प्रियांक खरगे ने RSS की बेलगावी बैठक को 'प्राइवेट' बताते हुए कहा कि इसे किसी सरकारी अनुमति की ज़रूरत नहीं। यह सिद्धारमैया सरकार का सोचा-समझा कैलकुलेशन है — लिंगायत-वोक्कलिगा वोट बैंक में संघ से सीधे टकराव राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो रहा था, इसलिए टोन बदली गई।
एक आदमी जो पिछले तीन साल से हर प्रेस कॉन्फ्रेंस में RSS का नाम लेकर आग उगलता रहा हो, वह अचानक कहे — 'प्राइवेट मीटिंग है, परमिशन की ज़रूरत नहीं' — तो समझिए कि बात प्रेस बाइट से कहीं ज़्यादा गहरी है। कर्नाटक के IT मंत्री प्रियांक खरगे का यह एक वाक्य, हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, सिद्धारमैया सरकार की बदली हुई सियासी गणित का सबसे साफ़ सबूत है।
मसला है RSS की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) — संघ की सबसे बड़ी निर्णायक बैठक — जो 10 जुलाई से बेलगावी में होनी है। हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, यह बैठक हर तीन साल में होती है और इसमें संघ की भावी रणनीति, संगठनात्मक फेरबदल और राष्ट्रीय मुद्दों पर दिशा तय होती है। बेलगावी का चुनाव अपने आप में दिलचस्प है — उत्तर कर्नाटक का यह इलाक़ा लिंगायत राजनीति का गढ़ है, और संघ का यहाँ गहरा सांगठनिक ढाँचा है।
अब तक का पैटर्न याद कीजिए। हर बार जब कर्नाटक में RSS या उसके सहयोगी संगठनों की कोई बड़ी गतिविधि होती, कांग्रेस का पहला रिएक्शन होता था — विरोध, आरोप, 'सांप्रदायिक एजेंडा' का तमग़ा। ख़ुद प्रियांक खरगे इस आक्रामकता के चेहरा रहे हैं। वे सोशल मीडिया पर संघ के ख़िलाफ़ सबसे तीखी भाषा इस्तेमाल करने वाले कांग्रेसी नेताओं में शुमार हैं।
बेलगावी का भूगोल और कांग्रेस की मजबूरी
तो फिर बदला क्या? बदली ज़मीन। बेलगावी और पूरा उत्तर कर्नाटक लिंगायत-बहुल है। यहाँ RSS की शाखाएँ दशकों पुरानी हैं और सामाजिक ताने-बाने में इस क़दर रची-बसी हैं कि संघ का विरोध करना सीधे-सीधे उन लाखों परिवारों को नाराज़ करना है जिनके बच्चे शाखा में जाते हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को उत्तर कर्नाटक में जो झटके लगे, उनकी एक बड़ी वजह यही थी कि पार्टी का 'एंटी-हिंदुत्व' नैरेटिव ज़मीन पर 'एंटी-हिंदू' के तौर पर प्रोजेक्ट किया गया।
इसे समझने के लिए एक और पहलू देखिए — डीके शिवकुमार। कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष और डिप्टी सीएम शिवकुमार वोक्कलिगा बेल्ट की नब्ज़ जानते हैं। सूत्रों के हवाले से राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि शिवकुमार ने पार्टी को साफ़ संदेश दिया है — 'धार्मिक संगठनों से बेवजह का टकराव बंद करो, वरना 2028 का विधानसभा चुनाव हाथ से निकल जाएगा।' यह चर्चा पुष्ट नहीं है, लेकिन खरगे के बदले हुए सुर से इसे बल मिलता है।
पॉलिटिकल पल्स
कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में एक और फुसफुसाहट है — कि यह सिर्फ़ शिवकुमार का दबाव नहीं, बल्कि दिल्ली से आया 'साइलेंट डायरेक्टिव' है। कांग्रेस आलाकमान ने कथित तौर पर सभी राज्य इकाइयों को अनौपचारिक रूप से कहा है कि सांस्कृतिक और धार्मिक संगठनों से सीधा मोर्चा न खोलें — चुनावी ज़मीन पर इसकी क़ीमत बहुत भारी पड़ रही है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में 2023 की हार के बाद कांग्रेस के अंदर यह समझ बनी कि 'सॉफ्ट हिंदुत्व' से लड़ने का रास्ता 'एंटी-RSS' नारों से नहीं, बल्कि विकास और कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी से होकर जाता है। (यह राजनीतिक हलकों की चर्चा और विश्लेषण पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यही है कि खरगे का यह यू-टर्न कोई ग़लती से निकला बयान नहीं — यह एक कैलकुलेटेड शिफ़्ट है। सिद्धारमैया सरकार ने पिछले दो साल में गारंटी योजनाओं (शक्ति, गृह लक्ष्मी, अन्न भाग्य) पर अरबों ख़र्च किए हैं। अब रणनीति यह है कि लड़ाई उस मैदान पर लड़ो जहाँ तुम मज़बूत हो — वेलफ़ेयर डिलीवरी — न कि उस मैदान पर जहाँ BJP और संघ तुम्हें 'हिंदू-विरोधी' साबित कर सकते हैं।
इसका मतलब क्या — आगे क्या होगा?
लेकिन इसमें एक बड़ा जोखिम भी है। कांग्रेस का कोर वोटर — दलित, अल्पसंख्यक, प्रगतिशील तबक़ा — इस 'नरम रुख' को कैसे लेगा? अगर पार्टी संघ पर चुप रहती है, तो वह अपने उस बेस को अलग-थलग कर सकती है जो 'वैचारिक लड़ाई' की उम्मीद रखता है। यही कांग्रेस की शाश्वत दुविधा है — बीच का रास्ता निकालना, जहाँ न लिंगायत नाराज़ हो, न दलित; न संघ भड़के, न सेक्युलर वोटर।
10 जुलाई के बाद देखने वाली बात यह होगी कि बेलगावी बैठक में संघ क्या एजेंडा तय करता है। अगर ABPS में कर्नाटक सरकार की किसी नीति पर सीधा निशाना लगा, तो कांग्रेस का यह 'शांत रहो' फ़ॉर्मूला कितना टिकता है — यही असली परीक्षा होगी। और अगर टिक गया, तो समझिए कि 2028 के विधानसभा चुनाव की ज़मीन आज बेलगावी में तैयार हो रही है।
आख़िर में सवाल एक ही है: क्या कांग्रेस ने सच में समझ लिया है कि धार्मिक संगठनों से सीधी टक्कर लेना चुनावी आत्मघात है — या यह सिर्फ़ बैठक के दिनों तक की चतुराई है, और बैठक ख़त्म होते ही पुरानी आग वापस लौटेगी?
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मुख्य बातें
- प्रियांक खरगे ने RSS की बेलगावी बैठक को 'प्राइवेट' बताकर कांग्रेस का दशकों पुराना 'संघ-विरोधी' पैटर्न तोड़ा — यह कैलकुलेटेड शिफ़्ट है, एक्सीडेंट नहीं।
- उत्तर कर्नाटक के लिंगायत-बहुल इलाक़ों में संघ की सामाजिक पैठ इतनी गहरी है कि RSS-विरोध सीधे वोट-नुकसान में बदलता है — 2024 लोकसभा के नतीजे इसका सबूत हैं।
- कांग्रेस की नई रणनीति: लड़ाई वेलफ़ेयर डिलीवरी के मैदान पर लड़ो, न कि उस मैदान पर जहाँ BJP तुम्हें 'हिंदू-विरोधी' साबित कर सके।
- असली परीक्षा 10 जुलाई के बाद: अगर ABPS में कर्नाटक सरकार पर निशाना लगा, तो कांग्रेस का 'शांत रहो' फ़ॉर्मूला कितना टिकेगा — यही 2028 की दिशा तय करेगा।
आँकड़ों में
- RSS की ABPS बैठक 10 जुलाई से बेलगावी में होगी — यह संघ की सबसे बड़ी निर्णायक राष्ट्रीय बैठक है, हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार।
- सिद्धारमैया सरकार ने गारंटी योजनाओं (शक्ति, गृह लक्ष्मी, अन्न भाग्य) पर अरबों रुपये ख़र्च किए हैं — कांग्रेस इसे अपनी नई चुनावी ढाल बना रही है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: कर्नाटक के IT मंत्री प्रियांक खरगे, जो कांग्रेस के आक्रामक प्रवक्ताओं में गिने जाते हैं।
- क्या: उन्होंने कहा कि RSS की बेलगावी में 10 जुलाई से होने वाली राष्ट्रीय बैठक एक प्राइवेट मीटिंग है और इसे सरकारी अनुमति की ज़रूरत नहीं, हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार।
- कब: जुलाई 2026 — बैठक 10 जुलाई से बेलगावी में निर्धारित है।
- कहाँ: बेलगावी (कर्नाटक), जो उत्तर कर्नाटक का राजनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र है।
- क्यों: कर्नाटक में कांग्रेस को लिंगायत और वोक्कलिगा बहुल क्षेत्रों में संघ से टकराव से ज़मीनी नुकसान हो रहा था; पार्टी ने रणनीतिक रूप से टोन बदलने का फ़ैसला किया।
- कैसे: खरगे ने सार्वजनिक बयान में बैठक को 'प्राइवेट' और 'संगठनात्मक' क़रार देकर सरकार को इस मसले से अलग कर दिया — न विरोध, न अनुमति का सवाल।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
RSS की बेलगावी बैठक (ABPS) 2026 में कब है?
हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार, RSS की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (ABPS) 10 जुलाई 2026 से बेलगावी, कर्नाटक में शुरू होगी। यह संघ की सबसे बड़ी निर्णायक बैठक है जो हर तीन साल में होती है।
प्रियांक खरगे ने RSS बैठक पर क्या कहा?
खरगे ने कहा कि RSS की बैठक एक प्राइवेट मीटिंग है और इसे किसी सरकारी अनुमति की ज़रूरत नहीं। यह उनके पिछले आक्रामक रुख से बिलकुल अलग है — हिंदुस्तान टाइम्स ने इसे रिपोर्ट किया।
कांग्रेस ने RSS के प्रति नरम रुख क्यों अपनाया?
विश्लेषकों के अनुसार, उत्तर कर्नाटक के लिंगायत-बहुल क्षेत्रों में संघ की गहरी सामाजिक पैठ है। 2024 लोकसभा में कांग्रेस को यहाँ नुकसान हुआ। पार्टी ने माना कि सीधा RSS-विरोध चुनावी रूप से आत्मघाती है और रणनीति बदलने का फ़ैसला किया।




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