेलेंस्की को अमेरिका की सबसे ताकतवर एयर डिफेंस मिसाइल…

Find out more: