दिल्ली चिड़ियाघर के लिए स्वीकृत लगभग ₹400 करोड़ की कायाकल्प योजना पाँच महीने बीतने के बाद भी टेंडरिंग स्टेज तक नहीं पहुँची है। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, प्रशासनिक अनुमोदन, DPR संशोधन और विभागीय समन्वय में देरी से पूरा प्रोजेक्ट फाइलों में फँसा हुआ है।
चार सौ करोड़ रुपये। इतनी रकम में आप एक छोटा शहर खड़ा कर दें, दो-तीन बड़े फ्लाईओवर बना लें, या फिर — अगर आप दिल्ली की सरकारी मशीनरी हैं — तो पाँच महीने तक फाइलों के बीच एक चिड़ियाघर का सपना सड़ने दें। दैनिक जागरण की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली चिड़ियाघर (राष्ट्रीय प्राणी उद्यान) के लिए मंज़ूर किए गए लगभग ₹400 करोड़ के 'कायाकल्प' प्रोजेक्ट में अब तक एक ईंट भी नहीं रखी गई है — टेंडर तक जारी नहीं हुआ।
यह कहानी सुनने में किसी और सरकारी ढिलाई जैसी लग सकती है। लेकिन ज़रा करीब से देखें तो यह दिल्ली की उस 'क्लासिक बीमारी' का ताज़ा एक्स-रे है, जहाँ बजट का ऐलान प्रेस कॉन्फ्रेंस का तमगा बनता है, और उसके बाद फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक यात्रा करती रहती है — बिना किसी मंज़िल के।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मेगा प्रोजेक्ट की DPR (Detailed Project Report) में बार-बार संशोधन माँगे जा रहे हैं। प्रशासनिक अनुमोदन की प्रक्रिया भी उलझी हुई है, और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA), दिल्ली चिड़ियाघर प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों के बीच समन्वय लगभग शून्य है। नतीजा — एक ऐसा प्रोजेक्ट जो ज़मीन पर उतरने से पहले ही 'कमेटी मीटिंग्स' और 'रिवीज़न नोट्स' के चक्रव्यूह में फँस गया है।
असली सवाल: देरी के पीछे कौन?
सतह पर यह 'प्रोसीज़रल डिले' दिखती है — कागज़ी कार्रवाई, तकनीकी जाँच, मंज़ूरी का इंतज़ार। लेकिन दिल्ली की सियासी गलियारों में जो फुसफुसाहट है, वह कुछ और कहती है। सूत्रों के हवाले से चर्चा यह है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में ठेकेदारी का 'केक' कौन काटेगा — यह तय होने तक फाइल आगे बढ़ने नहीं दी जाएगी। दिल्ली में करोड़ों के इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट का इतिहास गवाह है — जहाँ भी बड़ा बजट आता है, वहाँ 'लॉबिंग' पहले पहुँचती है, ठेकेदार बाद में।
यह बात ध्यान देने लायक है कि दिल्ली चिड़ियाघर सीधे केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन आता है। यानी यहाँ दिल्ली की निर्वाचित सरकार बनाम एलजी की वह क्लासिक खींचतान सीधे लागू नहीं होती — यह पूरी तरह केंद्र का मामला है। फिर भी पाँच महीने की देरी बताती है कि समस्या किसी एक अधिकारी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में चर्चा है कि ₹400 करोड़ का यह प्रोजेक्ट 'शोकेस वैल्यू' रखता है — जो भी सरकार इसे पूरा करेगी, उसे दिल्ली के मध्यवर्गीय मतदाता के बीच 'ग्रीन गवर्नेंस' का तमगा मिलेगा। लेकिन जब तक यह तय नहीं हो जाता कि इसका श्रेय कौन लेगा — केंद्रीय मंत्री, चिड़ियाघर प्रशासन, या कोई और — तब तक फाइल को 'तकनीकी कारणों' से रोके रखना सबसे सुरक्षित रणनीति है।
(यह राजनीतिक विश्लेषण और अपुष्ट चर्चाओं पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
₹400 करोड़ की 'सड़ती विरासत'
राष्ट्रीय प्राणी उद्यान की स्थिति पर पहले भी कई बार सवाल उठे हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की पिछली रिपोर्टों में बुनियादी ढाँचे की जर्जरता, एनक्लोज़र्स की कमी और विज़िटर अनुभव में गिरावट का ज़िक्र रहा है। दिल्ली चिड़ियाघर, जिसे सालाना लाखों पर्यटक देखने आते हैं, वर्ल्ड-क्लास ज़ू बनने की होड़ में सिंगापुर, सैन डिएगो तो छोड़ें, मैसूर और हैदराबाद के चिड़ियाघरों से भी पिछड़ रहा है। ₹400 करोड़ का यह बजट इसी खाई को पाटने के लिए था — एनक्लोज़र अपग्रेड, लैंडस्केपिंग, विज़िटर सुविधाएँ, और जानवरों के लिए 'इमर्सिव हैबिटैट' बनाने के लिए।
लेकिन जब तक फाइल चलती रहेगी, जानवर उन्हीं पुरानी, टूटी बाड़ों में रहेंगे — और दिल्ली का मध्यवर्ग 'अमेज़िंग इंडिया' के सपने अपने मोबाइल पर देखता रहेगा, ज़मीन पर नहीं।
आगे क्या — और क्या देखें
इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि जब तक मॉनसून सत्र या उसके आसपास कोई 'ऊपर से धक्का' नहीं आता — मंत्रालय स्तर पर कोई सीधा निर्देश, या मीडिया दबाव — यह प्रोजेक्ट 2026 में ज़मीन पर उतरने की संभावना बेहद कम है। DPR फाइनल होने के बाद भी टेंडरिंग, ठेकेदार चयन, और फिर निर्माण — इसमें कम से कम 12-18 महीने और लगेंगे। यानी अगर आज भी सब ठीक हो जाए, तो दिल्लीवासी 2028 से पहले 'नया चिड़ियाघर' नहीं देख पाएँगे।
देखने वाली बात यह होगी कि क्या संसद के मॉनसून सत्र में कोई सांसद इस मुद्दे को उठाता है, क्या पर्यावरण मंत्रालय कोई समयसीमा तय करता है, और क्या ठेकेदारी लॉबी के दबाव में DPR का 'अंतिम' वर्ज़न कितनी बार और बदलता है। अगर अगले तीन महीनों में टेंडर नहीं निकला, तो समझ लीजिए — यह प्रोजेक्ट उसी 'दिल्ली कब्रिस्तान' में जा रहा है जहाँ दर्जनों मेगा प्रोजेक्ट पहले से दफ़न हैं।
₹400 करोड़ का बजट पास करना आसान है — उसे खर्च करना, वह भी ईमानदारी से, दिल्ली की सबसे कठिन परीक्षा है। सवाल यह नहीं कि पैसा है या नहीं। सवाल यह है — पैसा किसकी जेब में जाएगा, यह तय होने तक शेर, हाथी और बाघ इंतज़ार करें, या फाइलों के बीच दम तोड़ दें?
आरोपों और चर्चाओं के संदर्भ में: यहाँ उल्लिखित आरोप नामित स्रोतों और चर्चाओं पर आधारित हैं तथा जब तक न्यायालय का निर्णय न हो, अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामलों पर बिना पूर्वाग्रह रिपोर्टिंग की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
More from India Herald
मुख्य बातें
- दिल्ली चिड़ियाघर के लिए ₹400 करोड़ की कायाकल्प योजना 5 महीने से कागज़ों पर अटकी — टेंडर तक जारी नहीं (दैनिक जागरण)।
- DPR में बार-बार संशोधन, विभागों के बीच समन्वय की कमी और प्रशासनिक मंज़ूरी में देरी मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।
- सियासी हलकों में चर्चा है कि ठेकेदारी लॉबी और श्रेय की राजनीति ने फाइल को रोक रखा है।
- अगर अगले 3 महीनों में टेंडर नहीं निकला, तो 2028 से पहले 'नया चिड़ियाघर' असंभव।
- दिल्ली चिड़ियाघर मैसूर-हैदराबाद के चिड़ियाघरों से भी पिछड़ रहा है, CZA रिपोर्ट्स में जर्जरता का ज़िक्र।
आँकड़ों में
- ₹400 करोड़ — दिल्ली चिड़ियाघर कायाकल्प योजना का कुल स्वीकृत बजट (दैनिक जागरण)।
- 5 महीने — बजट स्वीकृति के बाद बिना किसी ज़मीनी प्रगति के बीता समय।
- 12-18 महीने — DPR अनुमोदन के बाद भी निर्माण पूरा होने में अनुमानित न्यूनतम समय।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA), दिल्ली चिड़ियाघर प्रशासन और संबंधित केंद्र सरकार के विभाग।
- क्या: ₹400 करोड़ की कायाकल्प (रीवैम्प) योजना पाँच महीने से कागज़ों पर अटकी है — न टेंडर निकला, न निर्माण शुरू।
- कब: 2026 की शुरुआत में बजट स्वीकृत; जून 2026 तक कोई ज़मीनी प्रगति नहीं (दैनिक जागरण रिपोर्ट अनुसार)।
- कहाँ: राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (दिल्ली चिड़ियाघर), नई दिल्ली।
- क्यों: DPR में बार-बार संशोधन, प्रशासनिक मंज़ूरी में देरी, विभागों के बीच समन्वय की कमी, और टेंडरिंग प्रक्रिया शुरू न होना — दैनिक जागरण अनुसार ये प्रमुख कारण हैं।
- कैसे: बजट पास होने के बाद DPR अनुमोदन, टेंडर, ठेकेदार चयन और फिर निर्माण — यह प्रक्रिया पहले चरण (DPR और प्रशासनिक अनुमोदन) पर ही रुकी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दिल्ली चिड़ियाघर का कायाकल्प प्रोजेक्ट क्या है?
यह लगभग ₹400 करोड़ की योजना है जिसमें एनक्लोज़र अपग्रेड, लैंडस्केपिंग, विज़िटर सुविधाएँ और जानवरों के लिए इमर्सिव हैबिटैट बनाना शामिल है — ताकि दिल्ली चिड़ियाघर को वर्ल्ड-क्लास स्तर पर लाया जा सके।
दिल्ली चिड़ियाघर का कायाकल्प प्रोजेक्ट क्यों अटका है?
दैनिक जागरण के अनुसार, DPR में बार-बार संशोधन, प्रशासनिक अनुमोदन में देरी और विभागों के बीच समन्वय की कमी मुख्य कारण हैं। सियासी हलकों में ठेकेदारी लॉबी की भूमिका की भी चर्चा है।
दिल्ली चिड़ियाघर किसके अधीन आता है?
राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (दिल्ली चिड़ियाघर) केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अधीन है और केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) इसकी निगरानी करता है।
दिल्ली चिड़ियाघर का नया रूप कब तक देखने को मिलेगा?
मौजूदा देरी को देखते हुए, अगर आज ही सारी मंज़ूरी मिल जाए तो भी टेंडरिंग और निर्माण में 12-18 महीने लगेंगे — यानी 2028 से पहले 'नया चिड़ियाघर' दिखने की संभावना नहीं है।





click and follow Indiaherald WhatsApp channel