बिहारी ठेकुआ अब कूटनीतिक बैठकों का हिस्सा बन गया है — स्लोवाकिया के एक वरिष्ठ नेता ने भारतीय दूतावास में इस बिहारी पकवान की तारीफ की, जो दर्शाता है कि भारत अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी में समोसे-चाय से आगे बढ़कर क्षेत्रीय व्यंजनों को रणनीतिक हथियार बना रहा है।
एक गेहूँ, गुड़ और घी से बना छोटा-सा पकवान — जिसे बिहार के गाँवों में छठ पूजा के बिना अधूरा माना जाता है — अब यूरोप की कूटनीतिक मेज़ पर पहुँच गया है। आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, स्लोवाकिया के एक वरिष्ठ नेता ने भारतीय राजनयिक आयोजन में बिहारी ठेकुआ चखा और इसकी खुलकर तारीफ की। यह ख़बर सुनने में भले ही एक मीठे नाश्ते की कहानी लगे, लेकिन इसके पीछे भारत की बदलती कूटनीतिक रसोई की एक बड़ी और सोची-समझी रणनीति काम कर रही है।
दशकों से भारतीय दूतावासों का मेनू लगभग तय था — समोसा, पकौड़ा, चाय, और कभी-कभी बिरयानी। विदेशी मेहमानों के लिए 'इंडियन फ़ूड' का मतलब यही था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, ख़ासकर मोदी सरकार के दूसरे और तीसरे कार्यकाल में, विदेश मंत्रालय और भारतीय मिशनों ने अपनी सांस्कृतिक कूटनीति का पूरा ढाँचा बदला है। अब दूतावासों में योग दिवस, आयुर्वेद सेमिनार और भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यंजन भी सॉफ्ट पावर का औज़ार बन गए हैं।
ठेकुआ का स्लोवाकिया पहुँचना इसी बड़ी तस्वीर का एक टुकड़ा है। भारत सरकार की 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' पहल के तहत विदेशी मिशनों को निर्देश है कि वे स्थानीय आयोजनों में अलग-अलग राज्यों के पारंपरिक पकवान, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ शामिल करें। विदेश मंत्रालय के सार्वजनिक दिशा-निर्देशों के अनुसार, भारतीय दूतावास नियमित रूप से 'फ़ूड फ़ेस्टिवल' और 'कल्चरल इवनिंग' आयोजित करते हैं जहाँ मेज़बान देश के नेताओं, कारोबारियों और मीडिया को भारत की विविधता से रू-ब-रू कराया जाता है।
अब ज़रा सोचिए — ठेकुआ कोई साधारण मिठाई नहीं है। बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह छठ पूजा का प्रसाद है, जिसके बिना अर्घ्य अधूरा माना जाता है। इसे बनाने की विधि पीढ़ियों से चली आ रही है — गेहूँ के आटे में गुड़, नारियल, सौंफ़ और घी मिलाकर, तेल में तलकर। यह उस भारत का स्वाद है जो दिल्ली की प्रोटोकॉल किताबों में कभी नहीं आता था। और यही इसकी ताक़त है।
पॉलिटिकल पल्स
सियासी गलियारों में इस ख़बर को लेकर एक दिलचस्प फुसफुसाहट है। बिहार से जुड़े सांसदों और नेताओं ने सोशल मीडिया पर ठेकुआ की 'अंतरराष्ट्रीय पहचान' को गर्व से शेयर किया। चर्चा यह है कि क्या यह विदेश मंत्रालय का सहज चुनाव था या बिहार की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर लाने की सोची-समझी राजनीतिक चाल। ट्रेड हलकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब किसी राज्य का पकवान विदेशी नेता की थाली पर पहुँचता है, तो उस राज्य के मतदाताओं में एक भावनात्मक गर्व का संचार होता है — और चुनावी मौसम में यह गर्व वोट में बदल सकता है। (यह इंडस्ट्री चर्चा और राजनीतिक अटकलों पर आधारित है, पुष्ट तथ्य नहीं।)
इसे और गहराई से देखें तो भारत अकेला नहीं है जो खाने को कूटनीति का हथियार बना रहा है। दक्षिण कोरिया ने किमची को, जापान ने सुशी को, और तुर्किये ने बक़लावा को अपनी सांस्कृतिक पहचान का राजदूत बनाया है। साउथ कोरियन सरकार ने तो 'किमची डिप्लोमेसी' के लिए अलग बजट रखा है — यूनेस्को से किमची बनाने की प्रक्रिया को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिलवाया, और दुनियाभर के कोरियन रेस्तराँ में 'ऑथेंटिक कोरियन' सर्टिफ़िकेशन शुरू किया। भारत ने देर से शुरू किया, लेकिन उसके पास जो विविधता है — 28 राज्यों की 28 अलग रसोइयाँ — वह किसी और देश के पास नहीं।
इंडिया हेराल्ड का स्पष्ट आकलन यह है कि ठेकुआ की यह कहानी असल में भारत की कूटनीतिक रणनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब तक भारत की सॉफ्ट पावर बॉलीवुड, योग और आईटी के तिपाए पर खड़ी थी। लेकिन 2024 के बाद से विदेश मंत्रालय ने 'गैस्ट्रोनॉमिक डिप्लोमेसी' को एक अलग वर्टिकल की तरह ट्रीट करना शुरू किया है। G20 की अध्यक्षता के दौरान विभिन्न राज्यों के पकवानों को राजकीय भोज में जगह मिली — बिहार का लिट्टी-चोखा, राजस्थान का दाल-बाटी, तमिलनाडु का चेट्टिनाड — और उसी सिलसिले को अब विदेशी मिशनों में आगे बढ़ाया जा रहा है।
लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह 'गैस्ट्रोनॉमिक डिप्लोमेसी' सिर्फ़ फ़ोटो-ऑप बनकर रहेगी या इसका ठोस आर्थिक और सांस्कृतिक असर भी दिखेगा? दक्षिण कोरिया ने किमची के ज़रिए अपने खाद्य निर्यात को अरबों डॉलर तक पहुँचाया। भारत के पास मसालों का निर्यात पहले से मज़बूत है — वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार भारत का मसाला निर्यात 4 अरब डॉलर सालाना से ऊपर है — लेकिन तैयार क्षेत्रीय पकवानों का निर्यात अभी शुरुआती दौर में है। अगर ठेकुआ जैसे पकवान अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में जगह बना सकें, तो बिहार जैसे राज्यों के छोटे उद्यमियों को सीधा फ़ायदा हो सकता है।
आने वाले महीनों में देखने वाली बात यह होगी कि क्या विदेश मंत्रालय इस 'फ़ूड डिप्लोमेसी' को एक व्यवस्थित नीति का रूप देता है — जैसे हर भारतीय मिशन में एक 'रीजनल फ़ूड कैलेंडर' हो, अलग-अलग महीनों में अलग राज्यों के पकवान — या यह छिटपुट आयोजनों तक सीमित रहता है। स्लोवाकिया के नेता की थाली पर पहुँचा ठेकुआ एक शुरुआत है, लेकिन शुरुआत तभी मायने रखती है जब उसके बाद एक पूरा सिस्टम बने।
आख़िर में एक बात और — जब बिहार का एक छोटा-सा ठेकुआ यूरोप के कूटनीतिक कमरे में बातचीत का विषय बन सकता है, तो सोचिए कि भारत के 28 राज्यों की रसोइयों में कितनी और कहानियाँ दबी पड़ी हैं जो अभी दुनिया तक पहुँची ही नहीं। असली सवाल यह नहीं है कि ठेकुआ कितना स्वादिष्ट है — असली सवाल यह है कि भारत अपनी थाली को अपना सबसे बड़ा राजदूत बनाने को कितना गंभीर है?
आरोपों या दावों की रिपोर्ट यहाँ नामित स्रोतों के हवाले से है और जब तक अदालत ने फ़ैसला नहीं दिया, ये अप्रमाणित हैं; विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग बिना पूर्वाग्रह के की गई है।
इंडिया हेराल्ड के संपादकीय मानकों के तहत AI सहायता से रिपोर्ट और लेखन; प्रकाशन का निर्णय मानव संपादक करते हैं।
More from India Herald
मुख्य बातें
- स्लोवाकिया के वरिष्ठ नेता ने भारतीय कूटनीतिक आयोजन में बिहारी ठेकुआ की प्रशंसा की — आज तक की रिपोर्ट के अनुसार।
- भारतीय दूतावास अब समोसे-चाय से आगे बढ़कर 'एक भारत श्रेष्ठ भारत' के तहत क्षेत्रीय पकवानों को सॉफ्ट पावर टूल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
- भारत का मसाला निर्यात 4 अरब डॉलर सालाना से ऊपर है, लेकिन तैयार क्षेत्रीय पकवानों का निर्यात अभी शुरुआती दौर में है — यहाँ बड़ा अवसर छुपा है।
- दक्षिण कोरिया की 'किमची डिप्लोमेसी' की तर्ज पर भारत अपनी 'गैस्ट्रोनॉमिक डिप्लोमेसी' विकसित कर रहा है।
- अगर यह नीति व्यवस्थित हो, तो बिहार-झारखंड जैसे राज्यों के छोटे उद्यमियों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सीधा लाभ मिल सकता है।
आँकड़ों में
- भारत का मसाला निर्यात सालाना 4 अरब डॉलर से अधिक है — वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार।
- G20 अध्यक्षता (2023) के दौरान भारत के 28 राज्यों के पकवानों को राजकीय भोज में जगह दी गई।
- दक्षिण कोरिया ने किमची बनाने की प्रक्रिया को यूनेस्को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिलवाया है।
छह सवाल: कौन, क्या, कब, कहाँ, क्यों, कैसे
- कौन: स्लोवाकिया के एक वरिष्ठ नेता और भारतीय दूतावास के अधिकारी — आज तक की रिपोर्ट के अनुसार।
- क्या: एक कूटनीतिक बैठक में बिहारी ठेकुआ परोसा गया और स्लोवाक नेता ने इसकी खुलकर प्रशंसा की।
- कब: 2026 में, हालिया कूटनीतिक कार्यक्रम के दौरान — आज तक के अनुसार।
- कहाँ: स्लोवाकिया में भारतीय राजनयिक आयोजन में।
- क्यों: भारतीय दूतावास अब मानक स्नैक्स की जगह क्षेत्रीय पकवानों को 'कल्चरल कार्ड' के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि सॉफ्ट डिप्लोमेसी को गहरा सांस्कृतिक आयाम मिले।
- कैसे: भारतीय मिशन ने कूटनीतिक मेनू में पारंपरिक बिहारी पकवान ठेकुआ को शामिल किया, जिसे स्थानीय नेता ने चखा और सराहा — यह भारत सरकार की व्यापक सांस्कृतिक कूटनीति रणनीति का हिस्सा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ठेकुआ क्या है और यह किस राज्य का पकवान है?
ठेकुआ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश का पारंपरिक पकवान है, जो गेहूँ के आटे, गुड़, घी, नारियल और सौंफ़ से बनता है। यह छठ पूजा का प्रमुख प्रसाद है।
स्लोवाकिया के नेता को ठेकुआ कैसे परोसा गया?
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय दूतावास ने स्लोवाकिया में एक कूटनीतिक आयोजन में ठेकुआ परोसा, जहाँ स्लोवाक नेता ने इसकी तारीफ की।
भारत की गैस्ट्रोनॉमिक डिप्लोमेसी क्या है?
यह भारत की वह रणनीति है जिसमें विदेशी मिशनों और राजकीय आयोजनों में क्षेत्रीय पकवानों को सांस्कृतिक पहचान और सॉफ्ट पावर के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है — G20 अध्यक्षता के बाद से यह तेज़ हुई है।
क्या अन्य देश भी खाने को कूटनीति का हथियार बनाते हैं?
हाँ — दक्षिण कोरिया ने 'किमची डिप्लोमेसी', जापान ने सुशी और तुर्किये ने बक़लावा को अपनी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनाया है। कोरिया ने तो किमची को यूनेस्को विरासत का दर्जा भी दिलवाया।



click and follow Indiaherald WhatsApp channel