नेहरू से मोदी तक, जब-जब सुप्रीम कोर्ट ने संसद या सरकार की शक्ति सीमित की, तब-तब पूर्ण बहुमत वाली सरकारों ने संविधान संशोधन कर न्यायिक फैसले को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी बनाया। ThePrint की रिपोर्ट के अनुसार, यह पैटर्न 1951 से 2024 तक लगातार दोहराया गया है।
सोचिए — देश की सर्वोच्च अदालत कोई फैसला सुनाती है, सरकार उसे सिर झुकाकर मानती है… और फिर कुछ ही महीनों में संसद वही कानून बदलकर कोर्ट को बता देती है कि आखिरी बात हमारी है। यह किसी फ़िल्म की कहानी नहीं, भारतीय लोकतंत्र के सात दशकों का सबसे पुराना 'पावर गेम' है। और इसकी शुरुआत किसी और ने नहीं, ख़ुद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने की थी।
ThePrint की एक विस्तृत रिपोर्ट ने इस पैटर्न को उजागर किया है — नेहरू से मोदी तक, जब-जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार का रास्ता रोका, संसद ने संविधान संशोधन कर फैसले को व्यावहारिक रूप से बेमानी बना दिया। सवाल यह नहीं कि ऐसा हुआ — सवाल यह है कि यह पैटर्न क्यों दोहराता रहा, और क्या इसमें कोई बदलाव कभी आएगा?
1951: जहाँ से सब शुरू हुआ — नेहरू का पहला संशोधन
आज़ादी के ठीक चार साल बाद, 1951 में सुप्रीम कोर्ट ने कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य मामले में ज़मींदारी उन्मूलन कानूनों को चुनौती दी। कोर्ट ने संपत्ति के मौलिक अधिकार को प्राथमिकता दी। नेहरू के लिए यह अस्तित्व का सवाल था — भूमि सुधार उनकी सरकार की रीढ़ थे। नतीजा? पहला संविधान संशोधन — अनुच्छेद 31A और 31B जोड़े गए, नौवीं अनुसूची बनी, और कोर्ट की न्यायिक समीक्षा से कुछ कानूनों को सीधे बाहर कर दिया गया।
यह सिर्फ़ एक कानूनी कदम नहीं था। यह एक मिसाल थी — एक टेम्पलेट, जिसे आने वाली हर सरकार ने याद रखा।
शाह बानो (1985-86): जब राजीव गांधी ने 400 सीटें होते हुए भी झुकना चुना
1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाह बानो केस में तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता का अधिकार दिया — CrPC की धारा 125 के तहत। फैसला ऐतिहासिक था, महिला अधिकारों की जीत थी। लेकिन राजीव गांधी, जिनके पास लोकसभा में रिकॉर्ड 414 सीटें थीं, ने 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित कर कोर्ट के फैसले को व्यावहारिक रूप से निष्प्रभावी कर दिया।
ThePrint की रिपोर्ट के अनुसार, यह शायद सबसे विवादास्पद उदाहरण है — जहाँ एक लोकप्रिय, प्रगतिशील फैसले को वोट बैंक की गणित ने पलट दिया। बहुमत ने यहाँ न्यायिक अधिकार नहीं, राजनीतिक अस्तित्व बचाया।
केशवानंद भारती (1973) और 42वाँ संशोधन: इंदिरा का 'सुपर संसद' प्रयोग
1973 में सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती मामले में 'बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन' दिया — यानी संसद संविधान बदल सकती है, लेकिन उसकी बुनियादी ढाँचा नहीं। इंदिरा गांधी ने 1976 में 42वें संशोधन से संसद को लगभग असीमित शक्ति देने की कोशिश की — न्यायिक समीक्षा को ही कमज़ोर करने का प्रयास। बाद में 1977 में जनता पार्टी सरकार ने 43वें और 44वें संशोधन से इसके कई हिस्से वापस लिए, लेकिन यह दिखा गया कि पूर्ण बहुमत न्यायपालिका की नींव पर भी हाथ रखने को तैयार हो सकता है।
2024: चुनाव आयोग नियुक्ति — मोदी सरकार का ताज़ा दाँव
2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ में फैसला दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की कमेटी करेगी। मोदी सरकार ने 2024 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम पारित कर CJI की जगह एक कैबिनेट मंत्री को रख दिया।
ThePrint के अनुसार, यह सबसे ताज़ा और सबसे सीधा उदाहरण है — कोर्ट ने स्वतंत्र निगरानी की बात कही, सरकार ने कानून बदलकर कंट्रोल वापस लिया।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में फुसफुसाहट यह है कि यह लड़ाई अब और तीखी होगी। विपक्ष के सूत्रों की मानें तो कांग्रेस और अन्य दल 'बेसिक स्ट्रक्चर' को 'अटैक' बताकर 2029 तक इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं। दूसरी तरफ़, सत्ता पक्ष के क़रीबी हलकों में चर्चा है कि "अगर संसद सर्वोच्च है तो कोर्ट को विधायी क्षेत्र में दख़ल देने का अधिकार ही क्यों?" — यह तर्क आने वाले समय में और ज़ोर पकड़ सकता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
असली सवाल: ताक़त किसकी — रोब किसका?
इन सात दशकों का पैटर्न एक असहज सच उजागर करता है: भारत में सुप्रीम कोर्ट की शक्ति तभी तक 'सुप्रीम' है जब तक सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। जिस दिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों में नंबर जुड़ जाते हैं, संविधान संशोधन एक हथियार बन जाता है — और न्यायपालिका का सबसे धारदार फैसला भी कागज़ का टुकड़ा बनकर रह सकता है।
लेकिन एक काउंटर-पॉइंट भी है। केशवानंद भारती का 'बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन' आज तक अजेय है — कोई सरकार, चाहे कितनी भी ताक़तवर हो, इसे पलट नहीं पाई। यह न्यायपालिका का वह ब्रह्मास्त्र है जिसने संसद की 'अनलिमिटेड पावर' पर एक स्थायी लगाम लगा रखी है। इंडिया हेराल्ड का पॉलिटिकल रीड यह है कि असली ख़तरा तब आएगा जब कोई सरकार इस डॉक्ट्रिन को ही चुनौती देने का साहस करे — और वह दिन उतना दूर नहीं जितना हम समझते हैं।
आने वाले वर्षों में देखने लायक़ यह होगा: क्या 2029 के चुनावी मैदान में 'न्यायपालिका की स्वतंत्रता' एक केंद्रीय मुद्दा बनेगी? अगर NDA को फिर दो-तिहाई बहुमत मिलता है, तो क्या NJAC जैसा कोई नया प्रयोग होगा? और अगर गठबंधन सरकार बनती है, तो क्या कोर्ट की ताक़त अपने आप बढ़ जाएगी — क्योंकि कमज़ोर सरकार संशोधन ला ही नहीं पाएगी?
दरअसल, भारतीय लोकतंत्र में 'अंतिम शब्द' किसी का नहीं — यह एक अनवरत खींचतान है, जहाँ शक्ति का पेंडुलम बहुमत और संविधान के बीच झूलता रहता है। और जब तक यह पेंडुलम चलता रहे, लोकतंत्र ज़िंदा है। असली ख़तरा उस दिन होगा जब यह पेंडुलम एक तरफ़ जाकर रुक जाए — और कोई उसे वापस खींचने वाला न बचे।
Reported and written with AI assistance under India Herald's editorial standards; a human editor governs publication.
Allegations reported here are attributed to named sources and remain unproven unless a court has ruled; matters sub judice are reported without prejudgment.
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मुख्य बातें
- 1951 से 2024 तक — कम से कम छह बड़े मौकों पर पूर्ण बहुमत वाली सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले संविधान संशोधन से पलटे।
- शाह बानो (1986) और चुनाव आयोग नियुक्ति (2024) — दो सबसे विवादास्पद उदाहरण जहाँ कोर्ट का स्वतंत्र फैसला सीधे विधायी कार्रवाई से बेअसर हुआ।
- केशवानंद भारती का 'बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन' अब तक अजेय — यही एकमात्र लगाम है जो संसद की असीमित संशोधन शक्ति पर टिकी है।
- 2029 तक यह टकराव और तीखा हो सकता है — बहुमत का आकार तय करेगा कि न्यायपालिका कितनी स्वतंत्र रहेगी।
आँकड़ों में
- नेहरू ने 1951 में पहला संविधान संशोधन कर नौवीं अनुसूची बनाई — ThePrint
- राजीव गांधी के पास 414 लोकसभा सीटें थीं जब शाह बानो फैसला पलटा गया — ThePrint
- 2024 में मोदी सरकार ने चुनाव आयोग नियुक्ति क़ानून बदलकर CJI को कमेटी से हटाया — ThePrint
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: नेहरू से लेकर राजीव गांधी और मोदी तक — पूर्ण बहुमत वाली सरकारों ने।
- क्या: सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों को संविधान संशोधन के ज़रिए पलटा जो सरकार की नीतियों या विधायी शक्ति को सीमित करते थे।
- कब: 1951 में पहला संविधान संशोधन, 1986 में शाह बानो केस, 2024 में चुनाव आयोग नियुक्ति विधेयक — सात दशकों में बार-बार।
- कहाँ: भारतीय संसद और सुप्रीम कोर्ट, नई दिल्ली।
- क्यों: हर सरकार ने माना कि न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्र में अतिक्रमण किया — और पूर्ण बहुमत ने संशोधन का रास्ता खुला रखा।
- कैसे: अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक पारित कर, कोर्ट के फैसले की कानूनी बुनियाद ही बदल दी गई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या संसद सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट सकती है?
सीधे तो नहीं, लेकिन संसद संविधान संशोधन कर उस कानूनी आधार को ही बदल सकती है जिस पर कोर्ट ने फैसला दिया — यह भारत में कई बार हुआ है, ThePrint की रिपोर्ट के अनुसार।
बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन क्या है?
1973 के केशवानंद भारती फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन उसके मूल ढाँचे (बेसिक स्ट्रक्चर) को नहीं बदल सकती — यह सिद्धांत आज तक अजेय है।
शाह बानो केस में क्या हुआ था?
1985 में सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो को गुज़ारा भत्ता का अधिकार दिया, लेकिन 1986 में राजीव गांधी सरकार ने क़ानून बदलकर इस फैसले को निष्प्रभावी कर दिया।
चुनाव आयोग नियुक्ति पर मोदी सरकार ने क्या किया?
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में नियुक्ति कमेटी में CJI को शामिल करने का आदेश दिया, लेकिन 2024 में मोदी सरकार ने क़ानून बनाकर CJI की जगह कैबिनेट मंत्री को रखा — ThePrint के अनुसार।






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